प्रधानमंत्री या लोकसेवक का जनता के प्रति जवाबदेही !

डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी 

          भारतीय कानून और संवैधानिक मर्यादा के अनुसार, प्रधानमंत्री या किसी भी लोक सेवक (Public Servant) को सार्वजनिक रूप से अपशब्द या गाली देने का अधिकार नहीं है।प्रधानमंत्री का पद देश का सर्वोच्च कार्यकारी पद है, जिससे समाज में एक आदर्श और गरिमापूर्ण आचरण की अपेक्षा की जाती है।

           लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता अपने प्रतिनिधियों के आचरण और भाषा की समीक्षा करती है, और अमर्यादित भाषा राजनीतिक व सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं होती है तथा जनता के प्रति जवाबदेही बनती है ।

          पीएम मोदी द्वारा विपक्षी नेताओं के लिए इस्तेमाल किए गए तीखे व विवादास्पद शब्द . विपक्ष अक्सर आरोप लगाता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषणों में राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ अमर्यादित या अत्यधिक आक्रामक भाषा का उपयोग किया है। कुछ प्रमुख विवादित बयान इस प्रकार हैं।

Is Abusive Language Part of a Prime Ministers Job Analyzing Vote Jihad & Dimaagi Naxal

      “वोट जिहाद": लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान विपक्ष के कथित तुष्टिकरण की राजनीति पर हमला करते हुए उन्होंने इस शब्दावली का उपयोग किया था।

    “कांग्रेस की विधवा": एक चुनावी रैली में भ्रष्टाचार पर बोलते हुए उन्होंने यह तंज कसा था, जिस पर विपक्ष ने इसे महिलाओं का अपमान बताते हुए कड़ा ऐतराज जताया था।

    "आंदोलनजीवी" और "परजीवी": संसद में किसान आंदोलन के संदर्भ में उन्होंने उन लोगों के लिए यह शब्द इस्तेमाल किया था जो हर आंदोलन में हिस्सा लेते हैं।

      "शहजादे": कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर कटाक्ष करने के लिए वे अक्सर रैलियों में इस शब्द का प्रयोग करते हैं।

        अक्टूबर 2012 में हिमाचल प्रदेश के मंडी में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस नेता शशि थरूर और उनकी दिवंगत पत्नी सुनंदा पुष्कर पर कटाक्ष करते हुए “वाह क्या गर्लफ्रेंड है... क्या आपने कभी 50,000 करोड़ की गर्लफ्रेंड देखी है?"

    नरेंद्र मोदी ने साल 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने सोनिया गांधी के इतालवी मूल पर परोक्ष रूप से कटाक्ष करते हुए 'जर्सी गाय' शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक संदर्भ में किया था।  

     पीएम नरेंद्र मोदी ने संसद (राज्यसभा) में “रेनकोट पहनकर नहाना" (2017) मे कहा था ।

    पीएम नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी रैली में 

“मूर्खों के सरदार" (2023) कहा था ।

       पीएम नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से “दिमागी नक्सल" (2026) कहा था ।

अन्य लोकसेवक की जवाबदेही-

    साध्वी निरंजन ज्योति (2014)मे में "रामजादों की सरकार बनेगी या हरामजादों की" बोला।

     सितंबर 2023 में लोकसभा के अंदर चंद्रयान-3 पर चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी ने बसपा (BSP) सांसद दानिश अली के खिलाफ बेहद अमर्यादित और सांप्रदायिक अपशब्दों का इस्तेमाल किया जैसा “उग्रवादी", "आतंकवादी" और "कटुआ" जैसे शब्दों का प्रयोग किया।

       अनुराग ठाकुर (2020) ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के बीच तत्कालीन केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने एक रैली में नारा लगवाया था। उन्होंने मंच से कहा, "देश के गद्दारों को..." और भीड़ ने चिल्लाया, "...गोली मारो सालों को।"

      अनंत कुमार हेगड़े (2017) ने कर्नाटक में एक बयान दिया था कि बीजेपी सत्ता में "धर्मनिरपेक्ष (Secular) शब्द को हटाने और संविधान को बदलने" के लिए आई है। उन्होंने सेकुलर लोगों की तुलना ऐसे लोगों से की थी जिन्हें अपने माता-पिता के खून का पता नहीं होता।

         दिलीप घोष (2021) ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पैर में लगी चोट और प्लास्टर पर तंज कसा था। उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा था, "अगर उन्हें अपना पैर ही दिखाना है, तो उन्हें साड़ी के बजाय बरमूडा (शॉर्ट्स) पहनना चाहिए” बोला था ।

    कंगना रनौत (2024-2026) ने एक इंटरव्यू में 2020-21 के किसान आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि "वहाँ (किसान आंदोलन में) हत्याएं और बलात्कार हो रहे थे" बोला था ।

         “कपड़ों से पहचान" (2019) मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड की एक चुनावी रैली में कहा था, "जो लोग आग लगा रहे हैं, उन्हें उनके कपड़ों से ही पहचाना जा सकता है।"

       “शूर्पणखा" की हंसी पर तंज (2018) मे पीएम मोदी ने कहा, "मेरी आपसे प्रार्थना है कि रेणुका जी को कुछ मत कहिए। रामायण धारावाहिक के बाद ऐसी हंसी सुनने का सौभाग्य आज मिला है।" भरी सदन में बोला था ।

       “पप्पू" और "मूर्ख" जैसे व्यक्तिगत तंज किये विशेषकर राहुल गांधी को नीचा दिखाने के लिए सत्ता पक्ष द्वारा "पप्पू" शब्द का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इसके जवाब में विपक्ष ने भी सत्ता पक्ष के शीर्ष नेताओं के लिए कई आपत्तिजनक उपनामों का प्रयोग किया।

           २०२६ तक भारतीय जनता शांति से देख- सुन रही थी और अचानक सीजेपी द्वारा छात्र आंदोलन ने उपरोक्त सभी लब्जो का हिसाब लौटा दिया ऐसा लगता है और अब तो Zen-Z के साथ Alfa ने देशभर कहर कर दिया.भारत के राजनीति पर जो आघात हुवा वो बढो का देखा देखी ऐसा लगा और १५ साल की बच्ची से माफी मंगवाकर छात्र के प्रतिक्रिया को फिर नया मार्ग खुद सत्ताधारी मंडली ने खोल दिया ।