जंतर मंतर पर अघोषित आपातकाल !

( सांसद, मुख्यमंत्री, अधिवक्ता, पत्रकार डिटेन )

डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी 

     2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने प्रदूषण और स्थानीय निवासियों की शिकायत पर यहाँ प्रदर्शनों पर कुछ समय के लिए रोक लगाई थी, लेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को हटाते हुए शांतिपूर्ण विरोध को नागरिकों का मौलिक अधिकार बताया और जंतर-मंतर पर दोबारा प्रदर्शन शुरू हुए।

दलित भूमि अधिकार आंदोलन (भागना कांड - 2014)

     हरियाणा के भागना गांव में दलितों के साथ हुए अत्याचार और जमीन के समान वितरण की मांग।

     वर्ष 2014 के मध्य में सैकड़ों दलित परिवारों ने न्याय की गुहार लगाते हुए जंतर-मंतर की सड़क पर कई महीनों तक तंबू गाड़कर धरना दिया था।

वन रैंक वन पेंशन (OROP) आंदोलन (2015-2016)

     सेना के पूर्व सैनिकों (Veterans) के लिए समान पेंशन योजना लागू करने की मांग।रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों और जवानों ने ओआरओपी की विसंगतियों को दूर करने के लिए जंतर-मंतर पर एक लंबा और ऐतिहासिक अनशन किया था। इसी दौरान पूर्व सैनिक राम किशन ग्रेवाल की आत्महत्या की दुखद घटना भी हुई थी।

Jantar Mantar Protest Under Pressure copy

तमिल किसानों का सूखा राहत आंदोलन (2017)

     कर्ज माफी और तमिलनाडु में सूखे के लिए केंद्र से राहत पैकेज की मांग।

     तमिलनाडु के किसानों का यह आंदोलन अपने अनोखे विरोध प्रदर्शनों (जैसे मानव खोपड़ियों के साथ बैठना, चूहे-सांप खाना और मुंडन कराना) के कारण राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में रहा।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और NRC विरोधी प्रदर्शन (2019-2020)

     नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को वापस लेने की मांग।देश के विभिन्न छात्र संगठनों, नागरिक समाज (Civil Society) और राजनेताओं ने इस कानून के खिलाफ जंतर-मंतर पर विशाल रैलियां और अनिश्चितकालीन धरने आयोजित किए थे।

किसान आंदोलन (Farmers Protest - 2020-2021)

     केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ।मुख्य रूप से दिल्ली की सीमाओं (सिंघू, टीकरी, गाजीपुर) पर चलने वाले इस ऐतिहासिक आंदोलन के दौरान, किसान संगठनों ने अपनी मांगों को पुरजोर तरीके से उठाने के लिए जंतर-मंतर पर 'किसान संसद' का भी आयोजन किया था, जहां भारी संख्या में प्रदर्शनकारी जुटे थे।

महिला पहलवानों का आंदोलन (Wrestlers Protest - 2023)

     भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों के खिलाफ।देश के शीर्ष अंतरराष्ट्रीय और ओलंपिक पदक विजेता पहलवान (विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया) इंसाफ की मांग को लेकर महीनों तक जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे रहे। मई 2023 में संसद मार्च के दौरान पुलिस ने इस धरने को बलपूर्वक हटाया था।

NEET पेपर लीक और शिक्षा सुधार आंदोलन (जून-जुलाई 2026)

     NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक और धांधली के खिलाफ。यह Gen Z (युवाओं) का पिछले कुछ वर्षों का सबसे बड़ा आंदोलन माना गया। CJP और देश भर के छात्र संगठनों ने हफ्तों तक जंतर-मंतर पर डेरा डाला, जिसमें लद्दाख के पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर बैठे। इस व्यापक आंदोलन के बाद तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

चुनाव आयोग और चुनावी सुधार आंदोलन (जंतर-मंतर 2.0 - अक्टूबर 2026)

     मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और वोटर रोल से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के विरोध में।युवाओं और छात्रों के नेतृत्व वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) तथा विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनावी पारदर्शिता की मांग को लेकर भारी संख्या में जंतर-मंतर कूच किया, जिसके कारण दिल्ली में व्यापक सुरक्षा और बैरिकेडिंग देखने को मिली।

     दिल्ली का जंतर-मंतर भारत में जन-आंदोलनों और लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का सबसे प्रमुख केंद्र रहा है। 2014 से लेकर अब तक (अक्टूबर 2026) यहाँ देश को हिला देने वाले कई ऐतिहासिक आंदोलन हुए हैं।लेकिन भारतीय इतिहास मे आज १०/१०/२०२६ का आंदोलन सरकार की विफलता का प्रतिक और ज्ञानेश कुमार को बचाने के चक्कर में खुद लामबंद हुई । 

पत्रकारो को डिटेन

     विश्व के इतिहास में अनोखा दृष्य आज जंतर मंतर पर देखने मिला जो विश्व स्तर पर १० अक्टुंबर २०२६ याद किया जाएगा । अग्रेज के हुकुमत में और आजाद भारत के आपातकाल मे जो नही दिखा वो आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत सरकार ने साबित कर दिखाया ।

सर्वोच्च न्यायालय की भुमिका

     २०१८ के फैसले में जब न्यायालय द्वारा जंतर मंतर शांति पूर्व मार्ग से भारतीय नागरिक आंदोलन कर सकते है ऐसा फैसला होने के बाद भी आज न्याय की प्रतिक्षा मे भारतीय जनता का मौलिक अधिकारो का खुले आम गला घोट दिया है ।

     सांसद, पूर्व मुख्यमंत्री, अधिवक्ता, पत्रकार भी छुटे नही तो सामान्य जनता की बात छोड दिजिये. नये वोटरो को अब सोचने का मौका मिला है की पुलिस द्वारा प्रताडित सरकार के पक्ष में रहे या नया विकल्प चुने ?