आधुनिक रामराज्य में “अट्टालिका” पर ५४७.६८ रू.करोड़ खर्च !

डॉ. महेंद्र धावड़े - संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी 

     यह खर्च सीधे तौर पर विरासत संरक्षण बनाम सार्वजनिक धन के उचित उपयोग की बहस को जन्म देता है। एक तरफ जहाँ 100 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारतों को रहने योग्य बनाए रखने के लिए लगातार मरम्मत और तकनीकी बदलावों की आवश्यकता होती है, वहीं दूसरी तरफ लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह मांग भी पूरी तरह जायज है कि जनहित के कार्यों (जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य) की तुलना में ऐसे खर्चों में पारदर्शिता और किफायत बरती जानी चाहिए। भविष्य के लिए विशेषज्ञ यह सुझाव देते हैं कि इन पुराने बंगलों के बार-बार रखरखाव पर करोड़ों खर्च करने के बजाय, नए आधुनिक और कम रखरखाव वाले वर्टिकल आवास परिसर (जैसे हाल ही में सांसदों के लिए बनाए गए फ्लैट) तैयार किए जाने चाहिए, जिससे सरकारी खजाने पर बोझ कम हो सके।

     एक सूचना के अधिकार (RTI) खुलासे के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में दिल्ली के लुटियंस जोन में केंद्रीय मंत्रियों के आधिकारिक आवासों की मरम्मत, नवीनीकरण और साज-सज्जा पर रिकॉर्ड ₹92.35 करोड़ खर्च किए गए हैं। यह राशि 2014-15 में खर्च हुए ₹27.47 करोड़ से तीन गुना से भी अधिक है।

     12 वर्षों का खर्च- केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) द्वारा 2014-15 से 2025-26 के बीच मंत्रियों के आवासों के रखरखाव पर कुल ₹547.68 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं।मंत्रिपरिषद के लगभग 70 से 72 मंत्रियों के आधार पर यह खर्च औसतन ₹1.2 करोड़ प्रति मंत्री बैठता है।इसमें बिजली के उपकरण (पंखे, LED लाइटें), बार-बार होने वाला प्लंबिंग का काम और फर्श की टाइलें बदलना शामिल हैं।

Aadhunik Ramrajya Mein Attalika Par Rupee 547 Crore Kharch

     लुटियंस जोन के ये बंगले ब्रिटिश काल (1912-1930) के बने हुए हैं और लगभग 80 से 100 वर्ष पुराने हैं।कई पुराने बंगलों में सीलन (seepage), दीमक का प्रकोप और जर्जर हो चुकी वायरिंग व प्लंबिंग सिस्टम जैसी गंभीर समस्याएं हैं।

     जनता के टैक्स के पैसे को मंत्रियों के आलीशान घरों की साज-सज्जा पर खर्च करने को "अत्यधिक वीआईपी संस्कृति" का उदाहरण बताया जा रहा है।भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आवास (जिसे भाजपा ने 'शीशमहल' कहा था) के रेनोवेशन पर कड़ा विरोध जताया था, लेकिन अब खुद केंद्रीय मंत्रियों के बंगलों पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं।

     लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों (सांसदों/मंत्रियों) को जनता का "प्रधान सेवक" या प्रतिनिधि माना जाता है। जब किसी विकासशील देश में, जहाँ बड़ी आबादी अभी भी बुनियादी सुविधाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास) के लिए संघर्ष कर रही हो, वहाँ जनप्रतिनिधियों के आवासों पर ₹92 करोड़ जैसी भारी राशि खर्च होती है, तो यह लोकतंत्र की मूल सादगी (Austerity) की भावना के विपरीत नजर आता है।

     नैतिक जवाबदेही -महात्मा गांधी और भारत के शुरुआती कद्दावर नेताओं ने हमेशा सार्वजनिक जीवन में न्यूनतम खर्च और सादगी की वकालत की थी। आलोचकों का मानना है कि इस तरह के अत्यधिक खर्च "वीआईपी संस्कृति" को बढ़ावा देते हैं, जो एक जनप्रतिनिधि को आम जनता से दूर करती है।

     यह निश्चित रूप से उस संसदीय शुचिता और सादगी की भावना को प्रभावित करता है जिसकी अपेक्षा एक जनप्रतिनिधि से की जाती है। यही कारण है कि देश में अब पुरानी वीआईपी व्यवस्था को बदलकर आधुनिक, कम खर्चीले और छोटे फ्लैट्स (Vertical Housing) बनाने की मांग जोर पकड़ रही है ताकि जनता के टैक्स के पैसे का अधिक से अधिक हिस्सा सीधे जनकल्याण में लग सके।

     विदेश के उदाहरण -विभिन्न देशों में राष्ट्रप्रमुखों, प्रधानमंत्रियों और जन-प्रतिनिधियों के आधिकारिक आवासों के रखरखाव और साज-सज्जा पर होने वाले खर्च की तुलना करने पर बेहद दिलचस्प और मिश्रित पैटर्न सामने आते हैं। विकसित और बड़े लोकतांत्रिक देशों में भी यह मुद्दा हमेशा भारी राजनीतिक विवादों और जनता के गुस्से का कारण बनता रहा है।

     अमेरिका- संसद (Congress) द्वारा हर नए राष्ट्रपति को व्हाइट हाउस को अपनी पसंद के अनुसार सजाने के लिए $100,000 (लगभग ₹84 लाख) का आधिकारिक बजट दिया जाता है।लगभग हर राष्ट्रपति इस सीमा को पार कर जाता है। उदाहरण के लिए, बराक ओबामा के समय करीब 1.5 मिलियन डॉलर खर्च हुए थे (जिसका कुछ हिस्सा उन्होंने अपनी जेब से दिया)। डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में केवल फर्नीचर और रेनोवेशन पर करीब $1.75 मिलियन (लगभग ₹14.5 करोड़) खर्च हुए थे।वर्तमान में अमेरिकी मीडिया में यह रिपोर्ट चर्चा में है कि ट्रंप प्रशासन व्हाइट हाउस परिसरों में बड़े निर्माण कार्यों (जैसे कि नया बड़ा बॉलरूम, निर्माण और रखरखाव) के लिए $900 मिलियन (लगभग ₹7,500 करोड़) से अधिक का फंड अलग-अलग सरकारी एजेंसियों और खातों से जुटाकर खर्च करने की योजना पर काम कर रहा है, जिसकी वहां के सांसदों और जनता द्वारा तीखी आलोचना हो रही है।

     ब्रिटिश - प्रधानमंत्री को उनके 10 डाउनिंग स्ट्रीट स्थित सरकारी आवास के रखरखाव के लिए प्रति वर्ष केवल £30,000 (लगभग ₹33 लाख) का सरकारी फंड मिलता है। इसके ऊपर का कोई भी खर्च प्रधानमंत्री को खुद अपनी जेब से उठाना पड़ता है।पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अपने आधिकारिक फ्लैट के रेनोवेशन पर करीब £200,000 (लगभग ₹2.2 करोड़) खर्च कर दिए थे। इस अतिरिक्त राशि को एक राजनीतिक डोनर से कर्ज के रूप में लेने के आरोप लगे, जिसपर ब्रिटेन की संसद और आचार समिति ने इतनी बड़ी जांच बिठाई कि जॉनसन को अंततः वह सारा पैसा खुद वापस चुकाना पड़ा।

     चांसलर (प्रधानमंत्री के समकक्ष) रहते हुए भी एंजेला मर्केल किसी आलीशान सरकारी बंगले में नहीं रहीं। वे बर्लिन के केंद्र में स्थित अपने निजी और साधारण अपार्टमेंट में रहती थीं, जिसके दरवाजे की घंटी पर आज भी उनके पति का नाम "प्रो. डॉ. सॉयर" लिखा रहता है। वहां रखरखाव पर सरकारी खजाने से नाममात्र का खर्च होता था।

     यूरोपीय संघ -की सबसे शक्तिशाली राजनेताओं में से एक, उर्सुला ब्रसेल्स में स्थित मुख्यालय की 13वीं मंजिल पर बने एक बेहद छोटे 269 वर्ग फुट के स्टूडियो अपार्टमेंट में रहती हैं, ताकि सरकारी पैसे की बर्बादी न हो।

     कई गरीब या विकासशील देशों (विशेषकर अफ्रीकी और कुछ एशियाई देशों) में राष्ट्रपतियों के महलों पर होने वाला खर्च जनता को हैरान करता है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन का अंकारा में बना आधिकारिक महल (Ak Saray) दुनिया के सबसे महंगे महलों में से एक है, जिसमें 1100 से अधिक कमरे हैं और इसके सालाना रख-रखाव पर अरबों रुपये खर्च होते हैं, जिसकी वैश्विक स्तर पर निंदा होती है।

     भारत - में मंत्रियों के आवासों पर होने वाला खर्च (औसतन ₹1.2 करोड़ प्रति मंत्री) अमेरिका जैसे अमीर देश के राष्ट्रपतियों के व्यक्तिगत खर्च से तो कम है, लेकिन ब्रिटेन और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों की तुलना में काफी अधिक और लचीला है।वैश्विक स्तर पर ट्रेंड अब यह है कि नेता जितने आधुनिक और सीमित स्थान (Vertical/Compact Housing) में रहें, उतना ही रखरखाव का खर्च कम होता है और जनता में उनकी छवि 'शासक' के बजाय 'सेवक' की बनती है।

     भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ बेरोजगारी, गरीबी और आर्थिक असमानता जैसी बड़ी चुनौतियाँ मौजूद हैं, वहाँ लोकसेवकों और मंत्रियों की सुख-सुविधाओं पर करोड़ों रुपये खर्च करना एक गंभीर विरोधाभास (Contradiction) पैदा करता है।अर्थशास्त्र के नजरिए से इसे 'अवसर लागत' (Opportunity Cost) कहा जाता है। इसका मतलब है कि जो पैसा मंत्रियों के बंगलों की साज-सज्जा पर खर्च हुआ, उसका इस्तेमाल कहीं और बेहतर काम के लिए हो सकता था।

     रोजगार सृजन -मंत्रियों के आवासों पर खर्च किए गए ₹92 करोड़ की राशि से कई कौशल विकास केंद्र (Skill Development Centers) खोले जा सकते थे या नए स्टार्टअप्स को शुरुआती फंडिंग (Seed Funding) दी जा सकती थी।भारत में इस समय युवाओं की एक बहुत बड़ी आबादी रोजगार की तलाश में है। ऐसे माहौल में सरकारी खर्चों की यह खबरें युवाओं पर गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव डालती हैं।

     इस राशि से ग्रामीण क्षेत्रों में दर्जनों नए स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) या डिजिटल लाइब्रेरी बनाई जा सकती थीं, जो सीधे तौर पर युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करतीं।एक तरफ देश का युवा न्यूनतम वेतन या संविदा (Contract) पर काम करने को मजबूर है, वहीं दूसरी तरफ जनप्रतिनिधियों पर औसतन ₹1.2 करोड़ प्रति मंत्री खर्च होना आर्थिक असमानता को सोशल मीडिया के जरिए आम जनता के सामने और स्पष्ट रूप से उजागर करता है।

     ब्रिटेन की तरह भारत में भी मंत्रियों के घरों की साज-सज्जा के लिए एक सख्त और सीमित सालाना बजट तय होना चाहिए। उससे अधिक खर्च मंत्रियों को स्वयं उठाना चाहिए।लुटियंस दिल्ली के इन विशाल बंगलों की जगह मंत्रियों और अधिकारियों के लिए आधुनिक, सुरक्षित और कम रखरखाव वाले बहुमंजिला फ्लैट्स (Vertical Flats) बनाए जाने चाहिए। इससे न केवल सैकड़ों एकड़ की कीमती जमीन बचेगी, बल्कि सालाना करोड़ों रुपये का मेंटेनेंस खर्च भी बचेगा।सरकारी आवासों पर होने वाले एक-एक रुपये के खर्च का हिसाब हर साल सार्वजनिक (Public Domain) किया जाना चाहिए ताकि जनता खुद इसकी समीक्षा कर सके।