(किसान से जेन झी तक)
डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
1974 की क्रांति (जेपी आंदोलन) भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का एक मील का पत्थर थी, जिसकी तुलना आज के सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों से करना समकालीन भारत को समझने का एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है।1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में बिहार से शुरू हुआ एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन था। इसका उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और प्रशासन में व्यापक परिवर्तन लाना था।
यह आंदोलन पहले बिहार के छात्रों ने महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शिक्षा-व्यवस्था की खराब स्थिति के विरोध में शुरू किया था। बाद में जेपी इसके नेतृत्व में आए और 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में “संपूर्ण क्रांति” का आह्वान किया।

मुख्य उद्देश्य
जेपी की संपूर्ण क्रांति में आज के सभी सत्ताधारी सामिल थे।
१)भ्रष्ट और दमनकारी शासन का विरोध तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करना।
२)जाति-भेद, छुआछूत, दहेज और सामाजिक असमानता को समाप्त करना।
३)महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी से लड़ना।
४)शिक्षा-व्यवस्था में सुधार और उसे रोजगार तथा समाज की आवश्यकताओं से जोड़ना।
५)सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, अनुशासन और जनसेवा की भावना लाना।
६)भ्रष्टाचार और सरकारी दुरुपयोग को रोकना।
आंदोलन का प्रभाव
बिहार आंदोलन धीरे-धीरे केंद्र सरकार की नीतियों और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासन के विरोध में बदल गया। जेपी ने छात्रों, युवाओं और जनता से शांतिपूर्ण ढंग से व्यवस्था परिवर्तन के लिए संगठित होने का आह्वान किया। इसे जेपी आंदोलन या बिहार आंदोलन भी कहा जाता है।इस आंदोलन ने देश में विपक्षी एकता को मजबूत किया और 1975 में लगे आपातकाल के विरोध का प्रमुख आधार बना। आपातकाल के दौरान जेपी सहित अनेक विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। बाद में 1977 के चुनाव में कांग्रेस की हार और जनता पार्टी की सरकार बनने में इस आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
संक्षेप में, संपूर्ण क्रांति जेपी का ऐसा आंदोलन था जो सत्ता परिवर्तन से आगे बढ़कर व्यक्ति, समाज और शासन—तीनों के व्यापक परिवर्तन की मांग करता था।
1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन सत्ता के केंद्रीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ था। नीचे तत्कालीन स्थिति और आज की स्थिति के बीच साम्यता (समानताओं) और अंतर का एक विश्लेषणात्मक विवरण।
१)केंद्र में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में एक बेहद शक्तिशाली और केंद्रीकृत सरकार थी, जिसे 'अधिनायकवादी' प्रवृत्तियों के रूप में देखा गया।
वर्तमान में भी केंद्र में एक मजबूत, बहुसंख्यक और निर्णयकारी सरकार है, जिस पर विपक्ष अक्सर सत्ता के अति-केंद्रीकरण का आरोप लगाता है।
२)अत्यधिक मुद्रास्फीति (महंगाई), बेरोजगारी, खाद्यान्न संकट और रेलवे हड़ताल जैसी आर्थिक अस्थिरता थी।
आज भी बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और महंगाई आम जनता, विशेषकर युवाओं के बीच असंतोष के मुख्य कारण हैं।
३)गुजरात के 'नवनिर्माण आंदोलन' और बिहार से शुरू हुए छात्र आंदोलनों का मुख्य मुद्दा सरकारी भ्रष्टाचार और कुशासन था।
आज भ्रष्टाचार का स्वरूप अधिक संस्थागत और डिजिटल हो चुका है, लेकिन राजनीतिक शुचिता और पारदर्शिता की मांग आज भी संघर्षों के केंद्र में है।
४)न्यायपालिका और प्रेस पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे थे (जिसके परिणामस्वरूप बाद में आपातकाल लगा)।
आज भी मुख्यधारा की मीडिया (गोदी मीडिया बनाम स्वतंत्र मीडिया की बहस) और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर लगातार सवाल उठते रहते हैं।वर्तमान में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति है ।
संघर्षों में साम्यता
1974 के आंदोलन की नींव छात्रों (बिहार छात्र संघर्ष समिति) ने रखी थी। आज भी देश में होने वाले बड़े आंदोलनों (जैसे अग्निपथ योजना का विरोध, पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन या छात्र संघ चुनाव) में युवाओं और छात्रों की भूमिका सबसे आगे रहती है।जेपी ने "संपूर्ण क्रांति" का नारा देकर लोकतंत्र को बचाने की अपील की थी। आज का विपक्ष और नागरिक समाज भी "संविधान बचाओ" और "लोकतंत्र की रक्षा" के नारों के साथ सड़कों पर उतरते हैं।1974 में जेपी ने बिखरे हुए विपक्ष (जनसंघ, समाजवादी, कांग्रेस-ओ) को एक मंच पर लाकर 'जनता पार्टी' की नींव रखी थी। आज की राजनीति में भी सत्ता पक्ष के खिलाफ विभिन्न विचारधाराओं वाले दलों का गठबंधन (जैसे INDIA Alliance) इसी तरह की साम्यता को दर्शाता है।
आज का संघर्ष
1974 में जेपी के विचारों को फैलाने के लिए जनसभाओं और भूमिगत पत्रिकाओं का सहारा लिया जाता था। आज का संघर्ष X (ट्विटर), YouTube, और व्हाट्सएप जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लड़ा जाता है। सूचनाओं का प्रसार तीव्र है, लेकिन साथ ही 'फेक न्यूज' और प्रोपेगैंडा की चुनौती भी बढ़ी है।1974 में जेपी के रूप में एक सर्वमान्य, गैर-राजनीतिक और नैतिक कद वाला नेता मौजूद था। आज के आंदोलनों (जैसे किसान आंदोलन या नागरिक समाज के प्रदर्शन) में कोई एक एकल वैश्विक चेहरा नहीं होता; ये आंदोलन अधिक विकेंद्रीकृत और सामूहिक नेतृत्व वाले होते हैं।आज के संघर्ष केवल घरेलू स्तर तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वैश्विक स्तर पर मानवाधिकार संगठनों और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा तुरंत रेखांकित किए जाते हैं।
अर्थात् 1974 की क्रांति इस बात का प्रमाण थी कि जब देश में आर्थिक संकट और सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण होता है, तो जनता नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए उठ खड़ी होती है। आज का संघर्ष भले ही नए दौर की तकनीकों और नई राजनीतिक जटिलताओं के बीच लड़ा जा रहा हो, लेकिन इसके मूल में संवैधानिक स्वतंत्रता, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की रक्षा की वही तड़प है जो 1974 में थी।