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हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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04 ऑगस्ट 2023
Book
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     ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच वर्ण संघर्ष की दूसरी घटना क्षत्रियों द्वारा ब्राह्मणों की हत्या से संबंधित है। यह कहानी महाभारत के आदिपर्व में वर्णित है, जो इस तरह से है :

     कृतवीर्य नाम का एक राजा था, जिसकी दानशीलता के कारण वेदों के ज्ञाता राजा के पुरोहित भी थे और उसी कारण वे अपनी जीविका उपार्जन करते थे । उन्होंने इस बीच काफी अन्न और धन भी कमाया। जब राजा की मृत्यु हुई तब उसके वंशजों को धन की कमी हो गई और तब इसकी याचना के लिए वे भृगुओं के पास आए, क्योंकि वे उनकी संपत्ति के बारे में जानते थे। कुछ भृगु लोगों ने अपना धन जमीन के नीचे छिपाकर रखा था, जो कुछ ने इसे ब्राह्मणों को दान कर दिया, क्योंकि वे क्षत्रियों से डरते थे, जब कि कुछ लोगों ने उन्हें बिना कुछ दिए लौटा दिया। एक बार ऐसा भी हुआ कि एक क्षत्रिय को किसी भृगु के मकान की जमीन खोदते समय उसमें गड़ा धन मिल गया। तब सभी क्षत्रिय इकट्ठे हो गए और उन्होंने इस खजाने को देखा। इससे उन्हें गुस्सा आ गया। परिणामस्वरूप उन्होंने सभी भृगुओं की उनकी गर्भवती स्त्रियों सहित हत्या कर दी। बाद में उनकी विधवाएं हिमालय पर्वत की ओर पलायन कर गईं। उनमें से एक विधवा ने अपने अजन्मे बच्चे को अपनी जांघ में छिपा लिया। क्षत्रियों को जब किसी ब्राह्मणी से उसके जीवित रहने की खबर मिली, जब उन्होंने उसकी हत्या करनी चाही । लेकिन वह बच्चा अपनी मां की जांघ से बाहर निकला और उसने अपने हत्यारों को अंधा बना दिया। कुछ दिनों तक इसी प्रकार पहाड़ों में भटकते रहने के बाद उन्होंने उसी बच्चे की मां से उन्हें दृष्टि प्रदान करने की प्रार्थना की। परंतु उसने उन लोगों को उस चमत्कारिक बालक उर्व के पास भेजा, जिसमें संपूर्ण वेदों ने अपने छह उपायों के साथ प्रवेश किया था । उसी बालक ने अपने रिश्तेदारों की हत्या के बदले में उनकी दृष्टि छीन ली थी; और वे जब उसकी शरण में गए तो उनके दृष्टि वापस मिल गई। तथापि उर्व ने भृगु लोगों की हत्या के बदले में सभी प्राणियों को नष्ट करने की साधना की और तपस्या करते-करते ऐसी स्थिति में पहुंच गया कि उसके कारण देवता-असुर, दोनों और मनुष्य भी घबरा गए। लेकिन उसके पूर्वज (पितृ) स्वयं प्रकट हुए और उसे इस कार्य से विमुख करने के उद्देश्य से कहा कि वे 'क्षत्रियों से उनकी हत्या का बदला नहीं लेना चाहते हैं श्रद्धावान भृगु असुरक्षित होने के कारण हिंसक वृत्ति के क्षत्रियों की हत्याओं की क्षमा नहीं करना चाहते। जब हम वृद्धावस्था से दुखी हो जाएंगे तब हम स्वयं ही उनके द्वारा अपनी हत्या की कामना करेंगे। जिसने भृगु के घर जमीन में धन दबा दिया था, स्वर्ण - प्राप्ति की इच्छा रखने वाले हम लोगों को धन से क्या लेना-देना?" उन्होंने यह उपाय इसलिए किया कि वे आत्महत्या के दोषी नहीं बनना चाहते थे। उन्होंने उर्व से कहा कि वह अपने क्रोध पर नियंत्रण रखे और जो पापपूर्ण कार्य वह कर रहा है, उससे दूर रहे। 'हे पुत्र! तुम क्षत्रियों और इन सातों लोकों का नाश मत करो। अपने क्रोध को नियंत्रित करो, क्योंकि वह तपस्या की साधना को नष्ट कर देता है।' लेकिन उर्व ने उन्हें उत्तर दिया कि वह अपने निश्चय पर अमल किए बिना नहीं रुक सकता। उसने कहा कि उसके क्रोध का अगर किसी दूसरी वस्तु पर आघात नहीं होगा तो वह स्वयं उसी को नष्ट का देगा। उसने तर्क देते हुए कहा कि उसके पूर्वजों ने क्षत्रियों के साथ जिस नम्रता का व्यवहार करने का परामर्श दिया है, वह न्याय, औचित्य तथा कर्तव्य के आधार पर भी गलत है; तथापि पितरों ने उसे अपने क्रोध की अग्नि समुद्र में फेंक देने के लिए मना किया जहां, उन्होंने कहा, वह जल तत्वों पर प्रहार करेगी, और इस प्रकार उसकी धमकी पूरी हो जाएगी।

     तीसरी घटना ब्राह्मनों द्वारा क्षत्रियों के नर-संहार से संबंधित है। महाभारत में अनेक स्थानों पर इस कथा को दोहराया गया है।

     सहस्त्रबाहु महाप्रतापी एवं शक्तिमान कार्त्तवीर्य यानी अर्जुन इस संपूर्ण संसार का सम्राट था। वह महिषमति का निवासी था। अपार शक्ति का यह हैहय राजा महासागरों तथा महाद्वापों सहित सपूंर्ण विश्व पर राज्य करता था। युद्ध भूमि पर लड़ने और संपूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त करने के लिए उसने हजार हाथों से लड़ने का वरदान दत्तात्रेय मुनि से प्राप्त किया था तथा पथभ्रष्ट होने की संभावना में सदाचारी लोगों के उपदेश और वचनों का आशीर्वाद उसे प्राप्त था। तत्पश्चात् अपने सूर्य जैसे तेजस्वी रथ पर सवारी करते हुए अपने गर्व के नशे में चूर होकर उसने कहा, 'धैर्य, साहस, कीर्ति, पराक्रम, गुण और शक्ति में मेरे समान कौन है?' उसकी चुनौती के उत्तर में आकाश में एक निराकरा आवाज गूंज उठी, जिसने उससे कहा- 'हे मूर्ख! तुम नहीं जानते कि ब्राह्मण क्षत्रिय से उत्तम होता है और ब्राह्मण की सहायता से ही क्षत्रिय अपनी प्रजा पर शासन करता है। '

     तब अर्जुन ने उत्तर दिया, 'यदि मैं चाहूं तो प्राणी मात्र का निर्माण कर सकता हूं अथवा न चाहूं तो समस्त प्राणियों को मिटा सकता हूं। कोई भी ब्राह्मण किसी कार्य या विचार अथवा धारणा में मुझसे श्रेष्ठ नहीं हो सकता। तुम्हारा कहना है कि ब्राह्मण श्रेष्ठ है, और मेरा दूसरा प्रस्ताव है कि क्षत्रिय श्रेष्ठ है; दोनों का आधार यहां स्पष्ट हुआ है, परंतु भेद की बात यह भी है कि ब्राह्मण क्षत्रिय पर निर्भर होते हैं, न कि क्षत्रिय ब्राह्मण पर। ब्राह्मण के लिए वेद मात्र एक मूल बहाना है। न्याय, रक्षा के लिए वे क्षत्रिय के अधीन है। ब्राह्मण अपनी जीविका उनसे ही प्राप्त करते हैं तब, ब्राह्मण उनसे श्रेष्ठ कैसे हो सकते हैं? मैं स्वयं उन सर्व प्रमुख ब्राह्मणों को अपने अधीन रखता हूं, जो दक्षिणा पर जीवित रहते हैं और अपने आपको बहुत श्रेष्ठ मानते हैं। क्योंकि स्वर्ग में निवास करने वाली गायत्री देवी ने सत्य का ही उद्घाटन किया है, इसलिए मैं उन सभी अनाधीन रहने वाले ब्राह्मणों को अपने अधीन करके रहूंगा। इन तीनों लोगों में कोई भी मनुष्य अथवा देवता मुझे राजा के पद से हटा नहीं सकता। इसलिए मैं हर ब्राह्मण से श्रेष्ठ हूं। तो अब क्या मैं इस संसार को, जहां ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, ऐसे विश्व में बदल दूं, जहां क्षत्रिय श्रेष्ठ हो सकें, क्योंकि युद्ध में मेरा मुकाबला करने का किसी को साहस नहीं है।' अर्जुन का यह कथन सुनकर रात्रि के समय भ्रमण करने वाली यह देवी भयभीत हो गई तब हवा में विचारण करने वाले वायु देवता ने अर्जुन से कहा : ‘इस पापयुक्त विचार का त्याग करो और ब्राह्मणों का अभिवादन करो। यदि तुमने उनके साथ कोई दुर्व्यवहार किया तो तुम्हारा साम्राज्य अस्थिर हो उठेगा। तब तुम देश से बाहर कर दिए जाओगे।' राजा ने पूछा, 'तुम कौन हो,' मैं देवताओं का दूत वायु हूं और तुम्हें तुम्हारे हित की बातें बताने आया हूं। अर्जुन ने प्रत्युत्तर में कहा : ‘हे देवता! तुम आज ब्राह्मणों के प्रति बहुत अधिक भक्ति भाव दिखा रहे हो। लेकिन यह क्यों नहीं करते कि ब्राह्मण भी पृथ्वी पर जन्मे किसी अन्य प्राणी के समान ही हैं।'

     आगे चलकर राजा, जमदग्नि ऋषि के पुत्र परशुराम के साथ एक विवाद में पड़ गया जो इस तरह है :

     कान्यकुब्ज का एक राजा था, जिसे गाधि नाम से जाना जाता था उसकी सत्यवती नाम की एक पुत्री थी। इस राजकुमारी का ऋचीक ऋषि के साथ विवाह और जमदग्नि के जन्म की कहानी ऊपर वर्णित कहानी के समान ही है। जमदग्नि और रेणुका के पांच पुत्र थे, जिनके सबसे छोटा दुर्जेय परशुराम था। उसने एक बार अपने पिता के आदेश पर अपनी मां की हत्या कर दी ( जिसने अनैतिक इच्छा के मोह से अपनी पूर्व पवित्रता खो दी थी) क्योंकि जमदग्नि के चार बड़े पुत्रों ने मातृहत्या करने से मना कर दिया था और पिता के शाप से उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी, लेकिन परशुराम की इच्छा से उसके पिता ने उसकी मांग को पुनः जीवनदान दिया और उसके भाइयों को भी सदबुद्धि प्रदान की तथा स्वयं उसे हत्या के अपराध से मुक्त कर दिया जाता है। परशुराम अपने पिता से अजयेता तथा दीर्घायु का वर भी प्राप्त करता है राजा अर्जुन (या कार्त्तवीर्य) के साथ उसके संबंध का वर्णन है। एक बार राजा अर्जुन जमदग्नि के आश्रम में आया और उसका जमदग्नि की पत्नी के आदर के साथ स्वागत किया । लेकिन राजा ने ऋषि के यज्ञ की गाय का बछड़ा जबरन छीनकर और यज्ञ समारोह के वृक्ष तोड़कर आदर-सत्कार को भंग कर दिया। इस विनाश का समाचार सुनकर परशुराम बहुत ही क्रोधित हो गया। उसने अर्जुन पर आक्रमण करके उसकी हजार भुजाएं काटीं। फिर उसकी हत्या कर डाली। इसके बदले में अर्जुन के पुत्रों ने शांत स्वभाव वाले ऋषि जमदग्नि की परशुराम की अनुपस्थिति में हत्या कर दी।

     वापस लौटने पर अपने पिता का अंतिम संस्कार करने के लिए परशुराम ने संपूर्ण क्षत्रिय वंश को नष्ट करने की प्रतिज्ञा की और सबसे पहले अर्जुन के पुत्र और उनकी साथियों की हत्या करके उस प्रतिज्ञा का पालन किया। उसने इक्कीस बार समस्त क्षत्रियों को पृथ्वी से समूल नष्ट किया, और उनके खुन से सामंतपंचक में पांच सरोवर बनवाए, जिसमें उसने भृगुओं के पितरों की आत्माओं को संतुष्ट किया और अपने नाना ऋचिका के समक्ष जाकर खड़ा हो गया। तब ऋचिका ने उसे उपदेश दिया। परशुराम ने एक विशाल यज्ञ करके इंद्र को प्रसन्न किया और यज्ञ करने वाले पुरोहितों को पृथ्वी दान दी । उसने महाबली कश्यप ऋषि को साठ फुट लंबा और चौवन फंट ऊंचा सोने का सिंहासन दान में दिया। इस सिंहासन को ब्राह्मणें ने आपस में बांट लिया, जिसे उसका खंडववन नाम पड़ गया। इस प्रकार, कश्यप को पृथ्वी दान करके, परशुराम स्वयं महेन्द्र पर्वत पर रहने के लिए चला गया। इस तरह उसमें और क्षत्रियों के बीच में शत्रुता उत्पन्न हुई, और परशुराम ने अपनी असीमित शक्ति से पृथ्वी जीत ली ।'