हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अध्याय 4
हिंदुत्व के प्रतीक
क्या हिंदुओं के सामाजिक संगठनों में कोई विलक्षण चीज है? विद्वानों द्वारा किए गए अन्वेषणों से अनभिज्ञ एक सीधा-सादा हिंदू तो यही कहेगा कि इसमें (हिंदू सामाजिक संगठन) कुछ भी आश्चर्यजनक, असामान्य या अप्राकृतिक नहीं है यह बिल्कुल स्वाभाविक है जो लोग अपने जीवन को अलग-थलग रह कर जीते हैं। वे कभी भी अपने तौर-तरीकों की विशिष्टताओं के प्रति सजग नहीं होते। लोग पीढ़ी-दर- पीढ़ी अबाध गति से स्वयं को नाम देते चले आ रहे हैं। लेकिन बाह्य व्यक्तियों, गैर-हिंदुओं को हिंदुओं का सामाजिक संगठन क्या खटकता है? क्या यह उन्हें वैसा ही सामान्य तथा स्वाभाविक दिखाई देता है, जैसा कि हिदुओं को लगता है ?
'भारत की आबादी सात भागों में बंटी हुई है। दार्शनिक पहली श्रेणी में आते हैं पर संख्या की दृष्टि से उनका वर्ग सबसे छोटा है। बलि चढ़ाने या अन्य पवित्र धार्मिक संस्कार करने के इच्छुक लोगों द्वारा निजी तौर पर तथा राजाओं द्वारा सार्वजनिक रूप से भी महाधर्म परिषद में उनकी सेवाओं का उपयोग किया जाता है, जिसमें नव वर्ष के प्रारंभ में सभी दार्शनिक राजा के द्वार पर एकत्रित हो जाते हैं जहां कोई भी दार्शनिक, जिसने लेखन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण व उपयोगी सुझाव दिए हैं या जिसने फसल तथा पशुओं के उन्नयन के लिए या जनहित को बढ़ावा देने के लिए कोई टिप्पणी की है, वह सार्वजनिक तौर पर इसकी घोषणा कर सकता है यदि यह पता लग है जाता है कि किसी ने तीन बार गलत सूचना दी है तो कानूनानुसार उसकी भर्त्सना की जाती है और उसे उसके शेष जीवन के लिए चुप रहने का दंड दिया जाता है। लेकिन यदि कोई उचित सलाह देता है तो उसे कराधान या अंशदान देने से छूट दे दी जाती है। दूसरी जाति कृषकों की है जो बहुसंख्य है तथा अत्यधिक मृदुल तथा सरल स्वभाव के होते हैं। उन्हें सैन्य सेवा से छूट दी जाती है और वे निर्भय होकर अपनी जमीनों को जोतते हैं। वे कभी भी शहर, कस्बे में उसके उपद्रवों में भाग लेने या किसी अन्य उद्देश्य से नहीं जाते । अतः कई बार ऐसा होता है कि एक ही समय तथा देश के एक ही भाग में कुछ लोग युद्ध में रत दिखाई देते हैं और अपने जीवन को जोखिम में डालकर लड़ते हैं। जबकि दूसरी ओर उनके पास में ही रहने वाले लोग निश्चित होकर हल चला रहे होते हैं तथा निराई-गुड़ाई कर रहे होते हैं, क्योंकि उनकी रक्षा के लिए ये सैनिक वर्ग है ही। समस्त भूमि राजा की संपत्ति होती है तथा कृषक उस पर खेती इस शर्त पर करते हैं कि उनको फसल का एक चौथाई भाग मिलेगा।
तीसरी जाति पशुपालकों तथा शिकारियों की है केवल वे ही शिकार कर सकते हैं, पशु पाल सकते हैं, भारवाही पशुओं को बेच सकते हैं। या उन्हें किराए पर दे सकते हैं। खेत में बोए हुए बीजों को चट कर जाने वाले जंगली जानवरों से भूमि को साफ करने के बदले उन्हें राजा की ओर से भत्ते के रूप में अनाज दिया जाता है। वे घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करते हैं तथा डेरों में रहते हैं।
पशुपालकों तथा शिकारियों के बाद चौथा वर्ग वह है, जिसमें व्यापारी शामिल हैं, जो बर्तन बेचते हैं और शारीरिक श्रम करते हैं। इनमें से कुछ कर देते हैं तथा राज्य को कतिपय निर्धारित सेवाएं प्रदान करते हैं। लेकिन हथियार निर्माता तथा जहाज बनाने वाले राजा से मजदूरी तथा खाद्य सामग्री प्राप्त करते हैं, क्योंकि वे मात्र उन्हीं के लिए कार्य करते हैं। सेनानायक सैनिकों को हथियारों की आपूर्ति करता है तथा नौसेनानायक यात्रियों तथा वाणिज्यिक वस्तुओं, दोनों के परिवहन के लिए जहाजों को किराए पर देता है।
पांचवा वर्ग सैनिकों का है, जो सक्रिया सेवा में न लगे होने पर अपना समय केवल खाने-पीने में ही व्यतीत करते हैं उन पर राजा की ओर से व्यय किया जाता है, अतः आवश्यकता पड़ने पर वे सदैव लड़ने को तैयार रहते हैं, क्योंकि उनके पास उनके शरीरों के अलावा और कुछ भी नहीं होता। छठा वर्ग भेदियों का है, जिन्हें यह कार्य सौंपा जाता है कि जो कुछ भी हो रहा है, उस पर निगरानी रखें तथा राजा को गुप्त रूप से सूचित करें। कुछ को शहर में सतर्कता का तो कुछ को सेना के निरीक्षण का कार्य सौंपा जाता है। पहले वाले शहर की वेश्याओं को अपने सहायक के रूप में नौकरी पर रखते हैं तथा दूसरे वाले कैम्प की वेश्याओं को अपने सहायक के रूप में नौकरी पर रखते हैं तथा दूसरे वाले कैम्प की वेश्याओं को अपना सहायक बनाते हैं। इन पदों पर योग्यतम तथा सर्वाधिक विश्वासपात्र व्यक्तियों को बिठाया जाता है। सातवें वर्ग में रात के पार्षद तथा कर निर्धारक शामिल हैं। इनको उच्चतम सरकारी पद न्यायालय तथा जन सामान्य के कार्यों का शासन कार्य सौंपा जाता है।
किसी को भी अपनी जाति से बाहर शादी करने या अपना व्यवसाय या वाणिज्य बदलने या एक से अधिक धंधा करने की अनुमति नहीं होती। केवल दार्शनिक ही इसका अपवाद होता है क्योंकि उनके गुणों के कारण उन्हें यह विशेषाधिकार दिया जाता है। "
लगभग 1030 ईस्वी में भारत की अपनी यात्रा का विवरण देते हुए अलबरूनी को भी हिंदू समाज संगठन के अजूबों ने आकर्षित किया होगा, क्योंकि उन्होंने भी अपने अनुभवों को दर्ज करते समय इस बात को भी भुलाया। वह लिखता है :
“हिंदू अपनी जातियों को वर्ण अर्थात् रंग कहते हैं और जन्म के आधार पर उन्हें जातक अर्थात् जन्म कहते हैं। शुरू से ही ये जातियां केवल चार हैं।
1. ब्राह्मण सबसे ऊंची जाति के है, जिनके बारे में हिंदुओं की पुस्तकों से पता चलता है कि वे ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए थे और ब्रह्मा उस शक्ति का दूसरा नाम है जिसे प्रकृति कहते हैं तथा सिर जीवधारी के शरीर का सर्वोत्तम भाग होता है; अत: ब्राह्मण संपूर्ण जाति के श्रेष्ठ अंग हैं। हिंदू उन्हें सर्वोत्तम मानव मानते हैं।
2. अगली जाति क्षत्रियों की है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे ब्रह्मा के कंधों तथा हाथों से पैदा हुए थे। उनका पद ब्राह्मण के पद से ज्यादा नीचा नहीं है।
3. उनके बाद वैश्य है, जो ब्रह्मा की जंघाओं से पैदा हुए।
4. शूद्र चौथे नम्बर पर आते हैं, जो ब्रह्मा के पैरों से पैदा हुए।
बाद के दोनों वर्गों के बीच ज्यादा अंतर नहीं है तथापि ये वर्ग एक-दूसरे से भिन्न है और वे एक ही कस्बे तथा गांवों में रहते हैं तथा उनके निवास स्थान एक-दूसरे के घुले-मिले होते हैं।
शूद्र के बाद अन्त्यज आते हैं, जो विभिन्न प्रकार की सेवाएं करते हैं तथा जिन्हें किसी भी जाति में नहीं गिना जाता, बस उन्हें किसी विशेष शिल्प या व्यवसाय का सदस्य ही माना जाता है। धोबी, मोची तथ जुलाहे को छोड़कर उनमें आठ वर्ग ऐसे हैं जो एक-दूसरे के साथ शादी-विवाह कर सकते हैं क्योंकि कोई अन्य उनके संबंध रखने को तैयार नहीं होता। ये आठ वर्ग हैं। धोबी (रजक), मोची, वाजीगर, टोकरी तथा ढाल बनाने वाला, नाविक (मल्लाह), मछुआरा, जंगली जानवरों तथा चिड़ियों का शिकारी तथा जुलाहा । इनकी बस्तियां चारों वर्णों के लोगों की बस्तियों के समीप नहीं होती हैं। ये लोग गांवों तथा कस्बों के बाहर बसे होते हैं।
हादी, डोम, चांडाल तथा बधातो नामक लोगों को किसी भी जाति या वर्ग में नहीं गिना जाता। वे गांवों की सफाई तथा अन्य सेवाओं जैसे गंदे कार्यों में लगे रहते हैं। उन्हें केवल एक अनन्य वर्ग माना जाता है। वास्तव में उन्हें अवैध बच्चों की तरह माना जाता है; क्योंकि सामान्य धारणा यह है कि व्यभिचार से पैदा हुए बच्चों के रूप में उनका पिता शूद्र तथा माता ब्राह्मणी होती है, अतः वे बिरादरी से निकाले गए पतित होते हैं।