ओबीसी जाति जनगणना पर सरकार का U टर्न और नये दलों का उदय
डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
सरकार और उसके वैचारिक संगठन की नजर में ओबीसी न केवल हिंदू हैं, बल्कि वे हिंदू समाज और वर्तमान राजनीतिक समीकरण की सबसे मजबूत रीढ़ की हड्डी हैं।पिछले एक दशक में भाजपा की चुनावी सफलताओं का सबसे बड़ा कारण गैर-यादव ओबीसी (Sub-castes of OBC) का बड़े पैमाने पर हिंदू पहचान के तहत एकजुट होना है। सरकार ने राम मंदिर, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और कल्याणकारी योजनाओं (जैसे मुफ्त राशन, आवास) के माध्यम से ओबीसी समाज को यह महसूस कराने का प्रयास किया है कि वे हिंदू मुख्यधारा का नेतृत्व कर रहे हैं।
चुनावी हिंदू बनाम अधिकार-विहीन हिंदू
जब चुनाव में वोट लेना होता है या धार्मिक मुद्दों पर ध्रुवीकरण करना होता है, तब ओबीसी को "हिंदू" मानकर उनका उपयोग किया जाता है। लेकिन जब न्यायसंगत हिस्सेदारी (जैसे जाति जनगणना, नौकरियों में प्रतिनिधित्व, और उच्च शिक्षा में सीटें) की मांग उठती है, तो सरकार पीछे हट जाती है। इसे 'सांस्कृतिक रूप से अपनाना और संरचनात्मक रूप से हाशिए पर रखना' कहा जाता है।

प्रतिनिधित्व का संकट
न्यायपालिका (Supreme Court/High Courts), केंद्रीय विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर पदों और नौकरशाही के शीर्ष पदों (जैसे सचिव/Secretaries) में ओबीसी की संख्या आज भी उनकी आबादी के अनुपात में बेहद कम है। आलोचकों का तर्क है कि यदि सरकार उन्हें पूरी तरह से बराबर का हिंदू मानती, तो इन शीर्ष संस्थाओं में उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए जाति जनगणना और आरक्षण की नीतियों को पूरी स्पष्टता के साथ लागू करती।
मंडल बनाम कमंडल
ऐतिहासिक रूप से, 'कमंडल' (हिंदू पहचान की राजनीति) का उपयोग अक्सर 'मंडल' (जाति आधारित सामाजिक न्याय की राजनीति) के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता रहा है। आलोचकों का आरोप है कि जाति जनगणना को उलझाकर सरकार वास्तव में ओबीसी की स्वतंत्र राजनीतिक और सामाजिक चेतना को दबाना चाहती है ताकि वे केवल व्यापक हिंदू पहचान के भीतर ही सीमित रहें और अपने हक की बात न करें।
भारत में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) जाति जनगणना और इस पर सरकार के बदलते रुख (यू-टर्न) को लेकर देश के राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक गलियारों में एक बेहद गंभीर और विस्तृत बहस छिड़ी हुई है। केंद्र सरकार द्वारा जनगणना की प्रश्नावली अधिसूचित किए जाने के बाद यह विवाद और गहरा गया है, जिसमें विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा ओबीसी समुदाय के साथ "धोखा" होने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
पूर्व में केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना कराने से लगातार बचती रही थी। सरकार का तर्क था कि जातिगत जनगणना से समाज में विभाजन और जातिवाद बढ़ेगा और इसके प्रशासनिक व तकनीकी पहलू बेहद जटिल हैं।
चुनावी जुमला-
विपक्ष (विशेषकर 'इंडिया' गठबंधन) द्वारा उठाए गए "जितनी आबादी, उतना हक" के नारे और बिहार जैसे राज्यों में सफल जातिगत सर्वे (2023) के बाद सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव बना।
राजनीतिक नुकसान से बचने और ओबीसी वोट बैंक को साधने के लिए, केंद्र सरकार ने अचानक अप्रैल 2025 में यू-टर्न लिया और घोषणा की कि आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जातिगत डेटा भी इकट्ठा किया जाएगा। इसके तहत पहले चरण की शुरुआत अक्टूबर 2026 और मुख्य चरण मार्च 2027 से तय की गई।
सरकार ने दिखावे के लिए जाति जनगणना की मांग तो मान ली है, लेकिन इसके व्यावहारिक नियमों को इस तरह उलझा दिया है कि ओबीसी को इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा।
स्वतंत्र 'OBC कॉलम' का न होना
सबसे बड़ा विवाद सरकार द्वारा जारी की गई प्रश्नावली को लेकर है। आलोचकों का कहना है कि फॉर्म में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए तो स्पष्ट और विशिष्ट कोड या बॉक्स दिए गए हैं, लेकिन ओबीसी (OBC) श्रेणी के लिए कोई अलग से समर्पित कॉलम या विकल्प नहीं रखा गया है।
(Blank Box) की साजिश
जाति के सवाल (सवाल नंबर 10) के सामने उत्तरदाता को अपनी जाति खुद लिखनी होगी। चूंकि भारत में हजारों उप-जातियां और उपनाम (Surnames) हैं, इसलिए एक ही जाति को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों या स्पेलिंग से लिखा जाता है। वर्ष 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) में भी यही तरीका अपनाया गया था, जिसके कारण 46 लाख से अधिक जातियों के नाम सामने आ गए और वह डेटा कचरा (अमान्य) हो गया, जिसे सरकार आज तक जारी नहीं कर पाई। विशेषज्ञों का आरोप है कि जानबूझकर दोबारा वही गलती दोहराई जा रही है ताकि डेटा इतना त्रुटिपूर्ण हो जाए कि उसे कभी जारी ही न किया जा सके।
प्रारंभिक स्तर पर डेटा संग्रह में एससी और एसटी के अलावा बाकी सबको 'अदर्स' (सामान्य और ओबीसी) की श्रेणी में रखने से ओबीसी की सही आबादी और उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति का सटीक मूल्यांकन होना असंभव हो जाएगा।सरकार ने जातियों की गिनती करने का एलान तो कर दिया है, लेकिन यह डेटा कब प्रोसेस होगा और इसके अंतिम आंकड़े आम जनता के लिए कब जारी किए जाएंगे, इसकी कोई निश्चित कानूनी गारंटी या समयसीमा तय नहीं की है।
जातिगत जनगणना क्यों जरूरी है
देश में मंडल कमीशन (1980) के अनुमानों के आधार पर ओबीसी को 27% आरक्षण दिया गया है। माना जाता है कि जमीनी स्तर पर ओबीसी की जनसंख्या 50% से अधिक है। वास्तविक आंकड़े न होने से बजट आवंटन और सरकारी योजनाओं का सही लाभ उन तक नहीं पहुंच पाता।
सरकार का दृष्टिकोण
सरकार के समर्थकों का तर्क है कि भारत जैसे विशाल देश में एक केंद्रीय ओबीसी सूची (लगभग 2,650 जातियां) और राज्यों की अलग ओबीसी सूचियों के कारण तकनीकी रूप से सीधे ड्रॉप-डाउन बॉक्स देना कठिन है। सरकार का कहना है कि वह डिजिटल माध्यम और मोबाइल ऐप के जरिए इस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने का प्रयास कर रही है।
बीजेपी की दोहरी नीति
विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा एक तरफ अपने पारंपरिक सवर्ण (General) वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहती, और दूसरी तरफ विशाल ओबीसी समाज को भी दूर नहीं धकेलना चाहती। इसलिए, इस प्रकार की नीति अपनाई जा रही है जिससे "सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे"—यानी जनगणना का श्रेय भी मिल जाए और आरक्षण की 50% की सीमा को तोड़ने का दबाव भी न बने।
यह स्पष्ट है कि ओबीसी जाति जनगणना पर सरकार का यू-टर्न सामाजिक न्याय के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता के बजाय काफी हद तक राजनीतिक और चुनावी मजबूरियों का परिणाम है। यदि सरकार वास्तव में ओबीसी समाज को उनका वास्तविक अधिकार देना चाहती है, तो उसे प्रश्नावली की विसंगतियों को दूर करना होगा, एससी/एसटी की तरह ओबीसी के लिए भी स्पष्ट कोड या ड्रॉप-डाउन सूची की व्यवस्था करनी होगी, और डेटा प्रकाशन की समयसीमा सार्वजनिक करनी होगी। ऐसा न होने की स्थिति में, इस पूरी कवायद को महज एक प्रशासनिक औपचारिकता और ओबीसी समाज के साथ एक "रणनीतिक छलावा" ही माना जाएगा।
ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) समाज के साथ 'रणनीतिक छलावे' (Strategic Deception) का मुद्दा भारत की समकालीन राजनीति और सामाजिक न्याय आंदोलन का सबसे संवेदनशील केंद्र बिंदु बन चुका है। विश्लेषकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार का वर्तमान रुख ओबीसी अधिकारों के प्रति वास्तविक निष्ठा दिखाने के बजाय एक सोची-समझी चुनावी और राजनीतिक बिसात का हिस्सा है।
ओबीसी जाति जनगणना को स्पष्टता से न कराने या इसमें विसंगतियां रखने के कारण भाजपा (BJP) को भविष्य के चुनावों में गंभीर राजनीतिक और चुनावी नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि सरकार ने 2025 में दबाव में आकर जातिगत गिनती को मंजूरी दे दी थी, लेकिन हाल ही में जारी की गई जनगणना प्रश्नावली में ओबीसी के लिए अलग विशिष्ट कॉलम न होने से विपक्ष को एक बड़ा राजनीतिक हथियार मिल गया है।
जनगणना के फॉर्म में विसंगतियों को आधार बनाकर विपक्ष ओबीसी समाज के बीच भाजपा को "ओबीसी विरोधी" साबित करने में सफल हो सकता है। यह नैरेटिव आगामी विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ एक बड़ा माहौल खड़ा कर सकता है।
पिछले एक दशक (2014 के बाद) में भाजपा की बंपर जीतों के पीछे सबसे बड़ी ताकत उत्तर भारत में गैर-यादव ओबीसी और अति-पिछड़ी जातियों (EBCs) का एकजुट होकर भाजपा को वोट बैंक रहा है ।यदि इन जातियों को लगा कि बिना स्पष्ट आंकड़ों के उन्हें सरकारी योजनाओं, बजट और नौकरियों में उनका वास्तविक हक नहीं मिल रहा है, तो वे भाजपा से छिटक सकती हैं। क्षेत्रीय दल इन छोटी और अति-पिछड़ी जातियों को अपने पाले में खींचने के लिए सामाजिक न्याय के नए समीकरण बना सकते हैं।
कमंडल को चुनौती
भाजपा की पूरी चुनावी मशीनरी 'अखंड हिंदू पहचान' (हिंदुत्व) के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां सवर्ण, ओबीसी और दलित एक छतरी के नीचे आते हैं।जाति जनगणना में पारदर्शिता की कमी के कारण यदि ओबीसी समाज के भीतर अपनी उप-जातीय पहचान को लेकर चेतना उग्र होती है, तो यह 'कमंडल' के प्रभाव को कमजोर कर देगी। समाज धर्म के बजाय दोबारा जातिगत पहचान (Mandal Politics) के आधार पर बंट सकता है, जिससे भाजपा का मुख्य वोटिंग ब्लॉक बिखर जाएगा।
भाजपा के जमीन से जुड़े ओबीसी नेता चुनावी मजबूरियों के कारण जाति जनगणना के पक्ष में रहे हैं।इस मुद्दे पर स्पष्टता न होने से पार्टी के भीतर और वैचारिक संगठन के बीच अंतर्विरोध खुलकर सामने आ सकते हैं, जिससे नीतिगत फैसलों में असमंजस दिखेगा और इसका सीधा फायदा विपक्ष को मिलेगा।
केंद्र में भाजपा पूर्ण बहुमत में नहीं है; वह नीतीश कुमार (JDU) और चंद्रबाबू नायडू (TDP) जैसे सहयोगियों के समर्थन पर टिकी है।नीतीश कुमार ने बिहार में पहले ही सफल जातिगत सर्वे कराया हुआ है और वे इसके कड़े समर्थक हैं। यदि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर पूरी पारदर्शिता नहीं दिखाती, तो एनडीए (NDA) के भीतर आंतरिक खींचतान बढ़ सकती है, जो सरकार की स्थिरता या भविष्य के चुनावी तालमेल को प्रभावित कर सकती है।
निष्कर्ष
2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने पहले ही यह संकेत दे दिया था कि ओबीसी का एक हिस्सा भाजपा से दूर छिटका है इसलिये भाजपा ने ओबीसी जाति जनगणना कराने का मंत्रिमंडल में फ़ैसला लिया और अब ओबीसी वर्ग के साथ छलावा करके उनके अधिकार खत्म करने का सरकारी आदेश १४ अगस्त २०२६ को जारी करके सरकार ने अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मार दिया है.ऐसे में, अगर आगामी जनगणना में ओबीसी डेटा को त्रुटिपूर्ण या अधूरा छोड़ दिया जाता है, तो यह भाजपा के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। इससे न केवल उनका "सोशल इंजीनियरिंग" का किला ढह सकता है, बल्कि विपक्ष को देश की आधी से अधिक आबादी (ओबीसी) के बीच खुद को 'सच्चा हितैषी' स्थापित करने का खुला मैदान मिल जाएगा और नई क्षेत्रीय पार्टी उभरकर सामने आएगी क्योंकि भाजपा ने ओबीसी वर्ग को सिर्फ *इस्तेमाल करो और फेक दो* ऐसा नेरेटिव बन रहा हैं ।