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हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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04 ऑगस्ट 2023
Book
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     "कालीकट राज्य की बात करते हुए बारबोसा कहता है :

Hindutva ke Pratik Hindutva Ka Darshan Hindutva Ka Darshan Hindi Books Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar      कालीकट राज्य में ही एक अन्य जाति के लोग भी हैं, जिन्हें ब्राह्मण कहा जाता है, जिनमें से कुछ पुरोहित वर्ग के हैं (जैसे कि हम लोगों में पादरी होते हैं) जिनके बारे में मैं पहले ही कह चुका हूं। ये सभी एक ही भाषा बोलते हैं। ब्राह्मण के बेटे के अलावा कोई दूसरा ब्राह्मण नहीं बन सकता। जब ये सात वर्ष का होता है तो वह किसी खास जंगली जानवर, जो जंगली गधे के समान होता है, की बिना कमाई गई खाल की दो अंगुली मोटी पट्टी कंधे पर धारण करता है और अगले सात वर्षों तक, जब तक वे इस पट्टी को पहने रहते हैं, पान नहीं खाते हैं। जब वह चौदह वर्ष का हो जाता है, तब ये उसे ब्राह्मण बनाते हैं और उसका वह चमड़े का पट्टा वापस ले लेते हैं तथा उसे एक धागे की तीन लड़ियों वाला सूत्र पहनाते हैं, जिसे वह सारी उम्र पहने रहता है और जो उसके ब्राह्मण होने का प्रतीक होता है। ऐसा वे बड़े समारोहों का आयोजन करके करते हैं, जैसा कि हम यहां किसी पादरी के मामले में करते हैं जब वह पहली बार गिरजाघर में पूजा में भाग लेता है। उसके बाद ब्राह्मण पान खा सकता है, लेकिन मांस या मछली नहीं खा सकता। उनका भारतीयों के बीच अधिक सम्मान होता है और जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं, वे कुछ भी करें, उन्हें मृत्यु दंड नहीं दिया जा सकता। उनके मुखिया ही उन्हें छोटा-मोटा दंड देते हैं। वे हमारी तरह एक बार शादी करते हैं और उनमें केवल सबसे बड़ बेटा ही शादी करता है। उसे सम्पत्ति के अखंड स्वामी के रूप में माना जाता है। दूसरे भाई जीवन भर अविवाहित रहते हैं। ये ब्राह्मण अपनी पत्नियों को सुरक्षित रखते हैं और उनका अत्यंत सम्मान करते हैं ताकि कोई दूसरा व्यक्ति उनके साथ सो न सके। यदि उनमें से कोई मर जाती है, जो वे पुनः शादी नहीं करते। लेकिन यदि कोई महिला अपने पति के साथ प्रपंच करती है तो उसे जहर देकर मार दिया जाता है, जो भाई कुंवारे रहते हैं वे नायर महिलाओं के साथ सोते हैं, वे इसे अधिक सम्मान की बात मानते हैं और चूंकि वे ब्राह्मण होते हैं इसलिए कोई भी महिला उनको मना नहीं करती; वे अपने से उम्र में बड़ी किसी भी महिला के साथ नहीं सो सकते। वे अपने घरों और शहरों में रहते हैं और मंदिरों में पुजारी का कार्य करते हैं तथा वे दिन में खास समय पर पूजा करने के लिए वहां जाते हैं तथा अपने संस्कार और मूर्ति - पूजा संपन्न करते हैं। वहां पुरोहित के रूप में सेवा करते हैं। इनमें से कुछ ब्राह्मण अपने राजाओं के लिए युद्ध लड़ने के अलावा सब प्रकार की सेवा करते हैं। ब्राह्मण या उसके निजी रिश्तेदार को छोड़कर कोई भी अन्य व्यक्ति राजा के लिए खाना नहीं पका सकता; वे दूसरे देशों को धन या व्यापार का सामान ले जाने का कार्य करते हैं। वे जहां कहीं भी जाना चाहते हैं, सुरक्षापूर्वक जाते हैं और उनके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं करता भले ही उस समय इन देशों के राजा आपस में युद्ध करते हों। ये ब्राह्मण अपनी मूर्ति-पूजा में पारंगत होते हैं और अपने पास मूर्ति-पूजा विषयक कई पुस्तकें रखते हैं। राजा इसका अत्यधिक सम्मान करते हैं। "

     “मैं पहले ही कई बार नायारों के बारे में बता चुका हूं, लेकिन फिर भी अब तक मैंने आपको यह नहीं बताया कि वह किस प्रकार के लोग होते हैं। आप जानना चाहेंगे कि मलाबार में एक दूसरी जाति के लोग भी हैं, जिन्हें नायर कहते हैं। इनमें कुछ कुलीन लोग हैं जो लड़ाई लड़ने के अलावा कोई और कार्य नहीं करते, और वे जहां कहीं भी जाते हैं, अपने हथियार साथ लेकर जाते हैं। कुछ तलवार तथा ढाल ले जाते हैं, अन्य तीन-कमान ले जाते हैं और कुछ अन्य भाला ले जाते हैं। वे सभी राजा और अन्य बड़े-बड़े सामंतों के साथ रहते हैं। उन्हें उन राजा या बड़े-बड़े सामतों से वृत्तिका मिलती है, जिनके साथ ये रहते हैं। जो नायर वंश का है, उसको छोड़कर और कोई नायर नहीं बन सकता। उनकी कुलीनता पर कोई धब्बा नहीं लगा होता। वे किसी निम्न जाति के व्यक्ति को नहीं छूते हैं और न ही नायर के घर को छोड़कर किसी के घर का खाना और पानी पीते हैं। ये लोग शादी नहीं करते। उनके भांजे उनके उत्तराधिकारी होते हैं। अच्छे घर में पैदा हुई नायर महिलाएं स्वतंत्र होती है और वे जिस किसी ब्राह्मण या नायर को पसंद करती हैं, उसके साथ समय व्यतीत करती हैं। लेकिन वे अपनी बिरादरी से नीचे के लोगों के साथ मृत्य- दंड के भय से नहीं सोतीं। जब वह बारह वर्ष की हो जाती हैं, तब उनकी माताएं बहुत बड़े समारोह का आयोजन करती हैं। जब मां यह देखती है कि उसकी लड़की वयस्क हो गई है तो वह अपने रिस्तेदारों तथा मित्रों को अपनी पुत्री का सम्मान करने के लिए तैयार करती है। इसके बाद वह किसी खास रिश्तेदार या खास मित्र को अपनी पुत्री से विवाह करने के लिए कहती है। इसके लिए वह व्यक्ति स्वेच्छा से वायदा करता है और तब वह एक आभूषण बनवाता है, जो आधी अशरफी का बना होता है और जो आकार में पट्टी की तरह लंबा होता है इसके बाद मां एक निर्धारित दिन को अपनी सजी-धजी पुत्री के साथ उपस्थित होती है जो बहुमूल्य आभूषण पहने होती है। बड़े आनंदपूर्वक नाच-गाना होता है और लोगों की बहुत भीड़ जमा होती है। उसके बाद सगे-संबंधी या मित्र उस आभूषण को लेकर आते हैं और कुछ खास क्रियाकलाप करके उस आभूषण को उस लड़की के गले में पहना देते हैं। वह इसे जीवन भर एक प्रतीक के रूप में पहने रहती है और उसके बाद वह जिसके साथ भी रहना चाहती है, रह सकती है। वह व्यक्ति उसके पास बिना सोये ही चला जाता है, क्योंकि वह उसका सगा संबंधी होता है। यदि वह उसका रिश्तेदार नहीं है तो वह उसके साथ सो सकता है, लेकिन वह उसके साथ सोने के लिए बाध्य नहीं होता। उसके बाद मां अपनी पुत्री के लिए नवयुवकों की तलाश करती है; वह नायर होना चाहिए जो उसकी पुत्री के साथ संभोग कर सके। वे किसी महिला का कोमार्य भंग करना घिनौना काम समझते हैं। और जब कोई व्यक्ति एकबार उसके साथ सो लेता है, वह दूसरे लोगों के साथ सहवास करने के योग्य हो जाती है। इसके बाद मां नायरों के बीच अन्य युवा नायरों की खोज करती है, जो उसकी पुत्री को रख सके, और उसकी अपनी रखैल बना सके, ताकि तीन या चार नायर उसे रखने और उसके साथ सोने के लिए तैयार हों तथा प्रत्येक उसे प्रातः दिन के लिए निर्धारित धनराशि दे। उसके जितने अधिक प्रेमी होते हैं, उसका उतना ही अधिक सम्मान होता है। उनमें से प्रत्येक उसके साथ दिन के दोपहर से लेकर अगले दिन की दोपहर तक समय गुजारता है और इस प्रकार वे बिना किसी अंशाति के या आपस में झगड़ा किए हुए समय बिताते हैं। यदि उनमें से कोई भी उसे छोड़ना चाहता है, तो वह उसे छोड़ देता है, और दूसरी के साथ चला जाता है। ठीक इसी तरह यदि वह किसी व्यक्ति से दुखी या परेशान हो जाती है, तो वह उसे जाने के लिए कह देती है, और वह चला जाता है या उसके साथ अच्छे संबंध बना लेता है। यदि उनके कोई बच्चे होते हैं जो वे मां के पास रहते हैं, जो उन्हें पालती है क्योंकि वे उन्हें किसी व्यक्ति विशेष का बच्चा नहीं मानती, भले ही उसमें और उस व्यक्ति में समानता हो, वह व्यक्ति उन बच्चों को अपने बच्चे नहीं मानता है; और न ही उन्हें अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी क्योंकि, जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं, उनके उत्तराधिकारी उनके भांजे होते हैं।, जो उनकी बहनों के बेटे होते हैं। यदि कोई इस नियम के बारे में गहराई से सोचेगा तो वह पाएगा कि इसे किसी सामान्य व्यक्ति की सोच की तुलना में बड़ी गहराई से सोचा- विचारा गया था, क्योंकि लोग कहते हैं कि राजाओं ने इसकी इसीलिए व्यवस्था की थी ताकि बच्चों को पालने जैसे भार और मेहनत के कारण नायरों को उनकी सेवा से अलग न रहना पड़ें। "

     "मलाबार राज्य के लोगों की एक और भी जाति है जिसे वे बियाबार, भारतीय व्यापारी, देश के मूल निवासी कहते हैं। वे हर प्रकार के माल का व्यापार करते हैं और वह व्यापार समुद्री बंदरगाहों तथा देश के अंदर, दोनों जगहों पर कहते हैं जहां कहीं उनका व्यापार अत्यधिक लाभदायक हो । वे नायरों तथा किसानों से साबुन, काली मिर्च तथा अदरक इकट्ठा कर लेते हैं और समय पूर्व ही नई फसलों को सूती कपड़ों तथा अन्य वस्तुओं - जिन्हें वे समुद्री बंदरगाहों पर रखते हैं, - के बदले खरीद लेते हैं। उसके बाद वे उन्हें बेचते हैं और इस प्रकार अत्यधिक पैसा कमाते हैं। उनके विशेषाधिकार इस प्रकार के हैं कि जिस देश में भी वे रहते हैं, उस देश का राजा कानूनी प्रक्रिया द्वारा उन्हें फांसी नहीं दे सकता। "

     "इस देश में एक और जाति है, जिसे कुईऐवम कहते हैं। वे नायरों से भिन्न नहीं हैं। फिर भी उस गलती के कारण जो उन्होंने की है, वे हमेशा ही अलग रहते हैं। उनका कार्य मूर्तियों और राजाओं के लिए मिट्टी के बर्तन और उनकी छतों के लिए ईंटें तैयार करना होता है। इनकी छत खपरैल की जगह ईंटों की बनी होती हैं; जैसा कि मैं पहले ही कहा चुका हूं दूसरे घर छप्पर के बने होते हैं। इनकी अपनी अलग ढंग की मूर्ति-पूजा होती है तथा इनकी अलग प्रकार की मूर्तियां होती हैं"।

     "एक दूसरे मेनाटोज नाम की मूर्ति पूजक जाति है, जिसका व्यवसाय राजाओं, ब्राह्मणों तथा नायरों के कपड़े धोना है। यही इनकी जीविका का साधन है और वे कोई अन्य व्यवसाय नहीं कर सकते हैं।"

     “इन जातियों से नीची एक अन्य जाति और भी है, जिसे केलेटिस कहा जाता है। ये जुलाहे होते हैं, जिनके पास सूती तथा रेशमी कपड़े बुनने के अलावा कमाई का कोई अन्य साधन नहीं होता है। वे निम्न जाति के लोग होते हैं और उनके पास न के बराबर पैसा होता है, इसलिए वे निम्न स्तर के लोगों के लिए ही कपड़े बनाते हैं। वे स्वेच्छा से अलग रहते है और उनकी अपनी अलग मूर्ति-पूजा होती है। "

     "उपर्युक्त जातियों से नीचे ग्यारह अन्य जातियां और है जिनके साथ दूसरे लोग संबंध स्थापित नहीं करना चाहते, न ही उन्हें वे मृत्यु-दंड के भय से छूते हैं। उनमें आपस में भी बहुत बड़ा अंतर होता है। वे एक-दूसरे के साथ घुल-मिल नहीं सकते। इन निम्न जातियों में तूआस सबसे अधिक विशुद्ध जाति मानी जाती है। उनका मुख्य पेशा खजूर के पेड़ उगाना तथा उनके फल इकट्ठा करना होता है, जिसे वे सिर तथा पीठ पर लादकर बेचने के लिए ले जाते हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में बोझा ढोने के लिए भारवाही पशु नहीं होते हैं। "

     "इन जातियों से भी निम्न स्तर की एक अन्य जाति मानेन (छपी हुई पुस्तक में मैं है ) होती है जो न तो दूसरों के साथ संबंध स्थापित करते हैं, न ही दूसरों को छूते है और न ही अन्य लोग उन्हें छूते हैं। जन-सामान्य के लिए वे धोबी होते हैं तथा वे चटाई बनाने का व्यवसाय करते हैं जिसे उन्हें छोड़कर दूसरों को वंचित किया जाता है। उनके बेटे जबरदस्ती वही व्यवसाय करते है उनकी मूर्ति-पूजा का ढंग बिल्कुल अलग होता है।"

     "इस क्षेत्र में इससे भी निम्न स्तर की जाति होती है, जिसे कैनेकास कहा जाता है। इनका व्यवसाय बकसुए तथा छतरी बनाना होता है। वे अक्षर ज्ञान खगोल विद्या के उद्देश्य से ही प्राप्त करते हैं। वे बहुत बड़े ज्योतिषी होते हैं और आने वाली घटनाओं के बारे में बहुत ही सत्यता के साथ भविष्यवाणी करते हैं। कुछ सामंत उन्हें इसी निमित्त रखते हैं। "