( आलेख : सुभाष गाताडे )
एक बिल्ली आँखें बंद करके दूध पीती है और सोचती है कि दुनिया उसे देख नहीं रही है। — एक संस्कृत सुभाषित
एक सदी बीत गयी, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से हिन्दुओं के संगठन (इसके बजाए इसे ‘हिन्दू पुरुषों‘ का संगठन कहना वाजिब होगा, क्योंकि इसमें हिन्दू महिलाओं को प्रवेश नहीं मिल सकता) की नींव पड़ी, जब नागपुर में डॉक्टर हेडगेवार, उनके राजनीतिक मार्गदर्शक डॉ. बी एस मुंजे और विनायक दामोदर सावरकर के भाई बाबाराव सावरकर तथा अन्य दो सहयोगियों ने संघ की स्थापना की। पिछले ही साल उसके निर्माण की सदी मनाई गयी थी।
आज संघ अपनी कामयाबी के उरूज़ पर कहा जा सकता है, जबकि उसके आनुषंगिक संगठन भारतीय जनता पार्टी के हाथों में सत्ता की बागडोर है, और उसके अन्य सहयोगी जमातों के कारिंदे देश के अग्रणी संस्थाओं को नियंत्रित कर रहे हैं ; हालाँकि यह भी उतना ही सही है कि उसके निर्माण, उसके संचालन और उसकी भूमिका को लेकर वह हमेशा विवादों में रहा है। पिछले दिनों कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियंक खड़गे ने आरएसएस के पंजीकरण, उसके द्वारा किये जा रहे अकूत धन संग्रह और उसके हिसाब-किताब की जब बात उठायी, तब ये सवाल फिर ज़िंदा हो गए।

शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रमों में संघ के प्रभाव में लाये जा रहे बदलावों के बारे में अक्सर बात होती है, मगर इसी क़िस्म की कवायद में संघ अपने अतीत को लेकर भी सक्रिय है – यह बात ज़्यादा लोग नहीं जानते।]
1. “किसी के सिर पर एक सनक सवार है…” : ताजमहल या तेजो महालय ?
अपनी दिवगंत पत्नी मुमताज़ महल की याद में मुग़ल सम्राट शाहजहाँ (1592–1666) द्वारा बनाया मकबरा/समाधि – जो इंडो-इस्लामिक मुग़ल स्थापत्य कला की मिसाल समझा जाता है और दुनिया भर के यात्रियों के बीच ज़बरदस्त आकर्षण के केंद्र में रहता आया है, उसे लेकर एक बहस हिंदुत्व खेमे द्वारा बीते कई दशकों से चलायी जा रही है, जिसका ज़ोर यह साबित करने पर है कि वह मक़बरा नहीं, बल्कि शिव मंदिर है अर्थात तेजो महालय है। हालाँकि आला अदालत से लेकर इतिहासकारों द्वारा इस मनगढ़ंत को बार-बार ख़ारिज किया जाता रहा है, लेकिन हिंदुत्ववादी ताक़तें अपनी संकीर्ण सियासत को आगे बढ़ाने के लिए समय-समय पर उसे उछालती रहती हैं।
याद रहे कि भारतीय सेना से सेवानिवृत्त पी एन ओक द्वारा सम्भवतः साठ के दशक में इसे पहले उठाया गया था। अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में गठित एनडीए के पहले कार्यकाल (वर्ष 2000) के दौरान उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसमें ताजमहल का इतिहास बदलकर यह घोषित करने की माँग की गई थी कि उसका निर्माण एक हिंदू राजा ने कराया था। संभवतः उस समय का अनुकूल राजनीतिक वातावरण उन्हें और अधिक वैधता प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर रहा था, लेकिन वे दुर्भाग्यवश ग़लत साबित हुए। सर्वोच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की खंडपीठ ने इस ‘भ्रामक’ याचिका को इन टिप्पणियों के साथ खारिज कर दिया : ‘किसी के सिर पर एक सनक सवार है, इसलिए यह याचिका दायर की गई है।’
यह रेखांकित करने योग्य है कि ऐसे झटकों ने इस सज्जन को भारत के ‘वास्तविक इतिहास’ को फिर से लिखने और उसका प्रचार करने के अपने ‘मिशन’ से नहीं रोका, जिसमें वे 1960 के दशक से लगे हुए थे। मराठी जानने वाला कोई भी व्यक्ति इसकी पुष्टि कर सकता है कि उनके लेख वहाँ की मराठी पत्रिकाओं में तब से प्रकाशित होने लगे थे, जब हिंदुत्व वर्चस्ववादी आंदोलन अभी हाशिए पर था। यह भी भूलना नहीं चाहिए कि आप उसे संकीर्णतावादी चिंतन का नतीजा कहें या सांप्रदायिक विचारों का प्रभाव, लेकिन ओक के ‘विचित्र दावों’ की भी पढ़े-लिखों के एक हिस्से में स्वीकार्यता थी।
यद्यपि पी. एन. ओक के सभी दावे — जैसे कि ‘ईसाई धर्म और इस्लाम दोनों हिंदू धर्म से निकले हैं’, या ‘ताजमहल की तरह कैथोलिक वेटिकन, काबा और वेस्टमिंस्टर ऐबी भी कभी शिव के हिंदू मंदिर थे’, या ‘वेटिकन मूलतः एक वैदिक रचना थी, जिसे वाटिका कहा जाता था और पोप का पद भी मूलतः एक वैदिक पुरोहित परंपरा थी’, अथवा भारत में इस्लामी वास्तुकला के उनके पूर्णतः निषेध — मुख्यधारा में स्वीकार नहीं किए गए, बल्कि अकादमिक जगत में अस्वीकार कर दिए गए ; फिर भी उन्हें हिंदुत्व दक्षिणपंथ में लोकप्रिय समर्थन मिला, जिसने 1980 और 1990 के दशक में नई गति पकड़ी थी।
हिंदुत्व के दायरों के भीतर भी कुछ असहमति के स्वर थे, जिन्होंने ओक की लोकप्रियता को हिंदू कार्यकर्ताओं के बीच ‘घोर अपरिपक्वता’ का संकेत बताया, लेकिन ऐसे स्वर अल्पमत में थे। बेल्जियम के ओरिएंटलिस्ट और इंडोलॉजिस्ट कोएनराड एल्स्ट — जो हिंदुत्व के प्रति सहानुभूति रखते हैं — उनमें से एक थे। एनआरआई/पीआईओ समुदायों में ओक की ‘स्थायी लोकप्रियता’ का उल्लेख करते हुए और ताजमहल, लाल किला तथा विक्रमादित्य से संबंधित ओक के विभिन्न ‘ऐतिहासिक और भाषाई सिद्धांतों’ का खंडन करते हुए उन्होंने ज़ोर देकर कहा :
"समकालीन हिंदू कार्यकर्ताओं के बीच पी. एन. ओक के सिद्धांतों की लोकप्रियता घोर अपरिपक्वता का संकेत है। यह भारतीय इतिहास में धार्मिक संघर्ष के तथ्यों को लेकर भ्रम के साथ–साथ आत्ममुग्ध लालच और बाहरी लोगों द्वारा निर्मित हर प्रकार की मूल्यवान वस्तु पर हास्यास्पद स्वामित्व का दावा करने की विकृत इच्छा को दर्शाती है (मानो हिंदू धर्म की वास्तविक उपलब्धियाँ गर्व करने के लिए पर्याप्त न हों)।"
जैसा कि अपेक्षित था, इस आलोचना के बावजूद पी. एन. ओक या उनके विचारों की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। यदि गहराई से देखा जाए, तो मुस्लिम शासकों द्वारा निर्मित स्मारकों और इमारतों के बारे में हिंदुत्व समर्थकों के अनेक दावों की जड़ें ओक के लेखन में मिलती हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ताजमहल का नाम बदलने संबंधी ओक की याचिका ख़ारिज किए जाने के काफी समय बाद भी, हिंदुत्व परिवार के एक प्रमुख नेता — जो कभी संसद सदस्य भी रह चुके थे — ने इसी ‘सिद्धांत’ को दोहराया। यह भी याद किया जा सकता है कि जब प्रो. वाई. सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया (2015), तो उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि वे बीआईएसएस (भारतीय इतिहास संकलन समिति) से जुड़े थे, जो स्वयं ओक द्वारा स्थापित संगठन था।
पी. एन. ओक [1917 -2007] का लगभग दो दशक पहले निधन हो चुका है, लेकिन हिंदुत्व वर्चस्ववादी शक्तियों का “आक्रमणकारियों और उपनिवेशवादियों द्वारा तैयार भारत के इतिहास के पक्षपाती और विकृत संस्करणों” को ‘सुधारने’ का उत्साह अब हास्यास्पद स्तर तक पहुँच गया है। स्थिति यह है कि वे ‘हर मस्जिद में शिवलिंग’ खोजने पर आमादा हैं, जैसा कि कुछ समय पहले उनके संघ के सुप्रीमो ने रेखांकित किया था। हमें यह उपदेश भी दिया जा रहा है कि यह ‘आक्रमणकारी मानसिकता भारत के लिए एक खतरा है।’
2. इतिहास का पुनर्लेखन : अपने घर से ही शुरुआत?*
इतिहास के पुनर्लेखन की यह मुहिम स्वयं आरएसएस के अपने इतिहास को भी अछूता नहीं छोड़ पाई है। इस प्रयास की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति हमारे सामने डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (1888–1940), आरएसएस के संस्थापक सदस्य और उसके प्रथम सर्वोच्च नेता, की नई छवि के रूप में दिखाई देती है। उन्हें अब ‘जन्मजात देशभक्त’, ‘भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले महान क्रांतिकारियों में से एक’, ‘समाज सुधारक’, ‘आधुनिक भारत के निर्माता’ आदि-आदि कहा जा रहा है। यह इस तथ्य की पूरी तरह उपेक्षा करता है कि अपने पूरे जीवन में उन्होंने अपना ध्यान हिंदू एकता के निर्माण, भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने पर दिया। वे औपनिवेशिक विरोधी आंदोलन के दौरान जेल अवश्य गए थे, लेकिन आरएसएस के सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के सदस्य के रूप में। आज़ादी के पहले संघ का इतिहास इस बात की गवाही देता है कि उन्होंने अपने गुरु बी एस मुंजे (जो हिन्दू महासभा से सम्बद्ध थे), बाबाराव सावरकर आदि के साथ मिलकर जिस ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘ की स्थापना की थी (1925), उसने कभी भी अपने कार्यकर्ताओं को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में शामिल होने का आह्वान नहीं किया।
अनेक मोनोग्राफ, पुस्तकें और पहले प्रकाशित ग्रंथों के संशोधित संस्करण — जो हिंदुत्व के प्रति सहानुभूति रखने वाले लेखकों द्वारा लिखे गए हैं — भी प्रकाशित हुए हैं, जो उनकी इस नई छवि पर ज़ोर देने का प्रयास करते हैं। वे उनके उथल-पुथल भरे जीवन के कई असुविधाजनक पहलुओं को मिटा देते हैं या उन पर रणनीतिक चुप्पी साध लेते हैं। इसी श्रृंखला में नवीनतम उदाहरण यह है कि उन्हें महाराष्ट्र के पुसद में आयोजित “जंगल सत्याग्रह” का नेता बताया जा रहा है, जिसे कांग्रेस के नेतृत्व वाले सविनय अवज्ञा आंदोलन के एक हिस्से के रूप में आयोजित किया गया था।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि आरएसएस के इतिहास के ‘पुनर्लेखन’ का सिलसिला अपने ‘परिवार’ के अंदर से ही शुरू होता दिखता है। ऐसी अधिकांश जीवनियाँ मुख्य रूप से डॉ. हेडगेवार को ही आरएसएस की स्थापना का श्रेय देती हैं तथा सुविधाजनक ढंग से इस तथ्य को भुला देती हैं कि जिस बैठक में (जो विजयादशमी के दिन नागपुर में आयोजित हुई थी) ऐसे संगठन की स्थापना का निर्णय लिया गया था, उसमें डॉ. बी. एस. मूंजे, डॉ. एल. वी. परांजपे, डॉ. बी. बी. थालकर और बाबूराव सावरकर — विनायक दामोदर सावरकर के भाई भी उपस्थित थे, और ये सभी हिंदू महासभा से जुड़े हुए थे। यह समझना कठिन नहीं है कि महासभा के इन नेताओं का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता, क्योंकि वर्तमान आरएसएस नेतृत्व को आशंका है कि इससे हेडगेवार को अन्य सभी से ऊपर एक महान नेता के रूप में प्रस्तुत करने के उनके प्रयास प्रभावित होंगे।
डॉ. बी. एस. मूंजे हेडगेवार के मार्गदर्शक थे। उन्हीं के प्रयासों से हेडगेवार को कलकत्ता में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त हुई। याद रहे, मुंजे स्वयं इटली जाकर मुसोलिनी से मिले थे, ताकि वहाँ के प्रयोगों से सीख सकें। उन्होंने स्वयं कहा था कि “हमारी संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)” में इन्हें लागू किया जाएगा।
पितृसंगठन और उसके प्रमुख नेताओं की छवि को नया रूप देने की यह प्रक्रिया काफी समय से चल रही है, लेकिन नरेंद्र मोदी — जो स्वयं संगठन के प्रचारक रहे हैं — के नेतृत्व में भाजपा के एक दशक से अधिक पहले सत्ता में आने के बाद इसे एक नई गति मिली है।
3. ‘भविष्य का भारत’
अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में पहले कार्यकाल के दौरान आरएसएस द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम — जो संगठन के पूरे इतिहास में अपनी तरह का पहला कार्यक्रम था — इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। इसके तहत आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का शीर्षक था ‘भविष्य का भारत’, जिसका आयोजन स्वयं आरएसएस ने राष्ट्रीय राजधानी में किया था, जिसमें उसके सर्वोच्च नेता मोहन भागवत मुख्य वक्ता थे। इसे अपनी तरह का पहला कार्यक्रम — एक जनसंपर्क अभियान — बताया गया था, जिसका उद्देश्य संघ के विभिन्न मुद्दों पर दृष्टिकोण को स्पष्ट करना, उसकी विचारधारा और कार्यप्रणाली को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करना था। इसी उद्देश्य से समाज के विभिन्न क्षेत्रों से लोगों को इसमें आमंत्रित किया गया था। जब यह समाचार आया कि संघ प्रमुख सीधे अमेरिका से दिल्ली पहुँच रहे हैं — जहाँ वे शिकागो में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण की 125वीं वर्षगाँठ के समारोह में भाग लेने गए थे — तो इस प्रतीकात्मकता पर लोगों का ध्यान गया।
यह दर्ज है कि ‘भविष्य का भारत’ विषय पर आयोजित इस तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का अनेक टीवी चैनलों पर सीधा प्रसारण हुआ और टिप्पणीकारों के बीच मानो ‘बदले हुए आरएसएस’ की प्रशंसा करने की होड़ लग गई। अनेक उदारवादी भी इस भिन्न प्रकार के हिंदुत्व से प्रभावित दिखाई दिए, जहाँ वर्तमान सरसंघचालक ने स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस की भूमिका की सराहना की या यहाँ तक कि उस भाषण का उल्लेख किया, जो कथित रूप से सर सैयद अहमद ने आर्य समाज द्वारा सम्मानित किए जाने के अवसर पर दिया था। शायद उनके लिए यह भी आश्वस्त करने वाला था कि अपने भाषण में उन्होंने संविधान की प्रशंसा की और उसी क्रम में यह भी कहा कि : “हिंदू राष्ट्र का अर्थ यह नहीं है कि उसमें मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। ... हम भारतीय संविधान का सम्मान करते हैं। इसे बनाने में बहुत विचार किया गया है। यह सर्वसम्मति से बनाया गया था। संघ कभी भी संविधान के विरुद्ध नहीं गया।”
दिलचस्प बात यह थी कि भागवत ने भारतीय संविधान के बारे में सकारात्मक बातें कहीं, उसकी रचना में लगे विचार और प्रयास की सराहना की, यह भी कहा कि पूरा कार्य ‘सर्वसम्मति’ से हुआ था, और यह भी रेखांकित किया कि उनका संगठन अब उसका सम्मान करता है।
सुनने में यह सब बहुत अच्छा लगा। लेकिन भागवत की ओर से यह स्पष्ट करना आवश्यक था कि आखिर आरएसएस ने संविधान का ‘सम्मान’ करना कब से शुरू किया, क्योंकि इससे कुछ ही महीने पहले उन्होंने स्वयं हैदराबाद में अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद को संबोधित करते हुए “देश की मूल्य–व्यवस्था के अनुरूप संविधान और न्यायशास्त्र में परिवर्तन” की वकालत की थी।
उनसे यह भी पूछा जा सकता था कि हिंदू राष्ट्र की पूरी अवधारणा — जो एक विशेष धर्म के लोगों की श्रेष्ठता पर आधारित है — संविधान के साथ कैसे संगत हो सकती है, जबकि संविधान प्रत्येक व्यक्ति को उसके धर्म, लिंग, जाति, क्षेत्र या नस्ल की परवाह किए बिना समान अधिकार और अवसर की गारंटी देता है। एक पूरक प्रश्न यह भी हो सकता था कि “हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों का स्थान क्या होगा?” क्या वह स्थान निज़ाम–ए–मुस्तफ़ा या किसी इस्लामी राष्ट्र में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति के समान होगा, या उससे भिन्न? क्या अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक हिंदुओं की ‘कृपा’ पर ही जीवन बिताते रहेंगे — जैसा कि भागवत के पूर्ववर्तियों ने दावा किया था — एक औपचारिक पदानुक्रमित संबंध में, मूलतः द्वितीय श्रेणी के नागरिकों के रूप में? या उन्हें भी राष्ट्र पर समान अधिकार प्राप्त होंगे? क्या उन्हें अब भी ‘आंतरिक शत्रु’ घोषित किया जाएगा, जैसा कि दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'बंच ऑफ थॉट्स' में प्रतिपादित किया था?
दिलचस्प बात यह भी थी कि भागवत ने अपने भाषण में बड़ा ज़ोर देकर कहा था कि आरएसएस एक ‘लोकतांत्रिक संगठन’ है, जो कथित रूप से अपने किसी भी सहयोगी संगठन पर “रिमोट कंट्रोल” नहीं चलाता और न ही “वर्चस्व” स्थापित करने की आकांक्षा रखता है।
यह अलग बात है कि आरएसएस आज भी देश की लगभग आधी आबादी — अर्थात महिलाओं — को समान सदस्य के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, जिससे वह मूलतः हिंदू पुरुषों का संगठन बना रहता है। अब यह इतिहास का हिस्सा है कि नागपुर की ही लक्ष्मी केलकर, जो स्वयं डॉ. हेडगेवार की समकालीन थीं और संगठन द्वारा किए जा रहे हिंदू एकता के कार्य से प्रभावित थीं, उन्होंने हेडगेवार से अनुरोध किया था कि महिलाओं को भी संगठन में शामिल होने दिया जाए। इस प्रस्ताव को डॉ. हेडगेवार ने तत्काल अस्वीकार कर दिया और उन्हें महिलाओं के लिए अलग संगठन बनाने की सलाह दी।
एक हस्तक्षेपकारी के रूप में इस बात का उल्लेख करना मौजूं होगा कि इस मोर्चे पर – अर्थात स्त्रियों को संगठन में शामिल न करने के मसले पर – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मिस्र में बने संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जैसा दिखता है, जिसका निर्माण (1928) हसन अल बन्ना ने किया था। इसने भी अपनी ‘भगिनी ब्रिगेड‘ का निर्माण किया है और अपने विशाल दायरे में फैले उसके पितृसंगठन में एक भी स्त्री को स्थान नहीं दिया गया है।
अंत में, उस ‘ऐतिहासिक जनसंपर्क कार्यक्रम’ में उपस्थित लोगों और विश्लेषकों को सबसे अधिक आश्चर्य इस बात पर हुआ कि मोहन भागवत ने स्वयं आरएसएस के दो वरिष्ठ नेताओं — दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर (21 जून 1940–5 जून 1973) और तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस (5 जून 1973–मार्च 1994) — के बारे में लगभग पूर्ण मौन बनाए रखा। आख़िर ऐसी क्या बात थी, जिसने उन्हें उनके नाम और कार्यों का उल्लेख तक करने से रोक दिया, जबकि वे ‘परिवार’ के बाहर के अनेक लोगों का उल्लेख करने में काफ़ी उदार थे?
एक प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक के संवाददाता/विश्लेषक ने तो यह भी गिना कि भागवत ने “अपने पहले दो दिनों के व्याख्यानों में 32 अलग–अलग व्यक्तित्वों का कुल 102 बार उल्लेख किया, ताकि यह दिखाया जा सके कि संघ विविध स्रोतों की श्रेष्ठ बातों को आत्मसात करता है।” वहीं आरएसएस के संस्थापक “के. बी. हेडगेवार का सबसे अधिक बार उल्लेख हुआ” और भागवत ने “महात्मा गांधी, बी. आर. आंबेडकर, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, एम. एन. रॉय, एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद ख़ान तथा कुछ कम प्रसिद्ध संघ नेताओं के साथ–साथ बुद्ध, ज़रथुस्त्र, रामकृष्ण परमहंस, दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, गुरु नानक और शिवाजी” का भी उल्लेख किया।"
रिपोर्टों के अनुसार गोलवलकर का उल्लेख तीसरे दिन प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान हुआ। संगठन के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस की स्थिति तो और भी दयनीय रही — उनका नाम तक नहीं लिया गया। यह समझ से परे प्रतीत हो सकता है कि संगठन का वर्तमान सर्वोच्च नेता ‘भारत के भविष्य’ पर अपने विचार रखते हुए, संगठन से किसी भी प्रकार से जुड़े न रहने वाले लोगों को उसके ‘बदले हुए स्वरूप’ के बारे में समझाने का प्रयास करते हुए, संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है, अनेक ऐसे लोगों का उल्लेख करता है जो या तो संगठन से जुड़े नहीं थे या उसकी गतिविधियों के आलोचक रहे थे, लेकिन उन दो प्रमुख नेताओं का नाम तक लेने से बचता है, जिन्होंने लगभग आधी शताब्दी तक संगठन का नेतृत्व और मार्गदर्शन किया।
क्या यह चुप्पी अनजाने में थी, या फिर ‘परिवार’ का एक सोचा-समझा निर्णय?
4. संघ परिवार गोलवलकर को भूलना क्यों चाहता है ?
अब यह इतिहास का हिस्सा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सदस्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वयं माधव सदाशिव गोलवलकर को अपनी मृत्यु के बाद संगठन का नेतृत्व करने के लिए नामित किया था, जिन्होंने आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक के तौर पर पदभार तुरंत संभाला था।
आरएसएस के अधिकांश विद्यार्थी इस तथ्य की अनदेखी कर देते हैं कि गोलवलकर औपचारिक रूप से 1937 में ही संगठन से जुड़े, वह भी एक टेढ़े-मेढ़े सफ़र से गुज़रने के बाद। उनके जीवनीकार यह भी बताते हैं कि वे पहले रामकृष्ण आश्रम में शामिल होकर संन्यासी बनना चाहते थे। उन्होंने अपने गुरु से 1937 में दीक्षा भी प्राप्त की थी और इस प्रकार उस संन्यासी परंपरा में प्रवेश किया था। लेकिन बाद में उनका मन बदल गया और उन्होंने शीघ्र ही उसे छोड़ दिया।
हेडगेवार के मार्गदर्शन और उनके द्वारा प्रदान किए गए दृष्टिकोण के अंतर्गत ही संगठन के नए स्वयंसेवक गोलवलकर ने अपनी पहली और अत्यंत विवादास्पद पुस्तक 'वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड' (1938–39) लिखी। डॉ. हेडगेवार ने इसके प्रकाशन में विशेष रुचि ली थी और अपने व्यक्तिगत मित्र माधव श्रीहरि अणे, जो कांग्रेस पार्टी के नेता थे, से इसकी भूमिका लिखने का भी आग्रह किया था। संघ के भीतर गोलवलकर गुरुजी — जिन्हें लोकप्रिय रूप से इसी नाम से जाना जाता है — को संगठन का “प्रधान शिल्पकार” कहा जाता है और समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचने के लिए संबद्ध (अनुषांगिक) संगठनों का नेटवर्क बनाने की संगठन की विशिष्ट पद्धति का श्रेय उन्हें दिया जाता है।
बालासाहेब देवरस, जो आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक बने — जो गोलवलकर से पहले संगठन में शामिल हुए थे और युवावस्था में ही एक संगठनकर्ता के रूप में उभरे थे — उन्हें इस बात के लिए याद किया जाता है कि उन्होंने आरएसएस को किसी भी अन्य सरसंघचालक की तुलना में सामाजिक सक्रियता से अधिक गहराई से जोड़ा और उसके जनाधार का विस्तार किया। हालांकि वे यह कार्य गोलवलकर की मृत्यु के बाद ही कर सके।
इस तथ्य को देखते हुए कि आरएसएस एक अत्यंत अनुशासित संगठन है, यह मान लेना अत्यधिक भोलेपन की बात होगी कि इन दोनों दिग्गजों को औपचारिक रूप से हाशिए पर डालना, तीन दिन की व्याख्यान शृंखला में उनके बारे में ठीक से बात न करना, केवल मोहन भागवत का व्यक्तिगत निर्णय रहा होगा। अधिक संभावना यही प्रतीत होती है कि आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व के बीच इस बात पर सहमति बन गई थी कि जितनी अधिक चर्चा गोलवलकर या देवरस की होगी, उतना ही कठिन होगा डॉ. हेडगेवार की छवि को “महामानव” के रूप में प्रस्तुत करना।
माधव सदाशिव गोलवलकर की जयंती — जो आरएसएस द्वारा आयोजित उस “ऐतिहासिक संवाद” कार्यक्रम के एक वर्ष बाद आई — संघ परिवार के भीतर बदले हुए परिदृश्य का संकेतक मानी जा सकती है। इस पर व्यापक रूप से किसी का ध्यान नहीं गया। एक राष्ट्रीय दैनिक में हिंदुत्व ब्रिगेड के एक दूसरे दर्जे के नेता द्वारा लिखे गए एक इक्का-दुक्का लेख को छोड़ दें, तो शीर्ष नेतृत्व में से किसी ने भी संघ के दूसरे प्रमुख, जिन्होंने संगठन के संस्थापक के.बी. हेडगेवार के बाद नेतृत्व संभाला था, को याद करना भी आवश्यक नहीं समझा।
दिलचस्प बात यह रही कि ट्विटर पर सक्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के हुनर हाट में लिट्टी-चोखा खाने के अपने अनुभव पर तो ट्वीट किया, लेकिन उस दिन उनके टाइमलाइन पर गोलवलकर का एक भी उल्लेख नहीं था। यह कुछ अजीब लगा, क्योंकि अपनी पुस्तक ‘ज्योतिपुंज’ में – जिसका प्रकाशन जनाब मोदी के गुजरात मुख्यमंत्री पद के दौरान किया गया था – उन्होंने “महानतम समाजसेवियों” का जो वर्णन किया है, जिन्होंने “मातृभूमि को आलोकित करने के लिए अपना जीवन जला दिया,” इसमें उन्होंने गोलवलकर पर चालीस पृष्ठ समर्पित किए थे। उन्होंने लिखा था : “गोलवलकर गुरुजी का जीवन समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है। गुरुजी में वे सभी गुण थे, जिनकी अपेक्षा अपने लक्ष्य के लिए जीने वाले व्यक्ति से की जाती है — धैर्य, दृढ़ निश्चय और निरंतरता।” एक हस्तक्षेपकारी के तौर पर यह भी बता दें कि इस किताब का एक अध्याय संघ के वर्तमान सुप्रीमो मोहन भागवत के पिता पर भी केंद्रित था – जो कुछ समय तक संघ की तरफ से राज्य का जिम्मा संभाल रहे थे।
क्या मोदी और उनके वरिष्ठ सहयोगियों की यह चुप्पी अनजाने में थी या जानबूझकर? यह विश्वास करना कठिन है कि वे सभी मिलकर आरएसएस के सबसे लंबे समय तक (1940–1973) सरसंघचालक रहे व्यक्ति को अनजाने में भूल गए होंगे।
यह उस दौर से बिल्कुल अलग दृश्य था, जब उनकी शताब्दी जयंती (2006) मनाई गई थी। उस समय पूरे देश में ब्लॉक स्तर पर “हिंदू रैलियाँ” आयोजित करते हुए एक व्यापक अभियान चलाया गया था। सेमिनार, संगोष्ठियाँ और व्याख्यान आयोजित किए गए, ताकि “श्री गुरुजी के विचारों और दृष्टि का प्रचार किया जा सके”, जैसा कि आरएसएस के मुखपत्र 'ऑर्गनाइजर' ने कहा था।
वह ऐसा दौर था, जब “गोलवलकर का महिमामंडन” उन्हें “मानव स्तर से कुछ ऊपर” स्थापित कर रहा था, जैसा कि प्रो. जी. पी. देशपांडे, – जो अग्रणी मार्क्सवादी विचारक और नाटककार भी थे तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उस वक़्त अध्यापन कर रहे थे – ने उस समय 'इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली' में प्रकाशित एक लेख में लिखा था। देशपांडे “गोलवलकर” के नाम के साथ “श्री” जोड़ने की ओर संकेत कर रहे थे, जिसने उन्हें “लगभग पवित्र, किसी अवतार जैसा” बना दिया : “महाराष्ट्र के संदर्भ में इसका एक अतिरिक्त अर्थ या संकेत भी है। रहस्यवादी गुरुओं को प्रायः ‘श्री गुरुजी’ कहा जाता है। इस प्रकार आप देख सकते हैं कि गोलवलकर का अत्यंत सूक्ष्म महिमामंडन किया गया, और यह नया संबोधन उन्हें मानवीय स्तर से कुछ ऊपर स्थापित करता है।”
तीन दिवसीय कार्यक्रम इस बात का स्पष्ट संकेत था कि “श्री गुरुजी” को धीरे-धीरे अदृश्य बनाने की यह प्रक्रिया किसी एक व्यक्ति का निर्णय नहीं था। यह केवल भागवत का नहीं, बल्कि संघ परिवार के सभी प्रमुख नेताओं का सामूहिक विचार था कि सार्वजनिक रूप से उनके नाम का उल्लेख करने से बचा जाए। इसका अंत कार्यक्रम के तीसरे दिन प्रश्नोत्तर सत्र में हुआ, जब यह दावा किया गया कि आरएसएस गोलवलकर की विवादास्पद पुस्तक 'बंच ऑफ थॉट्स' का संशोधित संस्करण प्रस्तुत करना चाहता है, जिसमें मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को “आंतरिक ख़तरे” बताया गया है। इससे उनके नाम को लेकर सामूहिक असहजता की पुष्टि होती है।
“आंतरिक ख़तरे” शीर्षक वाला अध्याय, जिसमें “मुसलमान”, “ईसाई” और “कम्युनिस्ट” नामक तीन उपखंड हैं, इस प्रकार शुरू होता है : “दुनिया के अनेक देशों के इतिहास ने यह दुखद शिक्षा दी है कि किसी देश के भीतर के शत्रुतापूर्ण तत्व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बाहरी आक्रमणकारियों से कहीं ज्यादा बड़ा ख़तरा उत्पन्न करते हैं। दुर्भाग्य से राष्ट्रीय सुरक्षा का यह पहला पाठ वही है, जिसे अंग्रेजों के इस देश से जाने के बाद से लगातार हमारे देश में अनदेखा किया गया है।”
इस पुस्तक में भारतीय संविधान, आरक्षण नीति तथा स्वतंत्रता संग्राम और उसके वीर प्रतिभागियों के बारे में भी समान रूप से विवादास्पद टिप्पणियाँ की गई हैं। भागवत अच्छी तरह जानते थे कि नए रूप वाले आरएसएस के लिए गोलवलकर द्वारा प्रस्तुत मानव-विरोधी समाधान — यद्यपि वे संगठन की सामूहिक सोच की अभिव्यक्ति थे — महँगे साबित होंगे।
आरएसएस के सामने सबसे उपयुक्त रास्ता यही था कि उन विचारों को व्यक्त करने वाले व्यक्ति को “अलग-थलग” कर दें । इसमें यह तथ्य भी सहायक था कि डॉ. हेडगेवार ने बहुत कम लिखा था, इसलिए उन्हें आलोचनात्मक जाँच-पड़ताल से अपेक्षाकृत आसानी से बचाया जा सकता था।
पुस्तक का नया संस्करण प्रकाशित करने के लिए भागवत द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण बहुत अधिक विश्वसनीय नहीं लगा और उनकी दुविधा को दर्शाता था : “जहाँ तक बंच ऑफ थॉट्स का संबंध है, उसका प्रत्येक कथन अपने समय और परिस्थितियों के संदर्भ में है… उनके स्थायी विचार एक लोकप्रिय संस्करण में हैं, जिसमें हमने वे सभी टिप्पणियाँ हटा दी हैं, जिनका संदर्भ केवल अस्थायी था और केवल उन्हीं बातों को रखा है, जो युगों तक प्रासंगिक रहेंगी। आपको वहाँ (‘मुसलमान दुश्मन हैं’) जैसी टिप्पणी नहीं मिलेगी।”
एक विश्लेषक के अनुसार, यह वैसा ही है जैसे यह कहना कि हिटलर की विश्वविख्यात किताब मीन कैम्फ (मेरा संघर्ष) – जिसमें उनके नस्लवादी विचार ना केवल प्रगट होते हैं, बल्कि वह साथ ही साथ उस ‘समस्या ‘ को सुलझाने की लिए ‘नस्लीय सफ़ाये‘ की बात कर रहे हैं – का एक “स्वच्छ” संस्करण तैयार किया जा सकता है, जिसमें यहूदियों को निशाना बनाने वाले प्रत्यक्ष संदर्भ हटा दिए जाएँ, ताकि “अधिक स्वीकार्य और प्रिय हिटलर” प्रस्तुत किया जा सके।
इस प्रकार यह समझना कठिन नहीं है कि संघ सार्वजनिक रूप से गोलवलकर से दूरी क्यों बनाना चाहता है। यदि हम पंक्तियों के बीच पढ़ने का प्रयास करें, तो इसका अर्थ होगा -- सार्वजनिक रूप से गोलवलकर से दूरी बनाना, ताकि संगठन के प्रमुख विचारक और निर्माता तथा गोलवलकर के वास्तविक शिक्षक डॉ. हेडगेवार को प्रश्नों और आगे की आलोचनात्मक जाँच से बचाया जा सके।
( शेष भाग कल के अंक में )