दिल्ली में नवदुर्गा की पिटाई, बढ़ रही सरकार की खाई !

डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी 

      यह संस्कृत का एक बेहद प्रसिद्ध और पवित्र श्लोक है, जो मनुस्मृति से लिया गया है। यह समाज में महिलाओं के सम्मान, गरिमा और उनके महत्व को दर्शाता है।

      श्लोक

      "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

      यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥"

श्लोक का हिंदी अर्थ-

      यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः: जहां नारियों (महिलाओं) का आदर-सत्कार और सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं (अर्थात उस स्थान पर सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है)।

Delhi Mein Navdurga Ki Pitai Badh Rahi Sarkar Ki Khai

     यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः: और जहां महिलाओं का सम्मान नहीं होता, उनका अनादर या शोषण होता है, वहां किए गए सभी अच्छे कर्म, पूजा-पाठ और कार्य निष्फल (बेकार) हो जाते हैं।

जंतर- मंतर पर नारी की पिटाई

      नवरात्रि के समय इस श्लोक की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। यह हमें याद दिलाता है कि केवल मिट्टी की मूर्तियों की पूजा करना और साक्षात जीती-जागती महिलाओं या बेटियों (नवदुर्गा) का अनादर या उत्पीड़न करना घोर पाखंड है। जब तक समाज में महिलाओं को सुरक्षा, समानता और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक कोई भी धार्मिक अनुष्ठान या प्रगति अधूरी है।

      नवरात्रि के पावन पर्व पर एक तरफ जहां देश और दिल्ली मां दुर्गा के नौ रूपों (नवदुर्गा) की भक्तिभाव से पूजा-अर्चना में लीन है, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली से ही बेटियों और महिलाओं के साथ बर्बरता और दुर्व्यवहार के झकझोर देने वाले मामले सामने आए हैं। इस विरोधाभास को लेकर सोशल मीडिया और आम जनता के बीच गहरा आक्रोश देखा जा रहा है, जहां लोग सवाल उठा रहे हैं कि एक तरफ देवी रूप में नारी की पूजा की जा रही है और दूसरी तरफ साक्षात 'नवदुर्गा' (बेटियों) पर हमले हो रहे हैं।

      दिल्ली के तमाम प्रसिद्ध शक्तिपीठों और मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है तो दुसरी तरफ दिल्ली पुलिस महिला पत्रकार, समाजसेवी, विद्यार्थिनी आदि को घसटीकर कपड़े फाड़ना, बाल पकड़कर खिंचना, असभ्य भाषा बोलना, अश्लील हरकत करना इतना ही नहीं पुलिस के बड़े अधिकारी भी इन वारदात करने के बाद सरकारने इनाम के तौर पर बढ़ोत्तरी दिया है ।

      दिल्ली में 10 अक्टूबर को आयोजित एक विरोध प्रदर्शन ( Protest) के दौरान एक युवती और कुछ छात्रों के साथ सरेआम बेरहमी से मारपीट और बदसलूकी की गई। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद यह बहस छिड़ गई कि नवरात्रि के पावन समय में बेटियों के साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है।

      वीडियो वायरल होने और खुफिया जानकारी मिलने के बाद दिल्ली पुलिस ने स्वतः संज्ञान (suo-motu) लिया। पुलिस ने मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए खुद को 'हिंदू रक्षा दल' से जुड़ा बताने वाले चार मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

      घटना के दौरान पुलिसकर्मियों की मौजूदगी और कुछ प्रदर्शनों में महिला प्रदर्शनकारियों को घसीटे जाने के वीडियो सामने आने के बाद विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने सरकार तथा दिल्ली पुलिस के रवैये को आड़े हाथों लिया है। लोग इसे देश की साक्षात 'देवियों' (बेटियों) का अपमान बता रहे हैं।

      किसी भी धर्म, समाज या सरकार के अधीन महिलाओं पर अत्याचार करना नैतिक रूप से गलत और भारतीय कानून के अनुसार अवैध है। धर्म का इस्तेमाल महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा या सम्मान को छीनने के औचित्य के रूप में नहीं किया जा सकता।

धर्म और महिला

      हिंदू धर्म विविध परंपराओं, ग्रंथों और समाजिक प्रथाओं का समूह है; इसमें महिलाओं के बारे में एक अकेली, सर्वमान्य नियम-पुस्तिका नहीं है। ऐतिहासिक रूप से कुछ प्रथाएँ—जैसे सती, विधवा पुनर्विवाह पर रोक और सीमित संपत्ति अधिकार—महिलाओं के प्रति अन्यायपूर्ण रही हैं।

सरकार की जिम्मेदारी

      भारत में सरकार का कर्तव्य है कि वह संविधान के अनुसार सभी नागरिकों—पुरुष और महिला—को समान संरक्षण दे। महिलाओं पर हिंसा, भेदभाव, जबरन धर्म परिवर्तन, यौन उत्पीड़न या घरेलू अत्याचार अपराध हैं; इन्हें “धार्मिक अधिकार” या “राज्य की नीति” कहकर जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।

मणिपुर- दिल्ली रणसग्राम

      २०२३ से मणिपुर जल रहा और महिला अत्याचार शिखर पर हैं किंतु आज तक सरकार मणिपुर को शांत करने में नाकाम रही है ।

      भारतीय राज्यघटना द्वारा शांति पूर्ण आंदोलन करने का अधिकार होने के बावजूद दिल्ली को रणसग्राम का स्वरूप दे दिया है ।दिल्ली में चल रहे हालिया आंदोलनों और प्रदर्शनों को रोकने तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगभग 30,000 से 40,000 सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। यह दिल्ली में हाल के वर्षों में की गई सबसे बड़ी सुरक्षा तैनातियों में से एक है।

      दिल्ली के संवेदनशील इलाकों, जंतर-मंतर, मध्य दिल्ली और सीमाओं पर लगभग 30,000 से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक बल (Paramilitary) के जवान मुस्तैद हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गृह मंत्रालय द्वारा जारी अतिरिक्त तादाद को मिलाकर कुल संख्या करीब 40,000 तक पहुंच गई है।

      सुरक्षा व्यवस्था को सख्त करने के लिए दिल्ली पुलिस की मदद हेतु केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की 120 से लेकर 273 कंपनियां (लगभग 11,000 से 27,000 जवान) तैनात की गई हैं। इनमें CRPF, रैपिड एक्शन फोर्स (RAF), BSF, ITBP, SSB और CISF के जवान शामिल हैं।

      शुरुआत में इन्हें 12 अक्टूबर तक के लिए तैनात किया गया था, लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने गृह मंत्रालय से इन सुरक्षा बलों की तैनाती को 20 अक्टूबर 2026 तक बढ़ाने की मांग की है।

      आंदोलन कर रहे छात्र संगठनों और विपक्ष का आरोप है कि पुलिस बल का प्रयोग कर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को "कुचलने" का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें भारी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया है और बैरिकेडिंग करके रास्ते रोके गए हैं।इतनी ताक़त मणिपुर हिंसा रोकने में क्यो नहीं लगाया ? लाल आख दिखाने के जगह क्यो झूठ बोला जा रहा है ।

CJI का इस्तीफ़ा ?

      भारतीय न्यायपालिका बैठे न्यायमूर्ति भी अधिक संख्या मे हिंदू होने के बावजूद इतना सारा भारतीय नारी पर होने वाले पुलिसी अत्याचार पर *सू मोटो* क्यो नही लेते हैं यही जनता का सवाल है ।इसके आगे तो बवाल मचा है जो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के इस्तीफे की मांग को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट परिसर और सोशल मीडिया पर वकीलों के बीच भारी विवाद देखने को मिला है।

      यह विवाद मूल रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में वकीलों द्वारा किए जा रहे एक प्रदर्शन से शुरू हुआ था। इस शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा कुछ वकीलों को हिरासत में ले लिया गया। इस कार्रवाई के विरोध में वकीलों के एक समूह ने नाराजगी जताई और कथित तौर पर सीजेआई सूर्यकांत के इस्तीफे की मांग करने वाले बयान सोशल मीडिया पर प्रसारित होने लगे।

      कुछ अधिवक्ताओं (जैसे बलराज मलिक) का आरोप है कि वकीलों के साथ हुई बदसलूकी और चैंबर से हिरासत में लिए जाने के मामले में कोर्ट प्रशासन का रुख सही नहीं था। इसके विरोध में उन्होंने सीजेआई के इस्तीफे तक की मांग उठा दी।

सुप्रीम कोर्ट से भरोसा उठने की बात

      प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिब्बल ने अदालत के रुख पर निराशा जताते हुए कहा।

      “मैं बार-बार सुप्रीम कोर्ट जाते-जाते थक गया हूँ। मैं अपने लिए बोल रहा हूँ, मुझे नहीं लगता कि अब वहाँ जाने का कोई फायदा है। मुझे भारत के सुप्रीम कोर्ट पर अब ज्यादा भरोसा नहीं रह गया है। जो होना है, वह होगा।"

      अब परिक्षा है सरकार, न्यायपालिका, ECI, CBI,ED और गोदी मिडिया की जो नवरात्रि के पावन पर्व में भारतीय नारी शक्ति को कैसा सम्मान दिलायेंगे ?