हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
जब तक ब्राह्मण हथियार का सहारा नहीं लेते, तब तक क्षत्रियों को कैसे दंडित कर सकते हैं? मनु जानता है और इसलिए वह ब्राह्मण को स्वयं हथियार उठाने के लिए अनुमति देता है, ताकि क्षत्रियों को दंडित किया जा सके।
12.100 सेना पर नियंत्रण, राजकीय प्राधिकर, दंड देने की शक्ति तथा सभी राष्ट्रों के ऊपर प्रभुसत्ता राज्य का केवल वही अधिकारी है जो वेद-शास्त्र का पूर्ण ज्ञाता है, अर्थात् वह ब्राह्मण है।
हिंसक आक्रमण से समाज व्यवस्था के परिरक्षण के दृष्टिकोण से तीन बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है क्रांति के लिए तीन कारक उत्तरदायी होते हैं: (1) न्यायविरुद्ध एहसास की उपस्थिति, (2) यह जानने की क्षमता कि व्यक्ति विशेष के साथ अनुचित व्यवहार किया जा रहा है, तथा (3) हथियारों की उपलब्धता । दूसरी बात यह कि विद्रोह को भड़कने ही न दिया जाए और यह कि विद्रोह के भड़कने के बाद उसे दबाया जाए। तीसरी बात यह कि क्या विद्राह को रोका जाना संभव है या विद्रोह को दबाने का तरीका ही शेष है; यह उन नियमों पर निर्भर करता है, जो विद्रोह की आशंकाओं का संकेत करते हैं।
जब सामाजिक प्रणाली उन्नति के अवसर को रोकती है, शिक्षा तथा हथियार उठाने के अधिकार से वंचित करती है, जो इसका मतलब है कि यह समाज व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह को दबाने की स्थिति में हैं जबकि दूसरी ओर समाज-व्यवस्था शिक्षा के अधिकार को अनुमति देती है और हथियारों के उपयोग को मान्यता देती है, यह उनके द्वारा विद्रोह को नहीं दबा सकती जो अनिष्ट के शिकार होते हैं। समाज - व्यवस्था को संरक्षित रखने में पहली विधि को अपनाया गया है। इसने भावी पीढ़ियों के लिए निम्न वर्गों की सामाजिक स्थिति निर्धारित कर दी है इनके आर्थिक स्तर को भी निर्धारित कर दिया गया है इन दोनों के बीच कोई असमानता नहीं है, अत: शिकायत पैदा होने की कोई संभावना नहीं है। इसमें निम्न वर्गों के लिए शिक्षा की मनाही है। परिणाम यह है कि कोई भी अपनी निम्नता के प्रति सजग नहीं है। वे तो बस इतना जानते हैं कि निम्नावस्था के लिए कोई जिम्मेदार नहीं हैं यह तो भाग्य में ही लिखा है। यह भी मान लिया जाए कि शिकायत है, शिकायत के प्रति जागरूकता भी है, तब भी निम्न वर्ग हिंदू समाज व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह नहीं कर सकते, क्योंकि हिंदू समाज व्यवस्था सामान्य जन को हथियारों के उपयोग का अधिकार नहीं देती। मुसलमान या नाजियों जैसी समाज व्यवस्थाएं इसके बिल्कुल विपरीत हैं। वे सभी को समान अवसर प्रदान करती है। इनमें ज्ञानार्जन की स्वतंत्रता है। उनमें उन्हें हथियारों के उपयोग करने की स्वतंत्रता है और वे बल तथा हिंसा का सहारा लेकर विद्रोह को दबाने का कार्य स्वयं कर सकते हैं। अवसर की स्वतंत्रता न देना, ज्ञानार्जन की स्वतंत्रता न देना, हथियारों के उपयोग का अधिकार न देना सबसे बड़ी निर्दयता है । इसका परिणाम यह है कि मनु मानव के हाथ-पांव काट लेता है और उसे नपुंसक बना देता है हिंदू समाज-व्यवस्था को ऐसा करने पर कोई शर्म नहीं है । तथापि, इसने दो उपलब्धियां हासिल की हैं। यह सर्वाधिक प्रभावी सिद्ध हुई हैं, हालांकि स्थापित व्यवस्था को परिरक्षित करने की यह सबसे शर्मनाक विधि है दूसरे, मानवता का गला दबाने के सर्वाधिक अमानवीय तरीकों व साधनों का उपयोग करने के बावजूद यह हिंदुओं को बहुत ही मानवीय लोक होने की प्रतिष्ठा प्रदान करती है। वास्तव में नाजियों को हिंदुओं से बहुत कुछ सीखना था। यदि उन्होंने जनता को दबाने की हिंदूवादी तकनीक अपनाई होती, जो वे बिना किसी खुली बर्बरता के यहूदियों को कुचलने में सफल हो गए होते तथा स्वयं को मानवता का अवतार भी सिद्ध कर सकते थे।
हिंदू समाज व्यवस्था की तीसरी निराली विशेषता यह है कि यह स्वयं ईश्वर द्वारा बनाई गई दैवीय व्यवस्था है। चूंकि यह पवित्र व्यवस्था है, अतः इसका निराकरण, संशोधन, यहां तक की इसकी समीक्षा भी नहीं की जा सकती। हिंदू समाज-व्यवस्था के दैवी चरित्र के बारे में किसी भी संदेह में निवारण के लिए भगवद्गीता तथा मनुस्मृति के निम्नांकित श्लोकों की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है। हिंदुओं के ईश्वरों में से एक ईश्वर श्रीकृष्ण जिसका शब्द की भगवत्गीता है, कहता है :
4.13 गुण और कर्मों के विभाग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद मेरे द्वारा रचे गए हैं और इनकी रचना मेरे द्वारा ही की गई है।
18.41-44 हे परंतप! ब्राह्मण-क्षत्रिय, वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म - स्वभाव से उत्पन्न हुए गुण विभक्त किए गए हैं। अंत:करण का निग्रह, इंद्रियों का दमन, बाहर-भीतर की शुद्धि, धर्म के लिए कष्ट सहन करना, क्षमा-भाव, मन, इंद्रियों और शरीर की सरलता, आस्तिक बुद्धि-शास्त्र विषयक ज्ञान और परमात्व तत्व का अनुभव ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुराई और युद्ध में भी न भागने का स्वभाव, दान और स्वामी भव क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं। खेती, गौ-पालन और क्रय-विक्रय रूप, सद्व्यवहार वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं और इसी प्रकार सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।
कृष्ण हिंदू समाज-व्यवस्था के विरुद्ध प्रचार करने को निषिद्ध मानते हैं। वे कहते है :
3.26 कार्य में संलग्न अनजान लोगों द्वारा कार्य करते रहने की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान व्यक्ति को लोगों को उनके काम में ही लगाए रखना चाहिए, और कार्य में रत अनजात (मूर्ख) लोगों के विश्वास को नहीं तोड़ना चाहिए, वरन् स्वयं निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए उन्हें स्वयं सभी प्रकार के कार्यों में लगाए रखना चाहिए ..... पूर्ण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति इन अपूर्ण ज्ञान रखने वाले लोगों का विश्वास नहीं तोड़े।
हिन्दू समाज-व्यवस्था के विफल हो जाने पर भी कृष्ण नहीं चाहते कि लोग उससे सुधार लाने का कार्य करें। वे कहते हैं कि वे यह कार्य उन पर छोड़ दें। भगवत्गीता की निम्नांकित भर्त्सना से बात यह बिल्कुल स्पष्ट है :
कृष्ण के अनुसार :
4.7-8 हे! भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूं। मैं साधुओं की रक्षा तथा दुष्टों का नाश करने और धर्म की स्थापना के लिए अलग-अलग युगों में जन्म लेता हूं ।
हिंदू समाज-व्यवस्था की यह एकमात्र विशेषता नहीं है यह तो एक असाधारण विशेषता है प्राण-प्रतिष्ठा की समीक्षा से पता चलेगा कि ऐसे उदाहरण हैं कि समाज ने निर्जीव वस्तुओं की प्राण-प्रतिष्ठा की है और इसके अनुयायियों के दिमाग में यह धार्मिक विश्वास बिठाया है कि वे पवित्र हैं। ऐसे उदाहरण हैं जहां पत्थरों, नदियों, पेड़ों को देवी-देवता बना दिया गया है। ऐसे उदाहरण हैं, जहां समाज ने सजीव वस्तुओं की प्राण-प्रतिष्ठा की और समाज के लोगों के दिमाग में यह धार्मिक विश्वास बिठाया है कि वे पवित्र हैं। लेकिन ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि किसी विशिष्ट समाज-व्यवस्था की प्राण-प्रतिष्ठा की गई हो और उसे पवित्र बनाया गया हो। प्रारंभिक समाज की अपनी कुल देव - व्यवस्था थी। लेकिन कुल या जनजातीय व्यवस्था केवल समाज-व्यवस्था थी, धर्म द्वारा उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कभी नहीं की गई थी और न ही उसे कभी पवित्र तथा संशय रहित बनाया गया था। मिस्र फारस, रोम, यूनान जैसे संसार के पुराने देशों में से हरेक की अपनी समाज व्यवस्था थी जिसमें कुछ लोग स्वतंत्र होते थे तथा कुछ दास होते थे, कुछ नागरिक होते थे, कुछ संबद्ध होते थे, कुछ एक प्रजाति के ही थे, तथा कुछ दूसरी के पुनः यह वर्ग-व्यवस्था मात्र समाज-व्यवस्था होती थी और उसकी धर्म द्वारा कभी भी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की गई और न ही कभी उसे पवित्र और सनातन बनाया गया। आधुनिक युग में उसकी अपनी व्यवस्था है। कुछ में प्रजातंत्र है, कुछ में फासिस्ट है, कुछ नाजीवाद के हामी हैं तो कुछ में साम्यवाद है लेकिन यह व्यवस्था मात्र समाज व्यवस्था है इसकी धर्म द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की गई और न ही इसे पवित्र और संशय रहित बनाया गया।
समाज ने अपने व्यवसायों (जीविकोपार्जन के उपायों) की कहीं भी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की है। आर्थिक क्रियाकलाप हमेशा ही धार्मिक पवित्रता की परिधि से बाहर रहे हैं। शिकारी समाज बिना किसी धर्म के नहीं रहा लेकिन शिकार करने को एक व्यवसाय के रूप में कभी प्रतिष्ठा नहीं दी, और न ही पवित्र बनाया गया । कृषि को भी व्यवसाय के रूप में धर्म द्वारा प्रतिष्ठित नहीं किया गया, और न ही पवित्रता का जाम पहनाया गया। चरवाहा समाज कभी भी बिना धर्म के नहीं रहा । किन्तु चरागाह कभी भी प्राण-प्रतिष्ठत नहीं किया गया और पवित्र नहीं बनाया गया। कुलीन और सामंत वर्ग तथा दास समाज में थे, किन्तु यह मात्र सामाजिक व्यवस्था थी। यह धर्म बंधनों से भिन्न थी ।
हिंदू समाज में ही मानवीय संबंधों को धर्म का आवरण ओढ़ाकर अनुबंधनीय बना दिया गया है। हिंदूओं में कामगारों के परस्परिक संबंधों की भी सीमाएं बांध दी गई हैं। उन्हें कड़ियों और सनातन संशयहीनता के शिकंजे में कस दिया गया है।
अतः क्या यह कहना पर्याप्त नहीं है कि हिंदू ऐसे लोग हैं, जिनके धर्म की पवित्र संहिता है। ठीक ऐसे ही जरथूस्त, इजराइली, ईसाई तथा मुसलमान हैं। इन सबकी पवित्र संहिताएं हैं, से विश्वासों तथा संस्कारों को प्राण प्रतिष्ठित करते हैं तथा उन्हें पवित्र बनाते हैं लेकिन वे निर्धारित नहीं करते, न ही वे इंसान इंसान के बीच के संबंध को मूर्त रूप में प्राण प्रतिष्ठित करते हैं और उसे पवित्र तथा अखंड बनाते हैं। इस मामले में हिंदू अनोखे हैं। यही बात है जिसने हिंदू समाज व्यवस्था को समय के विप्लव और आक्रमण का सामना करने की दृढ़ शक्ति प्रदान की है।
कट्टर हिंदू यह स्वीकार करेगा कि हिंदू समाज - व्यवस्था का यह विशुद्ध विवरण है। केवल सुधारक ही तर्क-वितर्क कर सकता है। वह कहेगा कि अंग्रेजों के आने के बाद यह तो इतिहास की बात बन चुकी है। किसी को इस विचार से विचलित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ऐसा कहना प्रपंच है यह इस तथ्य को भूल जाते हैं कि जो संस्था संप्रदायों के रूप में लुप्त हो जाती है, यह आदतों के रूप में तो जीवित रहती ही है। कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि हिंदू समाज-व्यवस्था हिंदुओं की आदत बन गई है और यह पूरी तरह सजग है ऐसा होने के कारण यह जोरों पर है।