(IPC बनाम BNS)
डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
संविधान सभा मे चर्चा करके बिल पारित करते थे अब इन्होने सांसद को निलंबित करके बिल पारित किया है।संविधान सभा और वर्तमान संसदीय कार्यप्रणाली के बीच यह तुलना बहुत महत्वपूर्ण और विचारणीय है।
संविधान सभा
संविधान के हर एक अनुच्छेद (Article) पर महीनों तक बहस हुई। विरोधी विचारों को न केवल सुना गया, बल्कि उन्हें उचित सम्मान देकर कानून का हिस्सा बनाया गया।डॉ. बी.आर. आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य नेताओं का प्रयास रहता था कि फैसले बहुमत के जोर पर नहीं, बल्कि आपसी सहमति से लिए जाएं ताकि देश के हर वर्ग को यह अपना संविधान लगे।मतभेदों के बावजूद किसी भी सदस्य को असहमति जताने या कड़े सवाल पूछने के कारण सदन से बाहर नहीं निकाला गया।

सांसदों का निलंबन
इसके विपरीत, दिसंबर 2023 में जब भारतीय न्याय संहिता (BNS) जैसे ऐतिहासिक और देश के हर नागरिक को प्रभावित करने वाले तीन नए आपराधिक कानून पारित किए गए, तब की स्थिति बिल्कुल अलग थी।संसद की सुरक्षा में चूक के मुद्दे पर गृह मंत्री से बयान की मांग कर रहे विपक्ष के 146 सांसदों को निलंबित कर दिया गया था।
पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 और उसकी जगह लेने वाली नई भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023. BNS ने IPC को 1 जुलाई 2024 से प्रतिस्थापित कर दिया ।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) विधेयक जिस दौरान संसद से पारित हुआ, उस समय विपक्ष के कुल 146 सांसद (100 लोकसभा से और 46 राज्यसभा से) निलंबित (Suspend) थे। यह भारतीय संसदीय इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा सामूहिक निलंबन था।
20 दिसंबर 2023 में लोकसभा में पारित होने के दिन जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में इस विधेयक को चर्चा और पारित करने के लिए रखा, तब तक लोकसभा के 97 विपक्षी सांसद निलंबित किए जा चुके थे। इसी हंगामे के बीच विधेयक पास होने के बाद 2 और सांसदों को निलंबित किया गया, जिससे लोकसभा में कुल निलंबित सांसदों की संख्या 99 (और अगले दिन तक 100) पहुंच गई।
21 दिसंबर 2023 में राज्यसभा में पारित होने के दिन इसके अगले दिन जब यह विधेयक राज्यसभा से पारित हुआ, तब तक राज्यसभा के 46 विपक्षी सांसदों को भी निलंबित किया जा चुका था।
इस प्रकार, यह ऐतिहासिक कानून विपक्ष की बहुत कम उपस्थिति और बिना किसी विस्तृत विरोध/बहस के ध्वनि मत (Voice Vote) से पारित हुआ था। इन सांसदों को संसद की सुरक्षा में चूक (Security Breach) के मामले में गृह मंत्री से जवाब मांगने और तख्तियां दिखाने के कारण पूरे शीतकालीन सत्र के लिए निलंबित किया गया था।
पुलिस राज्य
भारतीय न्याय संहिता (BNS) और इसके साथ आए अन्य आपराधिक कानूनों (BNSS और BSA) को लेकर कानूनी विशेषज्ञों, मानवाधिकार संगठनों और सरकार के बीच गहरा मतभेद है। जहां सरकार इसे 'नागरिक-केंद्रित' और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति दिलाने वाला कदम बताती है, वहीं आलोचकों का तर्क है कि कुछ प्रावधानों के कारण यह देश को एक 'पुलिस राज्य' (Police State) की ओर धकेल सकता है।
पुलिस रिमांड
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187 के तहत पुलिस हिरासत (Police Custody) की अवधि को पहले के 15 दिनों से बढ़ाकर कुछ मामलों में 60 से 90 दिनों तक विस्तारित करने का प्रावधान है। आलोचकों का मानना है कि इससे हिरासत में उत्पीड़न और जबरन कबूलनामे का खतरा बढ़ जाएगा।
राजद्रोह का नया रूप
सरकार ने भले ही पुराने 'राजद्रोह' (Sedition) कानून को हटाने का दावा किया है, लेकिन बीएनएस की धारा 152 में 'देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों' को शामिल किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी परिभाषा इतनी व्यापक है कि इसका इस्तेमाल असहमति की आवाजों को दबाने के लिए किया जा सकता है।'विध्वंसक कार्य' (Subversive Activities) की परिभाषा काफी व्यापक है। विशेषज्ञों का डर है कि सरकार के खिलाफ तीखी आवाज उठाने वाले किसान आंदोलनों, छात्र आंदोलनों या सामाजिक कार्यकर्ताओं के बयानों को देश की अखंडता के लिए खतरा बताकर इस गंभीर धारा के तहत जेल भेजा जा सकता है।
विरोध प्रदर्शनों पर सख्ती
कानून की धारा 226 में कानूनी शक्ति के प्रयोग को रोकने के लिए "आत्महत्या के प्रयास" (जैसे कि राजनीतिक विरोध में आमरण अनशन या भूख हड़ताल) को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है, जिसे नागरिक अधिकारों को सीमित करने वाला माना जा रहा है।
IPC बनी थी चौपाई
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराएं (जैसे हत्या के लिए 302, धोखाधड़ी के लिए 420, या मानहानि के लिए 499) भारत के आम जनमानस में बहुत गहराई से रच-बस गई थीं। फिल्मों, समाचारों और रोजमर्रा की बातचीत के कारण लोग इनके प्रति काफी जागरूक थे।अचानक कानून बदलने और धाराओं के नंबर बदल जाने से जनता, वकीलों और पुलिस व्यवस्था में एक बड़ी उलझन पैदा हुई है, जिसे लेकर समाज के एक बड़े वर्ग में नाराज़गी और संदेह भी है।
कुछ विशेषज्ञों का आरोप है कि औपनिवेशिक मानसिकता हटाने के नाम पर केवल राजनीतिक लाभ लेने और इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने के लिए यह बड़ा फेरबदल किया गया है, जबकि इसके अंदर की अधिकांश बातें पुरानी IPC जैसी ही है।
पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर अप्रासंगिक हो चुके प्रावधानों (जैसे धारा 377 और व्यभिचार/Adultery से जुड़े नियम) को इस नए कानून से पूरी तरह हटा दिया गया है।
भूख हड़ताल बना अपराध
बीएनएस की धारा 226 में स्पष्ट रूप से जोड़ा गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी सरकारी अधिकारी को उसकी ड्यूटी करने से रोकने या मजबूर करने के लिए 'आत्महत्या का प्रयास' या ऐसी धमकी (जैसे अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल या आमरण अनशन) देता है, तो उसे 1 साल तक की जेल, जुर्माना या सामुदायिक सेवा की सजा हो सकती है।गांधीवादी तरीके से की जाने वाली शांतिपूर्ण भूख हड़तालों (जैसे हाल ही में लद्दाख आंदोलन के दौरान सोनम वांगचुक का अनशन) को इस धारा के तहत गैर-कानूनी घोषित कर पुलिस आसानी से रोक सकती है।
धारा 172 (BNSS) विवादास्पद प्रयोग
छात्र आंदोलनों के दौरान डिटेन (हिरासत में लेने) के नाम पर पुलिस द्वारा नए कानूनों के दुरुपयोग की चर्चा हाल के दिनों में काफी गंभीर हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों, छात्र संगठनों और सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं के अनुसार, पुलिस प्रदर्शनकारी छात्रों को दबाने के लिए मुख्य रूप से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के कुछ विशिष्ट प्रावधानों का सहारा ले रही है।
यह प्रावधान पुराने कानून (CrPC) में नहीं था, इसे नए कानून में पहली बार जोड़ा गया है।छात्र संगठनों और वकीलों का आरोप है कि पुलिस इस धारा का इस्तेमाल "प्रिवेंटिव डिटेंशन" (ऐहतियाती हिरासत) के एक औजार के रूप में कर रही है। हाल ही में दिल्ली में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान, कई छात्रों को विरोध स्थल (जैसे जंतर-मंतर) तक पहुँचने से पहले ही मेट्रो स्टेशनों या रास्तों से उठा लिया गया। सुप्रीम कोर्ट में एक बी.टेक छात्रा (समृद्धि दास) द्वारा दायर याचिका में इस धारा को "असंवैधानिक" घोषित करने की मांग की गई है, क्योंकि यह पुलिस को बिना किसी वारंट या ठोस अपराध के किसी को भी 24 घंटे तक हिरासत में रखने की बेलगाम शक्ति देती है।
नया कानून (विशेषकर BNSS की धारा 172) पुलिस को ग्राउंड लेवल पर ऐसी ढाल प्रदान करता है जिससे वे "कानून-व्यवस्था बनाए रखने" के नाम पर किसी भी छात्र प्रदर्शनकारी को बिना औपचारिक गिरफ्तारी दिखाए घंटों हिरासत में रख सकते हैं। यही कारण है कि इसे लोकतांत्रिक असहमति को कुचलने के लिए पुलिसिया दुरुपयोग के रूप में देखा जा रहा है।
संविधान सभा का युग 'संवाद और सहमति' का युग था, जबकि वर्तमान दौर 'टकराव और ध्रुवीकरण' का बन चुका है। सांसदों को निलंबित करके इतने बड़े कानूनों को पास करना भारतीय संसदीय इतिहास की एक ऐसी घटना है, जो लोकतांत्रिक परंपराओं के लिहाज से हमेशा चर्चा और आलोचना के केंद्र में रहेगी।