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हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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04 ऑगस्ट 2023
Book
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     हिंदू चारों जातियों के प्रत्येक व्यक्ति को उनके व्यवसाय तथा धंधों के अनुासर विशिष्ट नाम देते हैं, जैसे सामान्य तौर पर ब्राह्मण को जब तक वह घर पर रह कर अपना काम करता है, ब्राह्मण नाम से पुकारा जाता है। जब वह एक अग्नि की सेवा करता है तो उसे इश्तिन कहते हैं; यदि वह तीन अग्नियों की सेवा करता है तो उसे अग्निहोत्री कहते हैं, यदि वह इनके अतिरिक्त अग्नि को आहुति देता है तो उसे दीक्षित कहते हैं और चूंकि ऐसा ब्राह्मण के साथ है, इसलिए अन्य के साथ भी ऐसा ही है। नीची जातियों के अंतर्गत हादी का स्थान ऊंचा है क्योंकि वे स्वयं को गंदे कर्मों से दूर रखते हैं। दूसरे क्रम में डोम होते हैं जो सारंगी बजाते हैं और गाते हैं। उनसे भी निम्नतम वर्ग बधिकों तथा जल्लादों का है। सबसे बुरे बधाान्तन होते हैं, जो न केवल मरे हुए जानवरों का मांस खाते हैं, बल्कि कुत्ते तथा अन्य जानवरों का भी मांस खाते हैं।

Hindutva ke Pratik Hindutva Ka Darshan author Dr Babasaheb Ambedkar      चारों जातियों में प्रत्येक जाति के लोग अपनी बिरादरी के साथ मिलकर ही खाना खाते हैं। भिन्न जातियों के दो व्यक्तियों के साथ-साथ खान-पान नहीं होता। यदि किसी ब्राह्मण के समूह में ऐसे दो व्यक्ति हैं जो एक-दूसरे के शत्रु है और वे एक-दुसरे के पास बैठ गए हैं तो वे दोनों अपने आसनों के बीच तख्ती रखकर या कपड़े का टुकड़ा रखकर या किसी अन्य तरीके से बाड़ बना लेते हैं और उनके बीच यदि मात्र कोई रेखा ही खींची होती है तो उन्हें अलग-अलग माना जाता है। चूंकि किसी के बचे हुए भोजन को खाना निषिद्ध है, इसलिए हरेक अकेले व्यक्ति को स्वयं के लिए अपना खाना रखना पड़ता है, क्योंकि खाना खाने वाले दल के प्रत्येक व्यक्ति को एक ही थाली से खाना लेना होता है, अतः पहले व्यक्ति द्वारा खा चुकने के बाद जो कुछ भी उस थाली से बच जाता है, वह दूसरी बार खाने वाले व्यक्ति के लिए जूठन माना जाता है, जिसे खाना निषिद्ध है । "

     अलबरूनी ने केवल वहीं तक स्वयं को सीमित नहीं रखा जहां तक उसे हिंदू समाज-संगठन ने आकर्षित किया, बल्कि उसने यहां तक कहा :

     "हिंदुओं में ऐस समाज बहुत हैं। मुसलमान इनसे बिल्कुल अलग हैं, सभी व्यक्तियों को समान मानते है, केवल धर्मपरायणता को छोड़कर हिंदू और मुसलमानों के बीच मेल-जोल, स्थायित्व होने में यही सबसे बड़ी बाधा है। "

     1500 ई. से 1571 ई. तक भारत में पुर्तगाली सरकार की सेवारत एक पुर्तगाली अधिकारी के बारे में अपने अनुभव को दर्ज किया है। गुजरात राज्य के बारे में वह कहता है :

     "बीढ़ के हाथों में गुजरात राज्य के आने के पहले मूर्ति पूजकों की एक विशेष जाति जिसे बीढ़ राजपूत कहते थे, यहां रहते थे, जो उन दिनों इस देश के सरदार तथा रक्षक हुआ करते थे तथा आवश्यकतानुसार युद्ध किया करते थे। ये लोग भेड़ तथा मछलियों को मारकर तथा अन्य सभी प्रकार की खाद्य सामग्री खाते हैं। पहाड़ों में अब भी इनमें से बहुत से है जहां अब भी इनके बहुत बड़े-बड़े गांव हैं और वे गुजरात के राजा की आज्ञा का उल्लंघन ही नहीं करते वरन् वे उसके खिलाफ रोजाना युद्ध करते हैं; राजा उनके विरुद्ध डटे रहने में अब भी सक्षम नहीं हैं क्योंकि वे बहुत अच्छे घुड़सवार - धनुर्धर होते हैं और बीढ़ी से अपना रक्षा करने के लिए अनेक प्रकार के हथियार रखते हैं, जिनके आधार पर वे लगातार युद्ध करते रहते हैं; फिर भी न तो कोई उनका राजा होता और न ही उनका कोई मालिक। और इसी राज्य में एक अन्य प्रकार से मूर्तिपूजक हैं जिन्हें बनियां कहते हैं, (जो बहुत बड़े व्यापारी हैं) वे बीढ़ी के साथ रहते हैं और अपना व्यापार उन्हीं के साथ करते हैं। ये लोग न तो मांस खाते हैं न मछली खाते हैं और न ही कोई ऐसी अन्य चीज खाते हैं जो मर सकती है, वे किसी की हत्या नहीं करते न ही वे किसी जानवर की हत्या देखना पसंद करते हैं; और इस प्रकार वे अपनी मूर्ति-पूजा जारी रखते हैं तथा इसे पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं, और आश्चर्य की चीज होती है अक्सर ऐसा होता है कि बीढ़ उनके पास जीवित कीड़े-मकोड़े या छोटे-छोटे पक्षी पकड़ लाते हैं और उन्हें उनके ही सामने मारने का नाटक करते हैं तो ये बनिया लोग उन जीव जंतुओं को खरीद लेते हैं और उनके बदले जो पैसे देते हैं ये पैसे उनकी वास्तविक कीमत से भी ज्यादा होते हैं ताकि उन जीव-जंतुओं का जीवन बच सके और वे मुक्त विचरण कर सकें। यदि राज्य के राजा या गवर्नर किसी व्यक्ति को उसके द्वारा किए गए अपराध के लिए फांसी की सजा दे देता है तो वे स्वयं एक साथ इकट्ठे हो जाते हैं और उस व्यक्ति को न्यायालय से खरीद लेते हैं, यदि वे उसे बेचने के इच्छुक हों, ताकि उसकी मृत्यु न हो। अनेक प्रकार के बीढ़ फकीर जब इन लोगों से भीख लेना चाहते हैं। तो वे बड़े-बड़े पत्थरों से अपने कंधों और पेट को जोर-जोर से पीटते हैं, मानों वे स्वयं को उनके सामने मार ही डालेंगे। इसे रोकने के लिए वे उन्हें बहुत ज्यादा भिक्षा दे देते हैं ताकि वे शांतिपूर्वक चले जाएं। अन्य अपने पास छुरी- चाकू रखते हैं, जिनसे वे ऊपरी बाहों और टांगों को घायल कर लेते हैं और इनको भी वे बहुत सारी भिक्षा दे देते हैं ताकि वे स्वयं को न मारें। अन्य उनके दरवाजे पर जाते हैं और अपने लिए चूहे तथा सर्पों को मारने की धमकी देते हैं। उन्हें भी वे बहुत सारा धन दे देते हैं ताकि वे ऐसा न करें। इसकी वजह से बीढ़ उनका सम्मान करते हैं। जब ये बनिया लोग सड़क पर चींटियों के झुंड को देखते हैं, तो वे पीछे हट जाते हैं और उन्हें बिना कुचले हुए दूसरे रास्ते से निकल जाते हैं और अपने घरों में वे दिन के प्रकाश में ही भोजन करते हैं। वे न तो रात में और न दिन में दिया जलाते हैं, क्योंकि छोटे-छोटे कीट-पतंगे उसी लपटों से जल जाते हैं जब रात में प्रकाश की बहुत आवश्यकता होती है तो उनके पास वार्निश किए गए कागज या कपड़े की लालटेन होती है, ताकि कोई भी जीवधारी उसमें प्रवेश न कर सके और उसकी लपटों से न मर सकें और यदि इन लोगों के जुएं पड़ जाती हैं तो वे उन्हें मारते नहीं हैं। लेकिन जब से उन्हें अत्यधिक कष्ट देती हैं तो वे उन मूर्तिपूजकों को बुलाते है जो उन्हीं से साथ रहते हैं, जिन्हें वे पवित्र व्यक्ति मानते हैं और जो साधुओं के सदृश होते हैं, कड़ी तपस्या करके जीवन बिताते है और देवताओं की भक्ति करते हैं। बनिए लोग इन्हें अपने घरों में रखते हैं, और ये जितनी भी जुएं पकड़ते हैं, उन्हें अपने सिरों पर रख लेते हैं और मांस खिलाकर उनकी वृद्धि करते हैं तथा ऐसा करके वे कहते हैं वे अपने कष्ट की बहुत बड़ी सेवा करते हैं। इस प्रकार वे कभी हत्या न करने के अपने नियम का कठोरता से पालन करते हैं। दूसरी ओर वे बढ़े सूदखोर होते हैं, माप तौल, सिक्के और दूसरी चीजों में परले सिरे की बेईमानी करते हैं तथा बड़े झूठे होते हैं। वे मूर्तिपूजक लोग सांबले, लंबे, नाजुक और सुंदर होते हैं। सुंदर वस्त्र पहनते है तथा बहुत ही सात्विक भोजन करते हैं वे अपने खाने में दूध, मक्खन, चीनी, चावल लेते हैं और अनेक प्रकार के परिरक्षित पदार्थ लेते हैं, वे फल-सब्जियों का बहुत अधिक उपयोग करते हैं तथा अपने खाने में हरा साग लेते हैं, जहां कहीं भी वे रहते हैं, उनके फलों के बगीचे तथा अनेक जलाशय होते हैं, जहां स्त्री तथा पुरुष दिन में दो बार नहाते हैं और नहाने के बाद कहते हैं कि वे अब तक किए गए सभी पापों से मुक्त हो गए हैं। हमारी स्त्रियों की तरह से बनिया लोग लम्बे-लम्बे बाल रखते हैं, और सिर पर चुटिया बनाकर उसमें गांठ लगाते हैं और उस पर पगड़ी पहनते हैं ताकि वे उन्हें एक साथ बंधा हुआ रख सकें। वे अपने बालों में फूल तथा अन्य सुगंधित चीजें लगाते हैं।

     वे केसर तथा अन्य इत्रों वाले सुगंधित केसर और चंदन का लेप करते हैं। वे बहुत ही कामुक होते हैं। वे सूती तथा सिल्क का लम्बा कुर्ता और चमड़े के बने नुकीले तथा चमकीले कीमती जूते पहनते हैं उनमें कुछ लोग रेशमी और जरीदार कपड़े की छोटी-छोटी बंड़ी पहनते हैं। वे सोने तथा चांदी से सज्जित चाकुओं को छोड़कर हाथियार नहीं रखते और ऐसा दो कारणों से है, पहला यह कि वे ऐसे लोगे हैं जो हथियार का बहुत ही कम उपयोग करते हैं; तथा दूसरा कारण यह है कि बीढ़ उनकी रक्षा करते हैं।

     "मूर्ति पूजकों का एक और वर्ग है, जिसे वे ब्राह्मण कहते हैं और उनमें जो पुरोहित होते हैं, वे बड़े आकार वाले अपने पूजा स्थलों तथा प्रार्थना-स्थलों की व्यवस्था करते हैं तथा उन पर उनका अधिकार होता है, जिससे अत्यधिक आमदनी होती है और उनमें से अनेक भिक्षा पर जीते हैं। इनके घरों में लकड़ी की और कुछ पत्थर तथा कांसे की बनी हुई अनेक मूर्तियां होती हैं, और इन घरों या पूजा घरों में वे इन मूर्तियों के सम्मान में बड़े-बड़े आयोजन करते हैं, मोमबत्तियां तथा तेल के दीपक जलाते हैं और हमारी तरह घंटियां भी बजाते हैं। इन ब्राह्मणों तथा मूर्ति पूजकों के धर्म में पवित्र त्रिमूर्ति से बहुत समानताएं है और वे त्रिमूर्ति के संबंधों को अत्यधिक सम्मान देते हैं, हमेशा उनकी प्रार्थना करते हैं। जिनके सामने वे अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं और उसे अपना सच्चा ईश्वर, सृजक तथा सभी पदार्थों का निर्माता मानते हैं। त्रिमूर्ति तीन व्यक्ति और एक ईश्वर है और वे कहते है कि अनेक अन्य ईश्वर भी हैं, जो उसके अधीन कार्य करते हैं और वे उनमें भी विश्वास रखते हैं। ये ब्राह्मण तथा मूर्तिपूजक जहां कहीं हमारे गिरजाघरों को देखते हैं, वे उनमें प्रवेश करते हैं और हमारी प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना करते हैं, हमेशा सांता मरिया के लिए पूछते हैं, जैसे कि उनको इसके बारे में समझ और जानकारी हो, और वे हमारे गिरजाघरों का हमारी तरह सही सम्मान करते हैं, और कहते है कि हमारे और उनके बीच कोई खास अंतर नहीं । ये मरने वाली वस्तु को नहीं खाते और ये किसी की हत्या नहीं करते हैं। नहाने को ये बहुत बड़ा आयोजन मानते हैं तथा कहते हैं कि इससे उनको मोक्ष मिलता है।"