जल, जंगल, ज़मीन की रक्षा में राष्ट्रीय आदिवासी कन्वेंशन : आदिवासी अधिकारों के खिलाफ नौकरशाही का युद्ध बेनकाब

(रिपोर्ट : अंबिका सुभाष, अनुवाद : संजय पराते)

     नई दिल्ली : 16 राज्यों से आए हज़ारों आदिवासियों ने सोमवार, 7 सितंबर को राजधानी के बीचों-बीच भगत सिंह शहीद पार्क से बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग तक मार्च किया। उनके जोशीले नारों ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। पश्चिम बंगाल के एक युवा प्रतिभागी सोनामुनी टुडू ने नारा लगाया, ‘जल, जंगल किसका है – हमारा है, हमारा है’।

     एक और प्रतिभागी ने नारा लगाया, “हमारे पूर्वज ब्रिटिश के खिलाफ लड़े थे – आरएसएस! तुम्हारे पूर्वज झुके थे” और प्रदर्शनकारी खुशी से झूम उठे!

     आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के अध्यक्ष जितेंद्र चौधरी और राष्ट्रीय संयोजक पुलिन बास्की के नेतृत्व में यह मार्च दो दिन के कन्वेंशन का नतीजा था, जिसने आदिवासी प्रतिरोध की आवाज़ों को एक संयुक्त मंच प्रदान किया था। 

Defending Jal Jangal Jameen National Adivasi Convention Exposes Bureaucratic War on Tribal Rights

     6 सितंबर को नई दिल्ली के मावलंकर हॉल, कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुआ आदिवासी अधिकार संघर्ष सम्मेलन बिरसा मुंडा की भावनाओं से भरा हुआ था, जो इसकी दीवारों पर और दिन भर बजने वाले गानों में था। आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन में 16 राज्यों से 1,000 से ज़्यादा प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। 

     कन्वेंशन में छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य, मध्य प्रदेश के केन-बेतवा, कर्नाटक के नागरहोल टाइगर रिज़र्व से बेदखली के खिलाफ लड़ाई और तेलंगाना के पोलावरम परियोजना के खिलाफ आंदोलन और संघर्षों के वे नेता और प्रतिनिधि भी शामिल हुए, जो बेदखली का प्रतिरोध करने के लिए खबरों में रहे हैं।

     कन्वेंशन में आदिवासियों के बीच संघर्ष में सबसे आगे रहने वाले अखिल भारतीय किसान सभा, भारत जन आंदोलन, अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति, सहरिया विकास मंच, कैंपेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और मजदूर-किसान शक्ति संगठन जैसे दूसरे संगठनों के नेताओं और प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया।

     कन्वेंशन के मंच पर आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के पदाधिकारियों जितेंद्र चौधरी, पुलिन बास्की, दुलीचंद, देबोलिना हेम्ब्रम, बृंदा करात, विनोद नाकोले और अन्य के साथ वनाधिकार, रोज़गार, शिक्षा, और आदिवासी पहचान और विश्वास विषय पर चार सत्र संपन्न हुए।

     कन्वेंशन का उदघाटन सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन लोकुर ने किया। उन्होंने ज़मीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानूनों और पांचवीं और छठी अनुसूची, वनाधिकार कानून और पेसा जैसे संवैधानिक प्रावधानों के कमजोर क्रियान्वयन पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वनाधिकार कानून के लागू होने के बीस साल बाद भी ग्राम सभा को नज़रअंदाज़ करने और आदिवासियों के खिलाफ छोटे-मोटे मामलों में केस दर्ज करने का सिलसिला जारी है।

     उन्होंने कहा कि “गरीब और आदिवासी लोगों के पास रोज़गार के जो मौके थे, वे धीरे-धीरे उनके अधिकारों के ख़त्म होने के साथ कम होते जा रहे हैं।” इस संदर्भ में, उन्होंने उन अल्पायु आदिवासी लड़कियों के मामलों की ओर भी इशारा किया, जो दिल्ली और दूसरे शहरों में घरेलू नौकरों के तौर पर बहुत खराब हालात में काम करती हैं।

     कन्वेंशन में चार प्रस्ताव रखे गए और लगभग 50-60 वक्ताओं  ने अपने समर्थन, सुझाव और अनुभवों के साथ अपनी बातें रखी। 

लगभग 60% आदिवासी 5वीं और 6वीं अनुसूची के संरक्षण से बाहर

     वनाधिकार कानून पर सत्र में सेंटर फॉर आदिवासी रिसर्च एंड डेवलपमेंट (कार्ड) की तरफ से स्मिता गुप्ता ने जो प्रस्ताव रखा, उसमें बताया गया कि पांचवीं अनुसूची और पेसा सिर्फ़ दस राज्यों के अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्र में लागू होते हैं। इसका अर्थ है कि कन्वेंशन में रखे गए अनुमान के अनुसार, भारत की लगभग 59% अनुसूचित जनजातियाँ अनुच्छेद 244 के संरक्षण से पूरी तरह बाहर रहती हैं।

     कौन से इलाके इस अनुच्छेद के दायरे में रहेंगे, इसके लिए लागू नियम अभी भी 1961 के एक आयोग के हैं और तब से किसी भी सरकार ने इन दायरों को नहीं बढ़ाया है।

     जहां पेसा लागू होता है, वहां कई राज्यों ने नियम बनाने में ही इतना समय लगा दिया कि यह कानून सालों तक निष्क्रिय ही रहा। ओडिशा ने अभी तक उन्हें अधिसूचित नहीं किया है और झारखंड ने इस साल जनवरी में ही इसे अधिसूचित किया है। जिन राज्यों ने ये नियम बनाए हैं, अधिकांश ने गांव को कानून  में वर्णित बस्ती के बजाय राजस्व गांव बताया है और ग्राम सभा के साथ अनिवार्य परामर्श को एक औपचारिकता ही माना है।

     महाराष्ट्र के एक कार्यकर्ता अमोल वाघमारे ने कन्वेंशन में कहा : "ज़िला पंचायत और राज्य सरकारें पेसा के नियमों के खिलाफ़ जाकर ग्राम सभाओं के फ़ैसलों को पलटती रहती हैं। इसकी साफ़ तौर पर निंदा की जाती है।"

     पेसा का क्रियान्वयन नगर निकायों की सीमाओं पर जाकर रुक जाता है, इसलिए किसी ग्रामीण अनुसूचित क्षेत्र को नगर निकायों में बदलने से उसकी सुरक्षा एक झटके में खत्म हो जाती है। इस कमजोरी को दूर करने के लिए जुलाई 2001 में राज्यसभा में एक विधेयक भी पेश किया गया था, लेकिन वह अभी भी लंबित है।

     वनाधिकार कानून एक दूसरा तरीका दिखाता है, जो प्रक्रिया को अंदर से ग्रहण करता है। इस कानून ने आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को मान्यता दी और उनके अधिकारों को मान्यता देने के केंद्र में वन विभाग को नहीं, बल्कि ग्राम सभा को रखा। 2026 तक, आदिवासी मामलों के मंत्रालय के अपने आंकड़ों के अनुसार, 47% दावे मंज़ूर हो गए थे और एक तिहाई को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया गया था, जिसमें लगभग 48,000 सामुदायिक दावे भी शामिल थे।

     कन्वेंशन के समक्ष वनाधिकारों पर पर्चा पेश करते हुए, स्मिता गुप्ता ने बताया कि ये निरस्तीकरण कैसे तैयार किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि कैसे समुदायों से लिखित भूमि अभिलेख और उपग्रहों से खींचे गए नक्शे (सैटेलाइट मैप) मांगे जाते हैं, जिनकी वनाधिकार कानून के किसी भी प्रावधान के लिए ज़रूरत नहीं है, कैसे बिना लिखित कारणों के, जिनकी ज़रूरत होती है, दावे निरस्त किए जाते हैं, और कैसे दावे करने वाले के हक़ से कम ज़मीन के पट्टे दिए जाते हैं।

     हालांकि आदिवासी मामलों का मंत्रालय मुख्य (नोडल) है, लेकिन ज़्यादातर राज्यों में वन विभाग के जरिए यह प्रक्रिया चलाई जा रही है, और मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने तो कार्य बल (टास्क फोर्स) जोड़ दिया है, जो कानूनी कमेटियों के बाहर लंबित दावों की पूरी तरह से समीक्षा करती हैं। मध्य प्रदेश के एक प्रतिनिधि ने बताया कि जब बेदखली की मुहिम शुरू होती है, तो यह आखिरकार कैसा होता है : “बिना सोचे-समझे हमारे खेतों में खड़ी फसलों को चरने के लिए जानवरों को छोड़ दिया जाता है और हर्बिसाइड्स के स्प्रे से बर्बाद कर दिया जाता हैं।”

     और वनाधिकार कानून से बचने के रास्ते और चौड़े कर दिए गए हैं। 2023 के वन संरक्षण अधिनियम ने वन की कानूनी परिभाषा को संकुचित कर दिया है और सुरक्षा, रैखिक अधोसंरचना और पारिस्थितिकी-पर्यटन से जुड़ी परियोजनाओं  को मानक स्वीकृति व्यवस्था से बाहर कर दिया है और इसके साथ ही ग्राम सभा की सहमति से भी बाहर कर दिया गया है। अधिकांश परियोजनाओं को जन सुनवाई से छूट देने के लिए पर्यावरण प्रभाव आंकलन नियमों को फिर से गढ़ा गया है।

     1997 के समता निर्णय, जिसने खनन के लिए निजी कंपनियों को अनूसूचित क्षेत्र में भूमि अंतरण करने पर रोक लगा दी थी, को अब नियमित रूप से खदान विकास अनुबंधों (माइन डेवलपर कॉन्ट्रैक्ट) और राज्य की सार्वजनिक क्षेत्र कंपनियों के  संयुक्त उपक्रम बनाने के जरिए नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।

आदिवासियों का सामूहिक विस्थापन

     एक के बाद एक वक्ता प्रतिनिधियों ने ग्राम सभा की सहमति के मुद्दे पर जोर दिया और बताया कि इसका कितनी आसानी से फर्जीकरण किया जा रहा है। बाल सिंह और राम लाल करियाम ने कहा : "छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल का मामला और वहां चार लाख पेड़ों की कटाई दिखाती है कि कैसे अडानी के फायदे के लिए ग्राम सभा की सहमति के प्रावधान का फर्जीकरण करके पेसा कानून का खुलेआम उल्लंघन किया गया है।"

     तेलंगाना से एक खबर आई, जिस पर 7 सितम्बर की सुबह सबसे ज़्यादा तालियां बजीं : "तेलंगाना में कुमराम भीम कंज़र्वेशन रिज़र्व बनाने की घोषणा की गई है, जिसके लिए आसिफाबाद और सिंगुर वन संभाग से 339 आदिवासी गांवों को बेदखल किया जा रहा है। इसके बारे में सरकारी आदेश में साफ-साफ झूठ बोला गया है कि इस विस्थापन के लिए ग्राम सभाएं करके लोगों की इजाज़त ले ली गई है। हमारे संघर्ष ने इस परियोजना को फिलहाल रोक दिया है।"

     सेंटर फॉर आदिवासी रिसर्च एंड डेवलपमेंट (कार्ड) के एक शोधकर्ता उमेश ने संथाल परगना में राज महल परियोजना के एक हिस्से में किया गया एक सर्वे दिखाया। इसमें दिखाया गया कि विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) पहाड़िया समुदायों के सबसे पिछड़े गांवों में ग्राम सभा की फर्जी बैठकों के मिनट्स बनाने में प्रशासन और कंपनी की मिलीभगत थी। ऐसी बैठकें कभी हुई ही नहीं थी।

     ऐसी परियोजनाओं की वजह से कितने लोग बेघर हुए हैं, इस सवाल का जवाब देने से केन्द्र सरकार ने इंकार कर दिया है। जुलाई 2025 में सरकार ने संसद को बताया है कि बेघर हुए और परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों के आंकड़ों को केंद्रीय रूप से संग्रहित नहीं किया जाता है।

     आखिरी गंभीर आंकलन 2014 में खाखा कमेटी ने किया था। उसने पाया गया था कि 1951 और 1990 के बीच विकास परियोजनाओं के कारण 85.4 लाख आदिवासी विस्थापित बेघर हुए थे, जो विस्थापित हुए कुल लोगों का लगभग 41% था, और यह उस समुदाय से था, जो आबादी का 8.6% है। इसके बाद से ऐसा आंकलन करने की कोशिश ही नहीं की गई। इस बीच, प्रभावित लोगों को मुआवज़ा देने के लिए बनाए गए जिला खनिज कोष में 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा इकट्ठा किया गया हैं, और ग्राम सभाओं की यह तय करने में कोई भूमिका नहीं है कि इसका एक रुपया भी कहाँ खर्च किया जाएगा।

     कंजर्वेशन लोगों को उसी पुराने, थके हुए रास्ते से हटाता है – जंगलों में बाड़ लगाकर। प्रोजेक्ट टाइगर ने 1973 से अब तक लगभग 5.5 लाख लोगों को हटाया है या फिर उन्हें दूसरी जगह बसाने के लिए चुना है, और हाल ही में इसकी रफ़्तार में काफ़ी बदलाव आया है। 2021 के बाद अधिसूचित किए गए सिर्फ़ छह रिज़र्व में ही 2.9 लाख लोग रहते हैं, जबकि इस परियोजना के पहले पाँच दशकों में पचास रिज़र्व में 2.54 लाख लोग ही रहते थे। वनाधिकार कानून और वन्य जीव संरक्षण कानून, दोनों के तहत किसी को भी विस्थापित करने से पहले उसके अधिकारों की स्थापना और संसूचित सहमति की ज़रूरत होती है।

     सिमिलिपाल, कान्हा, नागरहोल और काजीरंगा के उदाहरण दिखाते हैं कि वास्तव में यह सहमति कैसे ली जाती है – बिजली काटकर, घर की मरम्मत पर रोक लगाकर, चराई पर रोक लगाकर और अतिक्रमण के झूठे मामले बनाकर – जब तक कि वे विस्थापन के लिए सहमति के फॉर्म पर हस्ताक्षर नहीं कर देते। नागरहोल में लगातार चल रहे संघर्ष के प्रतिनिधि  ने अपनी बुरी हालत और अपने संघर्ष के पक्के इरादे के बारे में बताया कि वे अपनी “वन मातृभूमि” में ही रहेंगे।

बेरोज़गारी बहुत ज़्यादा है, लेकिन रिक्तियां कम

     कन्वेंशन के दोपहर के सत्र में, दुलीचंद ने रोजगार पर पर्चा पेश किया। इसमें यह बताया गया था कि कैसे दोनों सिरों से कटौती करके आरक्षण की गारंटी को नाकाम किया जा रहा है। नौकरियों की संख्या कम हो गई है। 1990 के दशक में सरकारी नौकरियों में लगभग 2 करोड़ लोग थे, जो घटकर 2012 तक 1.7 करोड़ ही रह गये थे, और तब से यह गिरावट जारी है। जो नौकरियां बची हैं, उनमें भी पद खाली हैं।

     2014 और 2024 के बीच केंद्रीय रिक्तियां लगभग दोगुनी हो गईं, और अकेले नौ मंत्रालयों में, 2023 में अनूसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 12,000 से ज़्यादा पद खाली पड़े थे। इसका नतीजा हर स्तर पर दिख रहा है। केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों में अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व 2014 में 8.55% से घटकर 2022 तक 7.33% रह गया, और भारत सरकार के 87 सचिवों में से केवल चार अजा या जजा श्रेणी से हैं।

     जैसा कि केरल के अनुसूचित जनजाति समुदाय के एक नेता एम.एल. किशोर ने कहा, सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में अनुसूचित जनजाति का अनुपात कहीं भी पूरा नहीं हो रहा है। रिकॉर्ड की जांच करना भी मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि केंद्र सरकार ने समावेशी रोजगार समीक्षा को प्रकाशित करना पूरी तरह से बंद कर दिया है और अब अपनी पदों के सिर्फ़ कुछ हिस्से के लिए ही आरक्षण का विवरण देती है। और मनरेगा, जो रोजगार की एकमात्र कानूनी गारंटी थी और जो सीधे आदिवासी परिवारों तक पहुंचती थी, वीबी-ग्राम जी के आने से खत्म होने वाली है।

     इसके तहत आदिवासियों को मिलने वाला रोज़गार आखिरी साल में 13% कम हो गया है, जिसके बाद इसे एक ऐसी योजना से बदल दिया गया है, जिसका खर्च उठाने की जिम्मेदारी राज्यों पर आ गई है।

आदिवासी इलाकों के स्कूलों में भारी गिरावट, दयनीय सेवाएं

     शिक्षा सत्र में, राम नारायण कुररिया ने कन्वेंशन के समक्ष पर्चा  पेश किया, जिसमें बताया गया कि 2002 में एक संवैधानिक संशोधन के जरिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया था और अब आज़ादी के बाद, पहली बार स्कूलों की संख्या में भारी गिरावट आई है। 2018-19 से अब तक 79,000 से ज़्यादा स्कूल बंद हो चुके हैं, जिनमें से लगभग सभी सरकारी स्कूल हैं, जो कार्य दक्षता के नाम पर अपनाई गई विलीनीकरण की नीति के तहत बंद हो गए हैं।

     आदिवासी कल्याण विभाग के द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों की संख्या लगभग 70,000 से घटकर 40,000 से भी कम हो गई है। 700 से ज़्यादा फ्लैगशिप एकलव्य स्कूलों का वादा किया गया था, जिनमें से 511 ही चल रहे हैं। तेलंगाना के एक युवा आदिवासी कार्यकर्ता सचिन ने कहा, "आदिवासी इलाकों के स्कूलों में शाला त्यागी (ड्रॉपआउट) बच्चों की संख्या बढ़ गई है। बजट में कटौती की वजह से हमारे इलाके में सात सौ स्कूल बंद हो गए हैं, और हमारे पास बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने के लिए पैसे नहीं हैं। उच्च शिक्षा तो दूर की बात है।"

     महाराष्ट्र जेन-ज़ी छात्रावास प्रदर्शनकारियों में भूख हड़ताल करने वाली और महाराष्ट्र में एसएफआई की संयुक्त सचिव निशा साबले ने उन शिक्षा संस्थानों के लिए बात की, जो बचे हुए हैं : "एक छात्र की उपेक्षा के कारण मौत हो गई, जो कई किलोमीटर दूर केंद्रीय किचन से खाना खाकर आ रहा था। आश्रम स्कूल में पानी की गुणवत्ता सेहत के लिए बहुत खराब है। छात्रों और उनके अभिभावकों को इंसाफ की मांग करते हुए सड़कों पर उतरना चाहिए।"

     कन्वेंशन के शिक्षा पर्चे में भी यही हालात बताए गए थे, जहाँ एक बिस्तर पर दो या तीन लड़कियों को रखा जाता है, बीमारों के लिए आरक्षित कमरे स्थाई रूप से बंद कर दिए गए हैं और केवल महाराष्ट्र के छात्रावासों में ही लगभग 680 आदिवासी छात्र-छात्राओं की मौत हो चुकी है। निशा 17 दिनों से भूख हड़ताल पर थीं। उनका ज़ोरदार तालियों और हर्षोल्लास के साथ अभिवादन किया गया।

आदिवासी पहचान और भाषायें संकट में 

     कन्वेंशन का आखिरी सत्र आदिवासी पहचान और विश्वास पर था। इसका पर्चा झारखंड के सुकनाथ लोहरा ने पेश किया, जिसमें उन बातों को शामिल किया गया था, जो पहले के सत्र में छूट गई थीं। ज़मीन छीनने और राज्य के आदिवासी अधिकारों की रक्षा में पीछे हटने के साथ-साथ यह भी मुकाबला चल रहा है कि आदिवासी कौन हैं, और यह संकट उनकी पहचान से ही शुरू होता है। तमिलनाडु की विधान सभा  ने एकमत से उन समुदायों के लिए अनुसूचित जनजाति  का दर्जा देने की सिफारिश की है, जिन्हें केंद्र सरकार अभी भी मना कर रही है ; असम की चाय जनजातियाँ मानव शास्त्रीय (एंथ्रोपोलॉजिकल) के बजाय राजनैतिक कारणों से ही इस सूची से बाहर हैं।

     आदिवासी पहचान के लिए उपयोग में लाए जाने वाले मानदंड  1965 में गठित एक कमेटी की सिफारिशों से लिए गए हैं, जिनमें आदिम लक्षण, अकेलेपन और संपर्क में आने में शर्म के परीक्षण आदि शामिल हैं। अगर आज इन मानदंडों को ईमानदारी से लागू किया जाएगा, तो सड़क बनाने के जुर्म में ज़्यादातर आदिवासियों का जनजाति स्टेटस छीन लिया जाएगा। इस बीच, आदिवासी पहचान बनाए रखना एक तरह की परेशानी बन गई है।

     भोपाल के एक आदिवासी नेता तेज कुमार तिग्गा ने कहा, "2014 से, आदिवासियों के अधिकारों का इतना ज्यादा उल्लंघन हुआ है, जितना पहले कभी नहीं हुआ था। मध्य प्रदेश में, अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र देने के लिए पचास साल के रिकॉर्ड मांगे जाते हैं।" जंगल की पूरी कहानी को एक मज़ाक में समेटते हुए उन्होंने कहा : "पेसा कानून अब बस 'पैसा कानून' बनकर रह गया है, जो हमारे लोगों के बजाय निजी कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाता है।"

     अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर (डीलिस्ट) करने की मांग के ज़रिए उनकी पहचान को भी हथियार बनाया जा रहा है। भाजपा और आरएसएस के जाने-माने नेताओं के नेतृत्व वाला जनजाति सुरक्षा मंच, धर्म बदलने वाले आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (अजजा) की सूची से हटाने के लिए अभियान चला रहा है, जबकि दूसरी जगहों पर संघ से जुड़े लोग गैर-आदिवासी समुदायों को इस सूची में शामिल कराने के लिए आंदोलन को बढ़ावा दे रहे हैं।

     राजस्थान के एक आदिवासी कार्यकर्ता प्रेम पारगी ने कहा, "धर्मांतरण के नाम पर आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाना उन्हें आरक्षण से वंचित करने की भाजपा की एक चाल है।" यह अभियान हिंसक हो गया है, जिसमें कब्रों को अपवित्र करना और ईसाई आदिवासी लाशों को उनकी कब्रों से बाहर निकालना भी शामिल है, और यह कानून के साथ खिलवाड़ करने का काम है।

     उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में धर्मांतरण विरोधी कानूनों में सबूत का बोझ आरोपी पर डाला गया है, जबकि राजस्थान में अपने “प्राचीन धर्म” यानी हिंदू पहचान पर लौट आने वाले लोगों को इससे छूट दी गई है। 

     भाषा इस संस्कृति पर कब्ज़ा करने का आखिरी तरीका है। अनुच्छेद 350-A में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने का वादा किया गया है, फिर भी सैकड़ों आदिवासी भाषाओं में से सिर्फ़ संथाली और बोडो ही आठवीं अनुसूची में हैं। गोंडी, भीली और कोक बोरोक जैसी आदिवासी भाषाओं को न तो मान्यता दी गई है, न ही फंड दिया गया है और न ही पढ़ाया जाता है। इनमें से कोक बोरोक तो त्रिपुरा के लगभग एक तिहाई लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। 

     वाघमारे ने कहा, "आदिवासी बोलियों के हर शब्द के पीछे आदिवासियों के होने का एक बड़ा इतिहास छिपा है। इसमें हमारे लोगों को मुक्त करने की बहुत क्षमता है।" उन्होंने आगे कहा, "हमारी भाषाओं को मिटाने और हिंदी थोपने की सरकार की कोशिश असल में आदिवासी विरोधी कदम है।"

     आदिवासी पहचान मिटाने का एक प्रशासनिक तरीका भी है। एकलव्य स्कूलों में भर्ती, जो पहले स्थानीय आरक्षण के नियमों के तहत राज्य करते थे, अब केंद्रीकृत हो गई है और पूरे देश में हिंदी जानना ज़रूरी कर दिया गया है। इसके कारण दक्षिण भारत के स्कूलों में भेजा गया पहला केंद्रीकृत बैच राज्य की भाषा तक नहीं बोल सकता था, आदिवासी भाषा तो दूर की बात है।

     उन स्कूलों के अंदर, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आदिवासी इतिहास के बजाय रामायण और महाभारत को ज़्यादा दिखाया जाता है। सचिन ने कहा, "हम एकलव्य स्कूलों में हिंदू देवी-देवताओं की ज़बरदस्ती कराए जा रहे पूजा का विरोध करते रहे हैं। यह आदिवासी पहचान के खिलाफ है और हमारे बच्चों को हिंदुत्व में शामिल करता है और उनमें दूसरे धर्मों के प्रति नफ़रत भरता है।"

     इन प्रस्तावों को एक साथ मिलाकर देखें, तो मावलंकर हॉल में पारित हुए चार प्रस्तावों में नई मांगें कम हैं और मौजूदा कानून का पालन करने पर ज़ोर ज़्यादा हैं। ये मांगें मौजूदा सरकार द्वारा आदिवासियों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों पर हमले की सच्चाई दिखाती हैं।

     मांगों में वन भूमि पर निरस्त किए गए दावों की समयबद्ध समीक्षा, पेसा के नियमों को कानून की भावना के अनुसार बनाना, पेसा का नगर निकायों तक विस्तार करने का कानून बनाना, समता निर्णय को लागू करना, रोज़गार के आंकड़ों का प्रकाशन, आरक्षित पदों को भरना -- लगभग हर मांग राज्य से वही करने के लिए कहती है, जिसका वादा संसद या संविधान ने पहले से ही किया हुआ है। एक और उतनी ही ज़रूरी मांग, जो कन्वेंशन ने की, वह है वर्तमान में जारी जनगणना में एक अलग कॉलम की मांग, ताकि आदिवासियों को अपना धर्म पंजीकृत करने का मौका मिल सके।

     कन्वेंशन का समापन करते हुए, वृंदा करात ने एक जोशीले भाषण में कहा कि कन्वेंशन में पेश किए गए प्रस्ताव और उस पर हुई चर्चा से साफ है कि आज मोदी-आरएसएस के राज में हिंदुत्व कोड थोपने और कॉर्पोरेट लूट जारी रखने के लिए आदिवासियों के खिलाफ एक अघोषित जंग चल रही है। उन्होंने कहा कि जब आदिवासियों को ज़मीन खोने के साथ-साथ विस्थापन का भी सामना करना पड़ता है, तो समुदाय, पहचान, संस्कृति और विश्वास की बुनियादी भावना खत्म हो जाती है। करात ने कहा कि पिछले दस सालों में 2.15 लाख हेक्टेयर वन भूमि कॉर्पोरेटों – निजी कंपनियों – को दे दी गई है।

     करात ने कहा, "आज सभी खनन क्षेत्रों में कंपनी राज है। साथ ही, प्रतिरोध भी मज़बूत है। हर मुद्दा आपस में हमारे संघर्ष, हमारे विरोध के साथ जुड़ा हुआ है। हमारी ज़िंदगी पर हो रहे हमले का जवाब हमारा उलगुलान है, विरोध और एकता का इतिहास है।"

     समापन भाषण के बाद चार प्रस्तावों को औपचारिक रूप से पारित किया गया। प्रस्ताव पारित होने के बाद भी हॉल खाली नहीं हुआ। लोग खड़े होकर एकजुटता और संघर्ष के नारे लगा रहे थे। प्रतिनिधियों ने हाथों में हाथ डालकर अपनी धुन पर नृत्य किया।

     इस कन्वेंशन के नतीजों और अपनी मांगों को बताने के लिए आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच संबंधित अधिकारियों से मिलने की योजना बना रहा है।

(साभार : द वायर। लेखक जेएनयू में राजनैतिक अर्थशास्त्री और डॉक्टरेट शोधकर्ता हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)