डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की विश्वसनीयता और स्वायत्तता वर्तमान में एक गंभीर विमर्श का विषय बनी हुई है। सितंबर 2026 में सामने आई आंतरिक रिपोर्टों और राजनीतिक घटनाक्रमों ने इस संवैधानिक संस्था के कामकाज के तरीकों पर कई सवाल खड़े किए हैं।फिलहाल ३ आयुक्त सरकार के मेहरबान होने की वजह से उनकी जगह प्रधानमंत्री, विपक्ष नेता और मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित समिति द्वारा नियुक्त किए जाने चाहिये । साथ ही नियुक्त होने वाले अधिकारियों की जानकारी सार्वजनिक हो जाये ।
द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों (विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू) ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित रूप से अपनी गंभीर आपत्ति दर्ज कराई थी।

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (SIR), नए मतदाताओं के पंजीकरण (वैधानिक फॉर्म-6 में बदलाव), वोटर डेटा तक पहुंच, चुनावी सॉफ़्टवेयर के केंद्रीकरण और डिजिटल प्रबंधन से जुड़ी थीं। दोनों आयुक्तों ने इस विषय में कथित तौर पर कैबिनेट सेक्रेटरी को भी पत्र लिखा था।
विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल आंतरिक असहमति को संस्थागत संकट मान लेना उचित नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद स्वाभाविक हैं। हालांकि, चुनाव आयोग जैसी सर्वोच्च संस्था के लिए केवल निष्पक्ष होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसका "संदेह से परे" (Above Suspicion) दिखना भी बेहद जरूरी है।
जानबूझकर दो आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना लिए गए, मतदाता-सूची प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं या आयोग ने पारदर्शिता खो दी, तो नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए—जिसमें संबंधित आयुक्त का इस्तीफा भी शामिल हो सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में SIR से जुड़े निर्णयों पर कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। विपक्ष ने इसे CEC ज्ञानेश कुमार द्वारा दोनों आयुक्तों को दरकिनार करने का प्रमाण बताते हुए उनके इस्तीफे या हटाने की मांग की है।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि SIR सहित सभी महत्वपूर्ण निर्णय तीनों आयुक्तों की स्वीकृति और सर्वसम्मति से लिए गए। इसलिए अभी दो परस्पर विरोधी दावे मौजूद हैं; उपलब्ध सार्वजनिक सूचना के आधार पर किसी एक पक्ष को अंतिम सत्य मानना जल्दबाजी होगी।
क्या तीनों को इस्तीफा देना चाहिए?
इस्तीफा उचित हो सकता है, यदि
लिखित आपत्तियों की प्रामाणिकता और गंभीरता स्वतंत्र जांच में सिद्ध हो।
आयोग ने जानबूझकर असहमति छिपाई या निर्णयों को सर्वसम्मत बताकर संसद और जनता को गुमराह किया हो।SIR में बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने, अपील का अवसर न देने या भेदभावपूर्ण प्रक्रिया के प्रमाण मिलें।आयोग सार्वजनिक विश्वास बहाल करने में असफल रहे और निष्पक्ष जांच के लिए पद छोड़ना आवश्यक हो।
असहमति केवल प्रारंभिक प्रशासनिक विचार-विमर्श तक सीमित थी और अंतिम निर्णय वास्तव में सर्वसम्मति से हुआ।
तीनों आयुक्तों का एक साथ इस्तीफा निर्वाचन प्रक्रिया को संवैधानिक संकट में डाल सकता है।इस्तीफे की मांग केवल राजनीतिक दबाव या चुनावी लाभ के लिए की जा रही हो।
सामूहिक इस्तीफे के बजाय पहले ये कदम उठने चाहिए:-
1. दोनों आयुक्तों की लिखित आपत्तियां, बैठक के रिकॉर्ड और अंतिम आदेश सार्वजनिक किए जाएं।
2. SIR की प्रक्रिया और हटाए गए मतदाताओं के आंकड़ों का स्वतंत्र न्यायिक या संसदीय परीक्षण हो।
3. प्रत्येक प्रभावित मतदाता को नोटिस, सुनवाई और अपील का वास्तविक अवसर दिया जाए।
4. जांच पूरी होने तक विवादित SIR फैसलों को स्थगित या पुनःसत्यापित किया जाए।
5. यदि गंभीर कदाचार सिद्ध हो, तो संबंधित आयुक्त के विरुद्ध संवैधानिक हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
CEC को हटाना साधारण राजनीतिक निर्णय नहीं है; अनुच्छेद 324(5) के तहत इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी कठोर प्रक्रिया और आधार आवश्यक हैं।
संवैधानिक और प्रशासनिक कानूनविदों (जैसे दृष्टि आईएएस की केस स्टडीज) के अनुसार, जनता के भरोसे को अक्षुण्ण रखने के लिए आयोग की जवाबदेही को इन सुधारात्मक उपायों से और सुदृढ़ किया जा सकता है।
नियुक्ति प्रक्रिया
कार्यपालिका (सरकार) के दबदबे को कम करने के लिए एक बहु-संस्थागत और द्विपक्षीय (Bipartisan) कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से आयुक्तों की नियुक्ति की जाए।मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की तरह ही अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों (ECs) को भी पद से हटाने के लिए समान संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की जाए, ताकि वे बिना किसी भय के अपनी स्वतंत्र राय रख सकें।
आयोग के आंतरिक नियमों को पूरी तरह संहिताबद्ध (Codify) किया जाए, जिससे कोई भी बड़ा फैसला तीनों आयुक्तों के परामर्श और औपचारिक प्रसार के बिना न लिया जा सके।सर्वोच्च न्यायालय की तर्ज पर चुनाव आयोग के प्रशासनिक खर्चों को भी संसद के 'मतदान' (Voted) के बजाय 'भारत की संचित निधि पर भारित' (Charged upon the Consolidated Fund of India) किया जाए, जिससे बजटीय दबाव की गुंजाइश खत्म हो।
अभी तीनों चुनाव आयुक्तों के सामूहिक त्यागपत्र की मांग प्रमाण-आधारित रूप से उचित नहीं कही जा सकती। सही मांग यह होनी चाहिए कि आयोग अपने रिकॉर्ड सार्वजनिक करे और स्वतंत्र जांच कराए। यदि जांच में लोकतांत्रिक प्रक्रिया, मतदाता अधिकारों या आयोग की सामूहिक निर्णय-प्रणाली का गंभीर उल्लंघन सिद्ध होता है, तो जिम्मेदार आयुक्तों को नैतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर पद छोड़ना चाहिए।चुनाव आयोग की साख भारत के संपूर्ण लोकतांत्रिक तंत्र और जनता के भरोसे की बुनियाद है। इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का जरिया बनाने के बजाय, इसकी पारदर्शिता और आंतरिक लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करना राष्ट्रहित में सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा।