राजनैतिक व्यंग्य-समागम
मोदी-जेपी संवाद : मेरी इमरजेंसी उनकी इमरजेंसी से काली कैसे !
( आलेख : राजेंद्र शर्मा )
स्वर्गीय लोगों का एक बड़ा एडवांटेज है। उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। न आग जला सकती है, न पानी गीला कर सकता है, न तलवार काट सकती है, वगैरह वाली बात शायद स्वर्गीय लोगों के लिए ही कही गई थी। जेल डरा नहीं सकती है, बस इतना और जोड़ लिया जाए, नए भारत के वास्ते अपडेटिंग के लिए।
और मोदी जी से यहीं गलती हो गई। बिना बात के जयप्रकाश नारायण उर्फ जेपी को छेड़ बैठे, जो जब तक स्वर्गीय नहीं हुए थे, तब भी जेल-वेल से नहीं डरते थे। 11 अक्टूबर की तारीख थी -- जंतर मंतर की अभूतपूर्व किलेबंदी, उस किलेबंदी को भेदने की कोशिशों में हजारों लोगों के पुलिस के लाठी-डंडों से बुरी तरह से पीटकर, हिरासत में लिए जाने और पत्रकारों के साथ भी जमकर यही सलूक किए जाने के बाद, अगला ही दिन।

सुबह-सुबह मोदी जी ने हैप्पी बर्थडे किया, तब तक तो जेपी भी ‘हां ठीक है, ठीक है की’ मुद्रा के साथ चुप ही बने रहे। पर मोदी ने जैसे ही यह कहना शुरू किया -- ‘इमरजेंसी के दौर में अपकी निर्भीक आवाज…’ जेपी ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया और करीब-करीब डांटते हुए कहने लगे -- क्या इमरजेंसी-इमरजेंसी लगा रखी है। इमरजेंसी के बारे में तुम जानते ही क्या हो? इमरजेंसी में या उसके पहले या बाद में कभी जेल का मुंह देखा होता, तो दूसरों को जेल में डालने का कम से कम इतना शौक नहीं होता।
मोदी जी कुछ भी बोल पाते, उससे पहले ही जेपी ने एक और शिकायत जड़ दी -- और यह कहां का सलीका है, पहले बापू के हाथ में झाड़ू पकड़ा कर उन्हें सफाई इंस्पेक्टर बनाकर छोड़ दिया और अब चले आए इमरजेंसी के बहाने मुझे इंदिरा का जानी दुश्मन बनाने के लिए। जब राष्ट्रपिता कहते-कहते देश को आजादी दिलाने वाले बापू को ही भुला दिया, तो मेरे जैसे बापू के सिपाहियों की तो तुम लोग क्या ही कद्र करोगे। तुम्हें क्या लगता है कि सब लोग बस तुम्हारे इस्तेमाल के लिए नैपकिन हैं, जैसे चाहा तोड़ा-मोड़ा, इस्तेमाल किया और फेंक दिया।
मोदी जी को बुरा तो बहुत लगा, पर खून का घूंट-सा पीकर रह गए। इस वक्त इंदिरा गांधी की इमरजेंसी की याद दिलाने की बहुत जरूरत थी। ज्ञानेश कुमार बचेगा, तब मोदी राज बचेगा। पर ज्ञानेश कुमार को बचाने के लिए जो-जो करना पड़ रहा था, उसका बचाव कैसे हो? बस यहीं इंदिरा गांधी वाली इमरजेंसी बड़े काम की साबित हो सकती थी। जो भी हो रहा है, वह इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के मुकाबले गनीमत कैसे है?
लगे समझाने -- आपको जरूर कोई गलतफहमी हुई है। शायद स्वर्ग में आप लोगों तक सही जानकारियां नहीं पहुंच पा रही होंगी। वहां न गोदी चैनलों की पहुंच है, न वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी की और न मीडिया सेल की। वरना कहां वो इमरजेंसी का असह्य दमन और कहां राष्ट्र को अराजकता से बचाने के हमारे शाह जी के विवेकपूर्ण कदम। राष्ट्र को आज अराजकता की साजिशों से बचाएंगे, तभी तो 2047 में विकसित भारत ला पाएंगे! आप भी कहां भारत-विरोधी ताकतों के प्रचार के बहकावे में आ रहे हैं!
पर समझाने से समझने के बजाय जेपी और भड़क गए -- इमरजेंसी लगाने के टैम पर इंदिरा भी यही भाषा तो बोलती थी -- भारत-विरोधी ताकतें, अराजकता की साजिश, विकास का रास्ता रोकने की कोशिश, वगैरह, वगैरह! इसी सब के नाम पर तब भी इमरजेंसी लगाई गई थी और तुम भी वही कर रहे हो। फर्क क्या है?
मोदी जी ने फिर भी समझाने की कोशिश जारी रखी -- इंदिरा गांधी की तानाशाही को आप कैसे भूल सकते हैं! वह तो विरोध को सहन ही नहीं कर सकती थीं। आपने विरोध किया, तो इमरजेंसी लगा दी।
जेपी ने टोका -- तुम तो बिना इमरजेंसी लगाए ही वही सब कर रहे हो!
अब मोदी जी के झल्लाने की बारी थी। फिर भी अपनी चिढ़ दबाकर बोले -- आप क्या कहते हैं, विरोधियों को चुनी हुई सरकार को पलट लेने दें? एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों के आशीर्वाद को निष्फल हो जाने दें? विकसित भारत की ओर देश की प्रगति को रुक जाने दें? संसद की जगह सड़कों को देश को चलाने दें?
जेपी ने धीरे से कहा -- इंदिरा गांधी की सरकार भी चुनी हुई सरकार थी। तुम्हारे हिसाब से तो उसका विरोध भी गलत था। बिना चुनी हुई सरकार का विरोध तो हमेशा ही जायज है। पर चुनी हुई सरकार का विरोध डेमोक्रेसी की खास निशानी है।
मोदी जी समझ गए कि बुढ़ऊ समझाने से नहीं समझेंगे। और स्वर्गीय हैं, सो दूसरे तरीके काम करेंगे नहीं। ज्यादा टाइम वेस्ट न कर के टीवी कार्यक्रम टाइप का क्विक फायर राउंड शुरू कर दिया।
मोदी -- इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में हजारों, लाखों, पता नहीं कितने विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया था?
जेपी -- तुमने भी तो दस हजार को गिरफ्तार तो किया ही है और वह भी सिर्फ जंतर-मंतर पर जमा होने से रोकने के लिए। सुना है, अमृत काल में लोग तिरंगा फहराने के लिए गिरफ्तार किए जा रहे हैं। सिर्फ गिरफ्तार ही नहीं, घायल भी किए जा रहे हैं। प्रदर्शन के लिए पहुंचने वालों को ही नहीं, जिनके प्रदर्शन में पहुंचने अंदेशा था, उन्हें भी उनके घरों से, ट्रेनों से, हवाई जहाजों तक से गिरफ्तार किया गया है।
मोदी -- इंदिरा गांधी ने जेलें कार्यकर्ताओं से भर दी थीं और जबरन सड़कें खाली करा दी थीं।
जेपी -- तुमने तो तरह-तरह की हवालातें बच्चों से भर दी हैं। हां! सड़कें फिर भी खाली नहीं करा पाए हो।
मोदी -- इंदिरा गांधी की इमरजेंसी में कदम-कदम पर पुलिस थी, पहरे थे।
जेपी -- तुम्हारी इमरजेंसी में राजधानी जैसे किले में तब्दील की गई है, इमरजेंसी में उसका तो पासंग भी नहीं था।
मोदी -- इमरजेंसी में जेलों में पुलिस ज्यादतियां होती थीं, जबरन नसबंदी थी।
जेपी -- तुम्हारी इमरजेंसी में तो सड़कों पर पुलिस ज्यादतियां हो रही हैं।
मोदी -- इंदिरा गांधी ने प्रेस पर सेंसरशिप थोप दी थी।
जेपी -- जो मीडिया पहले ही गोदी में नहीं बैठा था, उसे तुम्हारी इमरजेंसी में सड़कों पर घसीटा जा रहा है, हिरासत में लेकर पीटा जा रहा है। ऊपर से पहले इंटरनेट बंद और उसके बाद, डिजिटल सेंसरशिप भी।
मोदी -- कानून का राज खत्म हो गया था, अदालतों में भी सुनवाई नहीं थी।
जेपी -- कानून का राज खत्म है, अदालतों में आज भी सुनवाई नहीं है¡
मोदी -- इमरजेंसी में संजय गिरोह का मनमाना राज चलता था।
जेपी -- तुमने तो बाकायदा भगवा गुंडों को ताज सौंप दिया है, पुलिस को गुंडों के पीछे खड़ा कर दिया है।
मोदी -- इंदिरा गांधी ने बाकायदा इमरजेंसी लगाई थी, ऐलान करके।
जेपी- यही कसर क्यों छोड़ो, तुम भी इमरजेंसी का ऐलान कर ही दो। अब शायद देश का संविधान इसकी इजाजत नहीं देता हो, मगर शाह जी जब तिकड़म से 370 को खत्म करने का रास्ता निकाल सकते हैं, तो इमरजेंसी का ऐलान करने का रास्ता भी निकाल ही लेंगे। गोदी मीडिया उसे मास्टरस्ट्रोक भी साबित कर ही देगा। बिना ऐलान की इमरजेंसी से तो ऐलान वाली इमरजेंसी भली. पर मेरी बात याद रखना घोषित हो या अघोषित, अंत हरेक इमरजेंसी का होता है।
मोदी जी का धीरज टूट गया। उठते-उठते नमस्ते की -- अब इजाजत दें, और भी काम हैं। जेपी ने भी हाथ जोड़ दिए -- दोस्ती बनी रहे!
( राजेंद्र शर्मा वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक लोकलहर के संपादक हैं। )