हाय मोदी तब तुम न हुए : राजेंद्र शर्मा

राजनैतिक व्यंग्य-समागम

1. हाय मोदी तब तुम न हुए : राजेंद्र शर्मा

मुहावरा वैसे तो देर आयद, दुरुस्त आयद ही है। पर चूंकि जिक्र योगी जी-मोदी जी का है, क्या ये मुहावरा कुछ छोटा नहीं पड़ जाता है। माने देर आयद पर इतना जोर, उसे ही आगे रखना और दुरुस्त आयद की बात बाद में धीरे से कह देना ; इसमें भी क्या उसी नेगेटिविटी की झलक दिखाई नहीं देती है, जिसकी मोदी जी से लेकर भागवत जी तक को इंडिया की पब्लिक से शिकायत रही है। 

ऐसी नेगेटिविटी का इल्जाम हम अपने सिर पर क्यों लेंगे? और वैसे भी, योगी जी के मामले में तो देर आयद भी, दुरुस्त आयद का प्रभाव ही बढ़ाने का काम करता है। जैसे आजादी -- नहीं, नहीं, स्वतंत्रता -- के 79 साल पूरे होने से ठीक एक दिन पहले, योगी जी को अचानक इसका बोध या ज्ञान हुआ कि, 79 साल पहले अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री होते, तो ‘लाखों हिंदुओं का रक्त व्यर्थ नहीं बहता’! हाय मोदी, तब तुम न हुए!

अब प्लीज, इसे यह कहकर खारिज करने की कोशिश कोई नहीं करे कि देश के पहले प्रधानमंत्री, नेहरू से मोदी जी हमेशा ही कंपटीशन मानते आए हैं और यह भी उनसे नेहरू को एक और पटखनी लगवाने का ही मामला है। बेशक, नेहरू  को मोदी जी इस मैदान में भी पटखनी लगाते हैं और सिर्फ पटखनी ही नहीं लगाते हैं, बल्कि चारों खाने चित्त भी कर देते हैं। 

1947 Mein Modi Hote Toh Aaj Vibhajan Vibhishika Divas Na Manate

आखिर, विभाजन के समय हुए खून-खराबे में अंगरेजों की खींची सीमा के उस पार से भाग कर आते हुए, हजारों हिंदू और सिख मारे गए थे, जबकि नेहरू जी प्रधानमंत्री थे। इसी की याद दिलाने के लिए तो मोदी जी, योगी जी और सारे ‘‘जी’’ लोग, पिछले कई साल से स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले, ‘‘विभाजन विभीषिका दिवस’’ मनाते हैं। 

नेहरू प्रधानमंत्री थे, तो विभाजन विभीषिका थी। काश तब मोदी जी प्रधानमंत्री होते, तो योगी जी को विभाजन विभीषिका दिवस कभी नहीं मनाना पड़ता। सिंपल है, विभाजन विभीषिका होती भी तो, साफ इंकार कर देते, बेरोजगारी की तरह! मीडिया भी बताता कि कहीं कुछ नहीं हुआ, सब चंगा सी। अब मोदी जी होते, तो गोदी मीडिया भी तब होता ही होता!

खैर! ये नेहरू से मोदी जी के भिड़ने का मामला है ही नहीं। यह तो हिस्ट्री का गंभीर सवाल है। काश तब मोदी जी होते! तब मोदी जी होते तो ‘‘लाखों हिंदुओं का रक्त व्यर्थ नहीं बहता।’’ क्या हुआ कि इस पार से उस पार भागते हुए और बहुत से मामलों में तो भागने से इंकार करते हुए भी, हिंदुओं की तरह ही तब हजारों मुसलमान भी मारे गए थे, जबकि जिन्ना पाकिस्तान के गवर्नर जनरल थे। पर वो जिन्ना की प्राब्लम थी, हो सकता है कि उनके यहां भी कोई मोदी होता, तो ‘लाखों मुसलमानों का खून जाया नहीं होता’। खैर! पाकिस्तान की पाकिस्तान जाने, हम तो इतना जानते हैं कि नेहरू की जगह मोदी जी प्रधानमंत्री होते, तो हिंदुओं का खून व्यर्थ नहीं बहता। 

अब कोई ये मत कहने लगना कि मोदी जी न सही, मोदी जी के वैचारिक पुरखे तो 79 साल पहले भी मौजूद थे ही -- सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, गोलवलकर, वगैरह सब के सब। यहां तक कि गोडसे भी। बेशक थे, वे सब थे, पर अव्वल तो वे प्रधानमंत्री नहीं थे। और अगर प्रधानमंत्री होते भी, तो भी मोदी जी के बराबर थोड़े ही हो जाते।

वैसे योगी जी ने स्वतंत्रता के 80वें वर्ष पर जो ज्ञान दिया है, उसमें मोदी जी का एक आप्शन भी दिया है। 79 साल पहले अगर नेहरू की जगह, सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते, शायद तब भी ‘‘हिंदुओं का रक्त व्यर्थ नहीं बहता।’’ पर हमें लगता है कि सरदार पटेल वाला यह आप्शन भी कागजी ही है। सरदार पटेल के होने से वह बात होनी मुश्किल थी, जो मोदी जी होते तो होती। सरदार शेर तो थे, पर तब तक शेर बूढ़ा हो चुका था। ज्यादा भाग-दौड़ करना उनके वश की बात नहीं रही थी। फिर सरदार पटेल गृहमंत्री तो वैसे भी थे ही और गृह मंत्रालय की एक-एक कार्रवाई की जिम्मेदारी लेने वाले गृहमंत्री थे। और तो और, उन्होंने आरएसएस पर पाबंदी की घोषणा भी अपने दस्तखत से जारी की थी। भारत में ‘हिंदुओं का रक्त नहीं बहे’ इसके लिए तो बेशक उन पर भरोसा किया जा सकता था, लेकिन क्या इस पर भी भरोसा किया जा सकता था कि जो रक्त बह गया, वह ‘‘व्यर्थ नहीं जाए’’। आखिर, चेले तो वह भी गांधी के ही थे! वह भी किसी का भी रक्त बहने नहीं देना चाहते थे, नेहरू की तरह। हिंदुओं का जो रक्त बहा व्यर्थ न जाए, एक-एक बूंद का हिसाब लिया जाए, यह तो मोदी जी जैसा कोई नागपुर-दीक्षित स्वयंसेवक ही पक्का कर सकता था। बूंद के बदले में ज्यादा नहीं, तो कम से कम एक बूंद! वैसे अपनी ओर से गोडसे ने ऐसा हिसाब लिया भी था, लेकिन छोटे पैमाने पर ही। वैसे भी योगी जी बात प्रधानमंत्री की कुर्सी के बेहतर दावेदार की कर रहे थे, निजी स्तर पर ‘हिंदू हिसाब’ निपटाने की नहीं।

पर एक बात समझ में नहीं आयी। योगी जी ने यह क्यों कहा कि ‘‘1947 में कांग्रेस अड़ जाती, तो विभाजन की त्रासदी नहीं होती।’’ उन्हें प्राब्लम किस से है, विभाजन से या विभाजन के समय घटी त्रासदी से? बेहतर होता कि योगी जी ‘‘लाखों हिंदुओं का रक्त व्यर्थ’’ बहने-नहीं बहने पर ही रुक जाते। विभाजन रोकने के चक्कर में उलझेंगे तो ऐसे उलझेंगे कि उलझन से निकल ही नहीं पाएंगे और 1947 में पीएम बनकर मोदी जी भी किसी काम नहीं आएंगे। 

बात यह है कि कांग्रेस तो बहुत देर तक अड़ी रही थी। गांधी जी के ही पीछे चलने वालों की कांग्रेस तो आखिर-आखिर तक अड़ी रही थी। पर उधर जिन्ना और इधर मोदी जी का विचार-कुनबा ही पहले से इसकी रट लगाए थे कि हिंदू और मुसलमान, अलग-अलग राष्ट्र  हैं और अंगरेजों की गुलामी को छोड़कर, एक देश में हर्गिज नहीं रह सकते। दोनों को प्राब्लम थी तो कांग्रेस से, जो बहुधार्मिक राष्ट्र की बात करती थी। दोनों ने विभाजन के ही दशक में बंगाल, सिंध समेत तीन प्रांतों में मिलकर सरकारें चलायी थीं। ये विभाजन रोकते या विभाजन कराते! ये तो पिछले ही दिनों श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पश्चिम बंगाल का सृजनकर्ता बता रहे थे क्योंकि उन्होंने विधानसभा में बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव रखा था! बांटने वाले, बंटते हुए देश को कैसे एक करते -- तलवार से सिलाई कर के! बहते खून को भी हिंदू-मुस्लिम में बांट कर देखने वाले, देश को सिर्फ बांट सकते हैं, एक नहीं कर सकते!

पर योगी जी ने एक और बात बहुत दिलचस्प कही। बोले कि 1526 में संभल में हरिहर मंदिर ध्वस्त किया गया। यदि तब एकजुट प्रतिकार होता तो 1528 में अयोध्या में वही दुस्साहस नहीं होता। तो क्या मोदी जी को 1526 से ही देश की जिम्मेदारी संभाल लेनी चाहिए थी? हाय मोदी, तब तुम ना हुए! 

( व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं। )