( राजनैतिक व्यंग्य : संजय पराते )
दिवाली आने में अभी पौने दो माह बाकी है, लेकिन इसके पहले ही पूरे देश को जगमगाने की प्लानिंग बन चुकी है। मोदीजी ने अपना जन्म दिन 17 सितंबर को बताया है, तो बिलकुल मानिए कि हिंदू राष्ट्र की इस पावन धरा पर वे 17 सितंबर को ही अवतरित हुए होंगे। जिन्हें शक हो, वे मोदीजी की एंटायर पॉलिटिकल साइंस की मार्कशीट में लिखी जन्म तिथि देख सकते हैं। जिन्हें यह न मिलें, वे एप्स्टीन फाइल खोलकर देख सकते हैं। वहां मोदीजी की जन्म कुंडली में उनका अवतरण दिवस 17 सितंबर दर्ज ही होगा।
मोदीजी के अवतरण दिवस को यादगार बनाने के लिए संघी गिरोह क्या कुछ नहीं कर रहा है! भाजपा सरकारें फरमान जारी कर रही है कि तैयारी ऐसी हो कि तेल और दीयों की कोई कमी न हो। खाड़ी के तेल की कमी के साथ हमारे तेल मिलों में भी तेल का उत्पादन कम हो रहा है, क्योंकि तिलहन की पैदावार घट रही है। तो भी कोई बात नहीं, देश का तेल निचोड़ों, तेल मिलें बंद नहीं होना चाहिए। 140 करोड़ जनता को निचोड़ोगे, तो देश क्या, दुनिया में भी तेल की कमी नहीं होगी। इतना तेल निकलेगा कि होली में भी जलाने के काम आएगा। 17 सितंबर से होली तक तेल जलाओ उत्सव मनाया जा सकता है।
तो मित्रों, अब आप लोग मान ही लो कि इस धरा पर 17 सितम्बर को ही मोदीजी का अवतरण हुआ था। भारत वर्ष नाम के धरा के इस हिस्से को ही यह सौभाग्य प्राप्त होना था। विज्ञान कथाएं बताती हैं कि जिस तरह इस मिट्टी में राम अवतरित हुए थे रावण से मुक्ति दिलाने के लिए, कृष्ण अवतरित हुए थे कंस मामा से मुक्ति दिलाने के लिए, उसी तरह मोदीजी भी अवतरित हुए हैं भारत की इस पावन धरा को म्लेच्छों और नाराज फूफाओं से मुक्ति दिलाकर हिंदू राज लाने के लिए। म्लेच्छों के खिलाफ 2002 में गुजरात में वे एक धर्म युद्ध लड़ चुके है। यह धर्म युद्ध इतना भीषण था कि वे राज धर्म भी भूल गए। अटल बिहारी के याद दिलाने से भी उन्होंने इसे याद करने से मना कर दिया था। याद रखा, तो केवल अर्जुन की तरह उस चिड़िया की आंख को, जिसे निशाना बनाना था। मोदीजी हिंदू हृदय सम्राट ऐसे ही नहीं कहलाते। इसके लिए तपस्या करनी पड़ती है। अपने तप के बल पर वे अब पूरे देश को मुसलमानों और इस्लाम से मुक्त करने का अभियान चला रहे हैं। राम और कृष्ण को उन्होंने इस अभियान के लिए अपने रथ में जोत दिया है।
तभी तो वे अवतार पुरुष हैं, इसलिए उनका अवतरण ही होना था। साधारण मनुष्य तो जन्म ही लेते हैं। अधिकांश को रोज की खट-खट में अपनी जन्म तिथि भी याद नहीं रहती, जन्म दिन मनाने की बात तो दूर ही रही। जो नॉन-बायोलॉजिकल होते है, वे जन्म लेकर भी अवतरित होते हैं। कलयुग के अवतारी पुरूष का यह जन्म सिद्ध अधिकार है कि पूरी दुनिया से कहे कि उसके लिए आशीर्वाद का दीया जलाओ, उसके शतायु पार होने और आजीवन सत्ता सुख भोगने की कामना करो।
यह देश का सौभाग्य है कि उसे ऐसा प्रतापी नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री मिला। प्रधानमंत्री तो जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी बाजपेयी आदि-इत्यादि भी थे, लेकिन वे सभी बायोलॉजिकल थे। 2047 के बाद राहुल गांधी भी यदि कभी पीएम बन पाएं, तो भी वे रहेंगे बायोलॉजिकल ही। फिर ये सब क्या खाकर मोदीजी का मुकाबला करेंगे! मोदीजी ने दिखा दिया है कि नेहरू का रिकॉर्ड कैसे तोड़ा जाता है। नेहरू का विकास पिछड़ा हुआ था, बायोलॉजिकल जो थे। मोदीजी का विकास आधुनिक है, नॉन-बायोलॉजिकल जो ठहरे। गम तो केवल इतना है कि मोदीजी इतनी देरी से क्यों अवतरित हुए? आजादी से पहले ही हो जाते, बाल-काल से ही प्रधानमंत्री बन जाते, तो आज देश कितना आगे बढ़ जाता! लेकिन क्या करें, मोदीजी से पहले पैदा होकर नेहरू देश के विकास के लिए बाधक बन गए। लेकिन अब चिंता की कोई बात नहीं, नेहरू के किए-धराये पर पानी फेरकर मोदीजी देश का विकास कर रहे हैं। रात के अंधेरे में नेहरू चुपके से देश को पीछे खींच देते हैं, कभी-कभी तो लंगड़ी मारकर गिरा देते हैं। दिन में फिर धक्का मारकर मोदीजी देश को आगे बढ़ा देते हैं। पिछले 12 सालों से यही खेल चल रहा है। यकीन मानिए, लड़ाई नेहरू और मोदीजी में नहीं है। यह लड़ाई तो अंधेरे और जगमगाते दीयों के प्रकाश की, बायोलॉजिकल पीएम और नॉन-बायोलॉजिकल अवतार के बीच में है। ये देश पराक्रमी अवतारों का देश है। अवतारवाद यहां की प्रजा की रग-रग में बसा है। फिर मोदीजी के मुकाबले नेहरू कहां टिकेंगे?
लेकिन नामुराद जनता को फिर भी समय नहीं मिला। इस दिन भी वह अपनी रोज की खट-खट में ही खट रही थी। वो तो भला हो, हमारे कलेक्टरों का, डिप्टी कलेक्टरों का, अलाने और फलाने अधिकारियों का कि दौड़ती गाड़ियों, पैदल चलते राहगीरों को रोककर सड़कों पर दीपमालाएं सजा दी। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की गौरव पथ पर जगमगाते दीपों को निहारते अखबारों में तस्वीर छपी है। समाचार छपा है कि राजधानी रायपुर में ही 25 लाख दीये जलाए गए। इस हिसाब से पूरे देश में इतने दीये तो जल ही गए होंगे, जितनी इस पृथ्वी की आबादी नहीं है। और वह भी, सड़कों पर और मंदिरों में ही, सरकारी खर्चे से। सरकारी पैसा भी जनता का ही पैसा होता है, जिसे खर्चने के लिए जनता की इजाजत लेने की कोई जरूरत नहीं पड़ती और न ही बजट में आबंटन की। जब इतने दीये जले हैं, तो यह तो माना ही जा सकता है कि इसकी रोशनी गरीब की उस झोपड़ी तक भी जरूर पहुंची होगी, जिसकी औकात अब ढीबरी जलाने की भी नहीं बची है। क्यों नहीं बची है, इसका पता कुछ दिनों के बाद तब चलेगा, जब यह सामने आएगा कि इन दीयों और इसमें डालने वाले तेल को संघी सरकार ने किस भाव से खरीदा था। मोदीजी के अवतरित होने की खुशी में पूरे देश में खरबों के वारे-न्यारे न हो, तो ऐसे अवतरण का भी क्या मतलब! क्या मोदीजी अडानी और अंबानीजी के ही बने रहेंगे!!
वैसे इस दिन को चिर-स्थायी, शाश्वत और सनातनी बनाने के लिए संघी गिरोह और भी बहुत कुछ कर सकता है। करना भी चाहिए। वैसे भी मोदीजी राम और कृष्ण से बड़े अवतारी पुरुष हैं। जो रामजी पिछले 500 सालों से बेघर थे, उन्हें प्रधानमंत्री आवास देने का काम मोदीजी ने ही किया है, किसी और पार्टी और नेता में कहां इतना दम था! आवास भी इतना बड़ा कि प्रधानमंत्री का सेवा तीर्थ भी शरमा जाएं। रामजी की उंगली पकड़कर मोदीजी ने उन्हें इस आवास में स्थापित किया है। यह अलग बात है कि रामजी की सेवा करने की जिम्मेदारी जिन चौकीदारों को सौंपी थी, वे ही चोर निकले। लेकिन इसमें कोई बुराई नहीं है। यह कहावत तो सबने सुनी है कि सेवा करोगे, तो मेवा मिलेगा।
तो भाईयों-बहनों, रामजी की सेवा मोदीजी और उनके लग्गे-भग्गे करेंगे और बदले में रामजी उन्हें सत्ता में बैठाए रहेंगे, कम से कम 2047 तक तो अवश्य ही। रामजी ने भी कह दिया है, मैं तो त्रेता युग का राजा था, कलयुग के राजा तो ये मोदीजी ही है, जिन्होंने मुझ बेघर को घर दिया! मोदीजी इस धरा पर अवतरित न हुए होते, तो पता नहीं, मुझे और कितनी सदियों तक बेघर भटकना पड़ता!! रामजी की इस घोषणा पर स्वर्ग में मोदीजी के जयकारे लगने लगे, जिसकी आवाज इस मर्त्य लोक में अभी तक गूंज रही है।
अब जब रामजी से बड़े अवतारी पुरुष मोदीजी बन ही गए हैं, तो मोदीजी के अवतरण दिवस को चिर स्थायी बनाने के लिए थोड़ा-सा इतिहास भी बदला जा सकता है। रामजी को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी कि उनकी दिवाली को हर साल 17 सितम्बर को ही मनाने की घोषणा कर दी जाएं। बस एक सरकारी आदेश निकालने भर की जरूरत है। सरकारी फरमान में "आदेशानुसार रामजी" लिखने से ही काम चल जाएगा।इससे जनता भी 17 सितम्बर को दीया जलाने के लिए मजबूर हो जाएगी। दिवाली के दिन तो वैसे भी गरीब से गरीब आदमी भी अपने पकाने की कड़ाही से एक छंटाक तेल बचाकर दीया तो जलाता ही है, दरवाजा भी खोलकर टिमटिमाती रोशनी में बैठे रहता है कि कब लक्ष्मीजी घर में घुसे और वह उसे बंधक बनाकर अपनी गुदड़ी में लपेट लें। लेकिन लक्ष्मीजी भी कम चालाक नहीं है। वह ऐसे गरीबों को घास भी नहीं डालती, उनके मोहल्लों से गुजरना तो दूर की बात है। वह अपने उल्लू पर सवार होकर सीधे मोदीजी से मिलती है और अडानी-अंबानी की तिजोरी में घुस जाती है। यह तिजोरी भी इतनी बड़ी और आलीशान है कि देखती है कि स्वर्ग के सभी देवता तो यही आराम फरमा रहे हैं। फिर तो देवीजी का भी यहां से कहीं और कूच करने का मन ही नहीं करता।
17 सितम्बर को रामजी की दिवाली और मोदीजी का अवतरण दिवस, दो अवतारों का ऐतिहासिक संगम दिवस होगा यह। पूरी दुनिया देखेगी कि इधर रामजी मोदीजी के नाम के दीये जलवा रहे हैं और उधर मोदीजी विपक्ष का दिल जला रहे हैं। विपक्ष खोद-खोद कर बात निकाल रहा है, बात का बतंगड़ बना रहा है, उनके राज-काज की खरी-खोटी सुना रहा है। अरे भाई, पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती, राम राज्य में भी तो शंबूक का सिर कटा था। तो यह कहने का क्या मतलब है कि मोदीजी मनुस्मृति को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। बेचारों को पता ही नहीं है कि राम राज्य का रास्ता तो मनुस्मृति से ही होकर गुजरता है।
अब पूरे एक माह देश के हर गली-कूचे में मोदीजी अवतरित होते रहेंगे। लोग-बाग 'कण कण में भगवान है' की प्रत्यक्ष अनुभूति करके आनंदित होंगे। भारत वर्ष में भयो उल्लास। 17 अक्टूबर तक यह उल्लास चलेगा सेवा संकल्प अभियान के साथ। आशीर्वाद का दीया से लेकर सेवा मेरा अभियान तक संघी गिरोह की सांस्कृतिक झलकियां दिखाई जाएगी। गुजरात में मोदीजी ने जो सेवा की है और अब पूरे भारत वर्ष में कर रहे हैं, उससे उत्साहित संघी गिरोह का हिंदुत्व हुंकारे भर रहा है और मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट थर-थर कांप रहे हैं। अभी तो सड़कों पर दीये जले हैं, मंदिरों से शंख-ध्वनि और आरती सुनी है लोगों ने। आने वाले दिनों में पूरे सेवा भाव से और-और मस्जिदों को खोद-खोद कर मंदिरों को निकाला जाएगा, कृष्ण जन्म भूमि को मुक्त कर भगवान कृष्ण को विराजमान किया जाएगा, आसाराम और राम रहीम हाथ में तिरंगा लेकर बलात्कारियों के समर्थन में जुलूस निकालेंगे, दिमागी नक्सलियों का कत्लेआम किया जाएगा। कांग्रेस राज के 60 सालों में जो-जो नहीं हुआ, वह सब सेवा भाव से किया जाएगा। धर्म स्थलों को राजनीति का अड्डा बनाया जाएगा और भाजपा कार्यालयों से धार्मिक आदेश जारी किए जायेंगे। धर्म को राजनीति में और राजनीति में धर्म को घुसेड़कर जो पाक रस तैयार किया जाएगा, उसे हिंदुत्व की सेवा में समर्पित किया जाएगा। लोगों को इस चरणामृत को चखाकर हिंदू राष्ट्र के लिए रास्ता साफ किया जाएगा। अयोध्या की झांकी को मथुरा, काशी से होते हुए पूरे देश में घुमाया जाएगा। इस झांकी में राम लीला तो होगी ही, भगवान कृष्ण की भी ऐसी-ऐसी लीलाएं होंगी कि लोग एप्सटीन फाइल तक भूल जाएंगे।
1925 से संघी गिरोह यही कर रहा है। लोगों को धर्म, भाषा, जात-पात में बांटना ही उसकी असली सेवा है। चुनाव हारते हैं, तो सेवा करने की उनकी रफ्तार बढ़ जाती है ; जीतते हैं, तो और बढ़ जाती है। इतनी सेवा के बाद भी वे परेशान हैं कि लोग आशीर्वाद का दीया लेकर उसकी बाती को जला क्यों नहीं रहे हैं। और लोग 2029 का इंतजार कर रहे हैं। उन्हें मालूम है कि हिंदू धर्म में दीया कब जलाया जाता है।
( व्यंग्यकार अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650 )
