थाली में भात नहीं, लेकिन सपनों में घी की कमी भी नहीं है !

( आलेख : शमिक लाहिड़ी, अनुवाद : संजय पराते )

     मेरे प्रिय सर,

     प्रार्थना है कि कृपया यह बताइए कि आज हमारे देश पर क्षेत्रीय, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे गंभीर संकट क्या है? अरे नहीं -- माफ़ करना, आपने बहुत ही बेवकूफ़ी भरा सवाल पूछा है! किसी का पेट खाली है या भरा, नौकरी है या नहीं -- ये बहुत-बहुत पुराने, प्रचलन से बाहर के फैशन हैं। आज दुनिया के सामने असली सवाल यह है -- आज रात, क्या आप पनीर खाकर सीधे स्वर्ग का वीआईपी पास हासिल करेंगे, या मटन खाकर नरक की धधकती आग में भुनेंगे?

     हाल ही में, इस गहरी वैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उलझन को सुलझाने के लिए, एक बहुत ही आदरणीय ‘बाबाजी’ ने हमारे बंगाल को अपनी पवित्र मौजूदगी का आशीर्वाद दिया, जिसे राज्य सरकार ने पूरी तरह से प्रायोजित किया था। वे आए, उन्होंने अपने लटके-झटके दिखाए, और हम पर अपने ज्ञान की अनमोल बारिश की। टेलीविज़न न्यूज़ चैनल मुंह फाड़े देखते रहे, जबकि सोशल मीडिया खुशी से झूम उठा। खुद मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एक दर्जन मंत्रियों और ऊंचे अफसरों ने विनम्रता से अपने घुटने टेककर गुरुत्वाकर्षण से भरे इस दिव्य ज्ञान के अमृत का रसपान किया। इसके बाद, पवित्र ‘बाबाजी’ ने अपना बैग जमाया। और तय समय पर राज्य से विदा हो गए -- अपनी एक दयापूर्ण आखिरी नज़र डालते हुए और हमें एक खास गाली देते हुए - “पाखंडी!” बहरहाल, यह तय नहीं हो सका कि उनका मतलब बंगाली समाज से था या बस अचानक वे गहरे आत्म-साक्षात्कार का पल महसूस कर रहे थे।

Thali Mein Bhaat Nahi Sapno Mein Ghee Ki Kami Nahi

     फिर भी, एक बहुत बड़ा फ़ायदा हुआ। बांटने वाला और नफ़रत फैलाने वाला राजनीति का बाज़ार कुछ समय से ऑक्सीजन की भारी कमी से जूझ रहा था, और ‘बाबाजी’ ठीक समय पर पूरे एक हफ़्ते के लिए आपातकालीन सिलेंडर पहुंचाने के लिए आ गए। अब, कोई भी बेरोज़गारी, चावल और चीनी के दाम, या नौकरियों के पूरी तरह के अभाव जैसी बेकार की बातों पर कान नहीं देता। बंगाल ‘मांस बनाम शाकाहार’ के शानदार विश्व युद्ध में खुशी-खुशी डूबा हुआ है। यह पूरा मामला कुछ ऐसा है, जैसे सिर पर बिना छत वाले आदमी को गंभीर सलाह देना – ‘भाई, तुम्हारी यह जो अस्तित्वहीन छत है, उसे भगवा रंग से रंग दें या सफ़ेद?’

     इस खगोलीय घटना के ठीक बाद, एक और भी बड़ी, दुनिया बदलने वाली समस्या सामने आई -- दुर्गा की मूर्ति के हाथ! ग्यारह हाथ! इसे “कैजुअल मिस्टेक” कहा गया!

     देश की बाकी छोटी-मोटी परेशानियाँ चुपचाप हाथ जोड़कर लाइन में खड़ी रहें। सबसे पहले, हमें माँ की बाँहें गिननी चाहिए -- एक, दो, तीन... ग्यारह! तुरंत, न्यूज़रूम में सनसनी फैल गईं, सोशल मीडिया पर सुनामी आ गई, और राजनैतिक मंचों पर बिजली गिर गई। इस बात पर बहस छिड़ गई कि किसकी धार्मिक भावनाएँ कितने मिलीमीटर ज़्यादा गहरी हैं।

     ठीक उसी समय, कहीं किसी कोने में, एक बेवकूफ लड़का सरकारी नौकरी के लिए आवेदन पत्र भर रहा था। उसके पापा की जेबें खाली थीं, और लड़के को अपनी आँखों के सामने तारे दिख रहे थे। लड़के ने मन ही मन सोचा : ग्यारह हाथ होने से माँ की चमत्कारिक ताकत ज़रूर बढ़ती है, लेकिन काश मेरे ये दो हाथ मुझे कांस्टेबल या क्लर्क की नौकरी दिला पाते, तो कम से कम घर में चावल का बर्तन तो उबल जाता!

     आह, हमारी क्या शानदार सभ्यता है! एक ऐसी जगह, जहाँ आप इस बात पर ज़ोरदार बहस कर सकते हैं कि आपकी प्लेट में मटन परोसा जाए या पनीर, लेकिन यह सवाल उठाना कि आप भूखे क्यों मर रहे हैं, एकदम भद्दा माना जाता है! प्राइम-टाइम टेलीविज़न किसी देवता की भुजाओं की सही गिनती पर घंटों हंगामा कर सकता है, लेकिन जैसे ही आप पूछते हैं कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक क्यों नहीं हैं, आपको तुरंत 'दिमागी नक्सल' कह दिया जाता है।

     क्या आप सरकारी कागज़ पर लिखे आंकड़े सुनना चाहेंगे? सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में अकादमिक वर्ष 2025-26 में 6,769 स्कूल सिर्फ़ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं! और क्या आप जानते हैं कि इन एकल-शिक्षक स्कूलों में कितने विद्यार्थी हैं? 2,29,569 विद्यार्थी! आसान शब्दों में कहें तो, एक अकेला शिक्षक एक ही समय में प्रशिक्षक, प्रधानाध्यापक, बाबू और स्कूल की छुट्टी की घंटी बजाने वाले चपरासी की भूमिका निभाता है। काश हमारे राजनीतिक देवता उन अकेले शिक्षकों के कंधों पर आठ हाथ और जोड़ पाते — बिल्कुल देवी की तरह — तो शायद हमारी शिक्षा प्रणाली को बचाया जा सकता था!

     अब, आईने जैसा साफ आध्यात्मिक नज़ारा देखिए। राज्य में 4,133 सरकारी स्कूल हैं, जिनमें एक भी विद्यार्थी नहीं पढ़ता! फिर भी, 19,502 शिक्षक शांति से काम कर रहे हैं और हर महीने का वेतन ले रहे हैं! यह है सच्चा भारतीय आध्यात्मिक दर्शन! जहाँ दो लाख से ज़्यादा बच्चे मुँह खोले शिक्षक का इंतज़ार कर रहे हैं, वहाँ गुरु गायब हैं ; और जहाँ साढ़े उन्नीस हज़ार गुरु शांत, ध्यानावस्था में डूबे रहते हैं, वहाँ विद्यार्थी गायब हो गए हैं!

     ज़ाहिर है, सरकार के आशीर्वाद वाले सर्वव्यापी बाबाजी ने इस नई शिक्षा नीति पर एक भी लाइन बर्बाद नहीं की। वे ऐसा क्यों करेंगे? इसमें कोई टीआरपी रेटिंग तो मिलती नहीं है!

     अगर आप मांस की बात करते हैं, तो एक समूह पागल हो जाता है ; अगर आप शाकाहारी बनने की बात करते हैं, तो दूसरा समूह गुस्सा हो जाता है ; और अगर आप दुर्गा के हाथों पर टिप्पणी करते हैं, तो सब गुस्से से भर जाते हैं। लेकिन जैसे ही आप सर्वत्र विराजमान बेरोज़गारी की बात करते हैं, सब मिलकर इतनी गहरी नींद में सो जाते हैं कि कुंभकर्ण भी शर्म से सिर झुका ले!

     फिर भी 2025 के लिए सावधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के आधिकारिक आंकड़ें क्या कहते हैं? पश्चिम बंगाल में, 15 से 29 साल के युवाओं के लिए सामान्य रूप से बेरोज़गारी की दर 10.6% है। वर्तमान साप्ताहिक स्थिति के हिसाब से यह बेरोज़गारी दर बढ़कर 12.6% हो जाती है! इसका मतलब है कि हर 100 काबिल नौजवानों में से 12-13 युवा सिर पर हाथ रखे बेकार बैठे हैं। जेबें पूरी तरह खाली हैं, फिर भी संत प्यार से पूछते हैं—"पहले मुझे बताओ, बच्चा, कि नाश्ते में तुमने कटहल का बीज खाया था, या मटन?"

     नीति आयोग के बहीखाते का दावा है कि देश में गरीबी कम हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, बहुआयामी गरीबी 2015-16 में 24.85% से घटकर 2019-21 में 14.96% हो गई है और अनुमान है कि 2022-23 में यह और घटकर 11.28% हो गई है। बेशक, ये सरकारी आंकड़े हैं, जो असलियत से काफी दूर रहते हैं। फिर भी, कितनी खुशी की खबर है!

     लेकिन क्या गरीबी में कमी का मतलब यह है कि गरीबी सच में खत्म हो गई है?

     गरीबी सिर्फ़ खाली बटुआ नहीं है, मेरे दोस्त! नीति आयोग का अपना सूचकांक भी यह मानता है — पोषण, स्कूली शिक्षा, पीने का पानी, सफ़ाई, बिजली और घर -- ये सब मिलकर गरीबी को परिभाषित करते हैं। कोई इंसान सिर्फ़ पेट की भूख से गरीब नहीं होता ; वह जानकारी की भूख, पढ़ाई की भूख, नौकरी की भूख और इज़्ज़त की भूख से भी परेशान होता है। लेकिन कोई भी खुद को बाबा कहने वाला इन बेमतलब की भूखों के बारे में कभी उपदेश नहीं देता, यह कहते हुए कि : "देखो, मेरे भक्तों, जिस दिन इस देश के हर युवा को नौकरी मिल जाएगी, मैं अपना व्रत तोड़ दूँगा!"

     वे ऐसा क्यों करेंगे? नौकरियां देने के लिए बजट, टैक्स जवाबदेही और कारखाने लगाने की जरूरत पड़ती हैं। जबकि शाकाहारी बनाम मांसाहारी या दस हाथ बनाम ग्यारह पर गाली-गलौज करने से काम चल जाता है। आपको बस एक माइक्रोफोन और दो कैमरे चाहिए, और बस — काम हो गया! इसे फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिए प्रचारित कर दें, और पूरे देश में एक शानदार आग लग जाएगी, जो पास के किसी कारखाने में लगी आग से भी तेज़ी से फैल जाएगी।

     और कारखानों और उद्योग की बात करें — तो आप पूछ सकते हैं, राज्य में नए उद्योग कहाँ हैं?

     उफ़, कितना बेतुका, कितना पुराना सवाल है! उद्योग के बारे में बात करने का मतलब है फाइलें खोलना, आने वाले निवेश का हिसाब रखना, और ज़मीन, पानी और बिजली का हिसाब लगाना। लेकिन कितना आसान है यह पूछना कि : "क्या आप मटन खाते हैं या शाकाहारी हैं?" या "माँ दुर्गा के कितने हाथ हैं?" इसके लिए अर्थशास्त्र की मोटी-मोटी किताबें पढ़ने की ज़रूरत नहीं है!

     क्या आप इसका सबसे बड़ा फ़ायदा जानते हैं? खाना और धर्म आपको आसानी से दो लड़ने वाले खेमों में लोगों को बांटने का मौका देता है। लेकिन आप बेरोज़गारी का इस्तेमाल करके लोगों को नहीं बांट सकते। एक बेरोज़गार हिंदू नौजवान और एक बेरोज़गार मुस्लिम नौजवान की तकलीफ़ और भूख एक जैसी होती है। दोनों को नौकरी चाहिए, दोनों को खाने के लिए चावल और दाल चाहिए, दोनों को अपने बूढ़े पिताओं के लिए दवा चाहिए। और यही एक जैसी बात बाबाओं के राजनैतिक बाज़ार के लिए खतरनाक रूप से जानलेवा है!

     तो चालाक शासक दोनों को एक-दूसरे से लड़ाने के लिए बीच में एक कंचा फेंकते हैं : तुम क्या खाते हो? तुम्हारी देवी का रूप क्या है? इस बीच — मेरी नौकरी कहाँ है? मेरे स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं हैं? मेरे इलाके में कोई कारखाना क्यों नहीं है? मेरे घर में पीने का पानी क्यों नहीं है? — ये सभी सवाल चुपचाप ब्रह्मांडीय शून्य में विलीन हो जाते हैं।

     सच तो यह है, सर, इस देश में पेट्रोल या डेटा सबसे महंगी चीज़ें नहीं हैं। सबसे कीमती चीज़ इंसान का ध्यान है। आपका ध्यान कहाँ तक जाता है और कहाँ फँस जाता है — वही असली राजनीति है। अगर आप अपना पूरा दिन टीवी पर संत के प्रवचन देखते हुए और अपने खाने की थाली में क्या है, इस पर बहस करते हुए बिताएँगे, तो आपको अपने बच्चे के भविष्य पर सवाल उठाने का समय कहाँ मिलेगा?

     तो उन बाबाओं को दोष देने का कोई मतलब नहीं है। वे आएंगे, हमारी आँखों में धूल झोंकेंगे, आपका पैसा अपनी जेब में डाल लेंगे, और चले जाएँगे। असली सवाल हमसे है : क्या हम हर बार एक ही जाल में फँसेंगे?

     अगर आज कोई भूखे इंसान के सामने खड़ा होकर पूछे, "भाई, मांस खाओगे या शाक-भाजी?" तो वह गुस्से में चिल्लाएगा — "पहले मुझे चावल दे बदमाश, नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊंगा!" पहले कुछ अनाज पेट में जाने दो ; दर्शन  पर बाद में बात हो सकती है।

     यह एक पक्का, एकदम पक्का सच है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। इंसान के लिए पहला धर्म ज़िंदा रहना है। और ज़िंदा रहने की पहली शर्त है पेट में चावल के दो दाने डालना।

     बाकी सब झगड़े बाद में हो सकते हैं। देवी की भुजाएँ बाद में गिनी जा सकती हैं, और साधु-संतों के उपदेश आखिर में सुने जा सकते हैं। लेकिन उससे पहले, आओ भाई — पता करते हैं :

• क्या इस देश में आम आदमी के हाथ में खाना है?

• क्या हमारे नौजवानों के हाथ में काम है?

• क्या उन 6,769 स्कूलों में 2,29,569 बच्चों के पास पर्याप्त शिक्षक हैं?

• और क्या उन 4,133 स्कूलों में 19,502 शिक्षकों के सामने कोई विद्यार्थी है?

     अरे नहीं! यह गणित बहुत कठिन और उलझाने वाला है! शायद इसीलिए, आज तक, कोई भी पवित्र बाबाजी इस खास गणित को हल करने के लिए नहीं आए!

आपका,

शमिक लाहिड़ी

( लेखक माकपा के केंद्रीय समिति सदस्य, बांग्ला दैनिक गणशक्ति के संपादक और पूर्व सांसद हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650 )