रोहिणी आयोग और OBC !

डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी


📌 प्रस्तावना

रोहिणी आयोग (Rohini Commission) का गठन केंद्र सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उप-श्रेणीकरण (Sub-categorisation) की जांच करने और आरक्षण के लाभों का समान वितरण सुनिश्चित करने के लिए किया गया था। दिल्ली हाई कोर्ट की सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी. रोहिणी की अध्यक्षता में गठित इस चार सदस्यीय आयोग ने जुलाई 2023 में अपनी अंतिम रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी थी।

Rohini Commission OBC Reservation and the Caste Census Debate


१) गठन और मुख्य उद्देश्य

📍 संवैधानिक आधार:

आयोग का गठन संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत 2 अक्टूबर 2017 को राष्ट्रपति की मंजूरी से किया गया था।

📍 असमानता की जांच:

इसका मुख्य कार्य यह देखना था कि केंद्रीय सूची में शामिल OBC जातियों के बीच 27% आरक्षण का लाभ कितनी असमान रूप से मिल रहा है।

📍 सूचियों का सुधार:

केंद्रीय OBC सूची में वर्तनी की गलतियों, विसंगतियों और दोहराव को सुधारना भी इसके कार्यक्षेत्र में शामिल था।


२) आयोग के प्रमुख निष्कर्ष

आयोग ने करीब 1.3 लाख सरकारी नौकरियों और केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में दाखिले के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जिससे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए—

  • आयोग के विश्लेषण के अनुसार, “कुल OBC आरक्षण का 97% लाभ केवल 25% जातियों को मिला है।”
  • लगभग 983 OBC समुदायों (कुल संख्या का 37%) का नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में शून्य (0%) प्रतिनिधित्व पाया गया।
  • केंद्रीय नौकरियों और शिक्षा में कुल आरक्षित सीटों का 25% हिस्सा केवल 10 प्रमुख OBC जातियों के पास केंद्रित था।

मुख्य सिफारिशें: चार श्रेणियों में विभाजन


३) महत्वपूर्ण सुझाव

📍 डेटा की आवश्यकता:

आयोग ने सटीक नीतियों के निर्माण के लिए देश में वैज्ञानिक और सांख्यिकीय डेटा जुटाने तथा जाति आधारित गणना की आवश्यकता पर भी बल दिया।


४) त्रुटियों में सुधार

केंद्रीय सूची में मौजूद विसंगतियों को दूर करने के लिए नाम और उपजातियों के वर्गीकरण को सुव्यवस्थित करने की सिफारिश की गई।


५) रोहिणी आयोग वर्तमान स्थिति

📍 रिपोर्ट की गोपनीयता

आयोग ने अपनी रिपोर्ट 31 जुलाई 2023 को राष्ट्रपति को सौंप दी थी, लेकिन सरकार ने अभी तक इसे सार्वजनिक (Public) नहीं किया है और न ही संसद में पेश किया है।

📍 ठंडे बस्ते में

राजनीतिक विश्लेषकों और नीतिगत चर्चाओं के अनुसार, सरकार ने वर्तमान में इस रिपोर्ट को 'कोल्ड स्टोरेज' (ठंडे बस्ते) या होल्ड पर रखा हुआ है। सरकार का मानना है कि इसे लागू करने से पहले आंकड़ों की विसंगतियों और कानूनी पक्षों को अच्छी तरह परखना जरूरी है।


६) रोहिणी आयोग की सिफारिशें भारत की 'मंडल राजनीति' (Mandal Politics) को पूरी तरह बदल सकती हैं, जिसके कारण प्रमुख राजनीतिक प्रभाव निम्नलिखित हैं:

📍 OBC वर्ग के भीतर ध्रुवीकरण

यदि यह रिपोर्ट लागू होती है, तो वर्तमान में आरक्षण का बड़ा लाभ ले रही मजबूत और प्रभावशाली जातियों (जैसे यादव, कुर्मी, जाट) का कोटा कम (10% तक सीमित) हो जाएगा। इससे इन बड़े समुदायों में सरकार के प्रति भारी राजनैतिक नाराजगी पैदा हो सकती है।

इसके विपरीत, जो अत्यंत पिछड़ी (EBC) और वंचित उप-जातियां (जैसे नाई, धोबी, निषाद) अब तक हाशिये पर थीं, वे पूरी तरह सरकार के समर्थन में आ सकती हैं।


📍 जातिगत जनगणना (Caste Census) का मुद्दा:

विपक्ष लगातार देशव्यापी जातिगत जनगणना की मांग कर रहा है। रोहिणी आयोग के समर्थकों का तर्क है कि बिना सटीक और आधुनिक जातिगत आंकड़ों (Caste Data) के उप-वर्गीकरण लागू करना कानूनी रूप से टिक नहीं पाएगा।

केंद्र सरकार में शामिल कई क्षेत्रीय दल (जैसे बिहार के सहयोगी दल) अपनी राजनीति के लिए पिछड़े और अत्यंत पिछड़े समीकरणों पर निर्भर हैं, जिससे इस संवेदनशील मुद्दे पर आम सहमति बनाना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।


📍 ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि रोहिणी आयोग केवल केंद्रीय OBC सूची (Central List) के लिए है।

राज्यों के स्तर पर कई राज्य सरकारों ने बहुत पहले से ही अपने यहाँ OBC और अन्य वर्गों का उप-वर्गीकरण लागू किया हुआ है—

अ) बिहार:

यहाँ दशकों से कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूले के तहत OBC को BC (पिछड़ा वर्ग) और EBC (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) में बांटा गया है, जहां EBC को अधिक संरक्षण प्राप्त है।

ब) उत्तर प्रदेश:

यूपी में भी OBC आरक्षण को 'पिछड़ा', 'अति पिछड़ा' और 'सर्वाधिक पिछड़ा' में बांटने के लिए समय-समय पर (जैसे राघवेंद्र सिंह समिति) प्रयास किए गए हैं।

क) अन्य राज्य:

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी राज्य स्तरीय नौकरियों में OBC के भीतर अलग-अलग श्रेणियां या उप-कोटा (जैसे श्रेणी A, B, C, D) मौजूद हैं।

ड) SC / ST उप-वर्गीकरण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला (2024):

हाल ही में अगस्त 2024 में, सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्यों को SC (अनुसूचित जाति) और ST (अनुसूचित जनजाति) के भीतर भी उप-वर्गीकरण (Quota within Quota) करने की अनुमति दे दी है। इसके बाद तेलंगाना जैसे राज्यों ने SC उप-वर्गीकरण को लागू करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। न्यायालय के इस रुख से भविष्य में OBC के उप-वर्गीकरण को भी कानूनी मजबूती मिलने की संभावना बढ़ गई है।


📌 निष्कर्ष

सत्तारूढ़ केंद्र सरकार (मोदी-बीजेपी) जातिय जनगणना को टालना चाहती है इसलिये रोहिणी आयोग को लागू करने की संभावना कम है साथ ही ओबीसी की मजबूत आबादी वाली जातिया सरकार के विरोध में जाने की संभावना को देखते हुए सरकार डरी हुई है.


डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी