स्पृश्य बनाम अस्पृश्य - अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - (भाग - २९) - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
तीसरी घटना का संबंध ब्राह्मणें द्वारा क्षत्रियों की हत्या से है। 'महाभारत' में अनेक स्थानों पर इसकी कथा का उल्लेख है :
प्राचीन काल में सहस्र- भुजाओं वाला परम कांतिमान कार्तवीर्य नामक एक हैहयवंशी राजा समुद्र से घिरी समस्त पृथ्वी पर जिस पर अनेक महासागर और महाद्वीप अवस्थित हैं, निष्कंटक राज्य करता था। वह माहिष्मती नगरी में रहता था। उसने मुनि दत्तात्रेय से ये वरदान प्राप्त किए थे कि जब कभी वह विश्व - विजय के लिए निकले तब युद्ध में उसके एक सहस्र भुजाएं हों। वह न्यायपूर्ण शासन करे और जब कभी वह अपने कर्तव्य में धर्म से विरत होने लगे, तब मुनि उसका मार्गदर्शन करेंगे। तब वह सूर्य के समान दीप्तमान रथ पर आरुढ़ हो अभिमानपूर्वक बोला, 'धैर्य, साहस, यश, शौर्य, पराक्रम, ऊर्जा और तेज मे मेरे समान कौन है ?' उसकी यह बात पूरी होते ही आकाशवाणी हुई, 'मूर्ख, तुझे तो पता नहीं है कि ब्राह्मण क्षत्रिय से भी श्रेष्ठ होता है। ब्राह्मण की सहायता से ही क्षत्रिय इस लोक में प्रजा पर शासन करता है।' अर्जुन ने उत्तर दिया, 'मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों की सृष्टि और कुपित होने पर उन सभी का नाश कर सकता हूं। मनसा, वाचा और कर्मणा कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है। पहला कथन है कि ब्राह्मण क्षत्रियों से श्रेष्ठ हैं : दूसरा कथन कि क्षत्रिय क्षेष्ठ हैं, तुमने ये दोनों कथन उनके आधार पर कहे, लेकिन इन दोनों में (बल की दृष्टि से ) अंतर है। ब्राह्मण क्षत्रियों पर निर्भर हैं, क्षत्रिय ब्राह्मणों पर निर्भर नहीं है। वे वेद को ब्याज बनाए हुए हैं। न्याय, अर्थात् जनता की रक्षा, क्षत्रिय में अवस्थित है। ब्राह्मण उनसे जीविका पाते हैं, तब वे उनसे श्रेष्ठ किस प्रकार हो सकते हैं? मैं ब्राह्मणों को सदा अपने अधीन रखता हूं, जो सभी प्राणियों में प्रमुख हैं, जो भिक्षा पर जीवन यापन करते हैं, और जो अपने को श्रेष्ठ कहते हैं। चूंकि उस देवी गायत्री ने आकाशवाणी कर सत्य प्रकट कर दिया है, अतः मैं उन सभी दुर्विनीत ब्राह्मणों को अपने अधीन करूंगा, जिन्होंने मृगछाला पहल रखी है। तीनों लोकों में कोई भी देवता या मनुष्य मुझे राज - सिंहासन से नहीं हटा सकता। मैं प्रत्येक ब्राह्मण से श्रेष्ठ हूं। मैं उस विश्व को जिसमें ब्राह्मणों की श्रेष्ठता है, उस विश्व में बदल दूंगा जिसमें क्षत्रियों की श्रेष्ठता होगी, क्योंकि युद्ध में कोई भी मेरी शक्ति का सामना नहीं कर सकता।' अर्जुन की इस वाणी की सुनकर वह देवी जो रात्रि में संचरण करती है, भयभीत हो गई। तब अंतरिक्ष में स्थित वायु ने अर्जुन से कहा, ‘इस कलुषित भाव को त्याग दो और ब्राह्मणों का आदर करो । यदि तुम उनको हानि पहुंचाओगे तो तुम्हारे राज्य में भयंकर उत्पात मच जाएगा। वे शक्तिशाली ब्राह्मण तुम्हें पराजित कर देंगे। वे तुम्हें तुम्हारे राज्य से निष्काषित कर देंगे।' इस पर राजा ने पूछा, 'आप कौन हैं?' वायु ने उत्तर दिया, 'राजन् मैं देवताओं का दूत वायु हूं और तुम्हें तुम्हारे हित की ही बात बता रहा हूं।' अर्जुन ने कहा, ‘आपने यह कहकर ब्राह्मणों के प्रति प्रगाढ़ भक्ति का परिचय दिया है। लेकिन क्या ब्राह्मण पृथ्वी पर जन्में अन्य प्राणी के समान नहीं हैं ?'
इस राजा का संघर्ष ब्रह्मर्षि जमदग्नि के पुत्र परशुराम से हुआ। इस संघर्ष की कथा इस प्रकार है :
कभी गाधि नामक कान्यकुब्ज का राजा था। उसकी पुत्री सत्यवती थी । इस राजकुमारी का विवाह ऋषि ऋचीक से हुआ। उन्हीं के पुत्र जमदग्नि थे। जमदग्नि और रेणुका के पांच पुत्र थे। उनमें सबसे छोटे थे, दुर्जेय परशुराम । अपने पिता के आदेश से उन्होंने अपनी माता का वध किया, बुरी वासना के कारण जिसका सतीत्व भंग हो गया था। उनके चारों बड़े भाइयों ने माता की हत्या करने से इंकार कर दिया था और वे अपने पिता के शाप के कारण बुद्धि भ्रष्ट हो गए। परशुराम के आग्रह पर उनके पिता ने उनकी माता को पुनः जीवित कर दिया और उनके भाइयों को पुनः बुद्धि प्रदान कर दी तथा उन्हें मातृ-हत्या के पास से मुक्त कर दिया। उनके पिता ने उन्हें वरदान दिया कि वह अजेय और दीर्घायु होंगे। कथा के अनुसार उनका पाला राजा अर्जुन (अथवा कार्तवीर्य) से पड़ा । कार्तवीर्य जमदग्नि के आश्रम पर आए। वहां मुनि की पत्नी ने उसका सादर स्वागत किया। लेकिन मुनि की यज्ञ - गौ (कामधेनु ) के बछड़े बलात हरण और आश्रम के पेड़ों को नष्ट-भ्रष्ट कर उसने जब उस आदर का तिरस्कार किया। इस उत्पात का समाचार पाकर परशुराम क्रोध से भर उठे। उन्होंने अर्जुन पर आक्रमण किया और उसकी हजार भुजाओं को काट डाला तथा उसका वध कर दिया। उसके बाद प्रतिशोध में अर्जुन के पुत्रों ने मुनि जमदग्नि की हत्या कर दी, जब वे ध्यानमग्न थे और उनके पुत्र परशुराम उस समय वहां नहीं थे।
परशुराम ने अपने पिता की अंत्येष्टि करने के बाद प्रतिज्ञा की कि वह समूची क्षत्रिय जाति को निर्मूल कर देंगे। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उन्होंने सबसे पहले अर्जुन के पुत्रों और उनके अनुचरों को मार डाला। उन्होंने इक्कीस बार समूचे भू-मंडल को क्षत्रिय - विहीन कर डाला । समंतपंचक में उन्होंने क्षत्रियों के रक्त से पांच तालाबों का निर्माण किया। उनमें उन्होंने अपने पितरों का तर्पण करके उन्हें तुष्ट किया। उन्होंने स्वयं अपने दादा ऋचीक के दर्शन किए। ऋचीक ने परशुराम के साथ साक्षात बात की। परशुराम ने महान यज्ञ करके इंद्र को प्रसन्न किया और यज्ञ के पुरोहितों को समस्त पृथ्वी दान में दे दी। उन्होंने अत्यंत तेजस्वी कश्यप को बत्तीस हाथ ऊंची सोने की वेदिका भी दान में दे दी। महामुनि कश्यप की अनुमति से यज्ञ के पुरोहितों ने भूमि आपस में बांट ली। इसके कारण इस क्षेत्र का नाम खांडव वन पड़ गया। यज्ञभूमि आदि का दान कर परशुराम स्वयं महेंद्र पर्वत चले गए। इस तरह उनके और क्षत्रियों के बीच वैर उपजा और असीम शक्तिशाली परशुराम ने पृथ्वी को जीता।
परशुराम ने विभिन्न प्रदेशों के क्षत्रियों का वध किया। उनका वर्णन 'महाभारत' के 'द्रोण पर्व' में इस प्रकार किया गया है, यथा कश्मीर, दरद, कुंति, क्षुद्रक, मालव, अंग, वंग, कलिंग, विदेह, ताम्रलिप्तक, मार्तिकावत, शिवि तथा अनेक अन्य राजन्य।
जिस प्रकार क्षत्रिय जाति का पुनरुद्धार हुआ, उसकी चर्चा भी ब्राह्मणों के द्वारा क्षत्रियों के विनाश की कथा में इस प्रकार की गई है :
इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियविहीन करने के बाद जमदग्नि के पुत्र परम रमणीक महेंद्र पर्वत पर जाकर तप करने लगे। जब उन्होंने संसार से क्षत्रियों का नाश कर दिया तो उनकी विधवाएं संतानोत्पत्ति की याचना से ब्राह्मणों के पास गईं। इन धर्मनिष्ठ ब्राह्मणों ने वासना से मुक्त होकर उचित ऋतुों में इन स्त्रियों से समागम किया। इन स्त्रियों ने गर्भधारण किया और शूरवीर क्षत्रिय बालक एवं बालिकाओं को जन्म दिया। इस प्रकार क्षत्रिय जाति का वंश चला। इन प्रकार पवित्र भावना से क्षत्रिय महिलाओं के साथ ब्राह्मणों से समागम से क्षत्रिय जाति की वृद्धि हुई और वह दीर्घ काल तक चलती रही। उसी से ब्राह्मणों से निम्न स्तर की चार जातियां उत्पन्न हुई।