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हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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04 ऑगस्ट 2023
Book
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     हिंदू का जीवन आश्रमों में बंटा हुआ है। प्रथम आश्रम को ब्रह्मचार्य कहते है, जो विद्यार्थी काल होता है। दूसरे को गृहस्थाश्रम कहा जाता है, जिसे वैवाहिक अवस्था कहते हैं। तीसरे को वानप्रस्थ कहते हैं जो संसारिक जीवन से अनाशक्ति काल माना जाता है। चौथे काल को संन्यास कहा जाता है जो सांसरिक झंझटों से परी तरह मुक्त होने की अवस्था और लौकिक मृत्यु के बराबर होती है, सामान्य व्यक्ति को संन्यासी बनने का अधिकार नहीं है। समझना कठिन है कि ऐसा क्यों हैं? प्रत्यक्षतः महामानव के लाभार्थ यह रचना रची गई। शूद्र संन्यासी बनने के बाद महामानव की सेवा करना बंद कर देगा। शूद्र संन्यासी बनकर ईश्वर या ब्रह्मा के समीप पहुंच जाएगा जो कि महामानव के विशेषाधिकारों का अतिक्रमण होगा।

Hindu Social System Its Unique Features Hindutva Ka Darshan Book Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     मनुस्मृति से लिए गए उद्धरण यह सिद्ध करते हैं कि हिंदू समाज व्यवस्था स्पष्ट तौर पर महामानव के हितों को ध्यान में रखकर निर्धारित की गई है, इसमें हर चीज महामानव के लिए बनाई गई है। महामानव ब्राह्मण है और सामान्य जन शूद्र महामानव को अधिकार प्राप्त है, पर उसके कर्तव्य कुछ नहीं हैं। हर चीज महामानव की इच्छा पर निर्भर है। हर चीज उसी के हितों को ध्यान में रखकर निर्धारित की जानी होगी। इस विशेषता का विपरीत पक्ष आम आदमी का पतन है। महामानव की तुलना में सामान्य जन को स्वतंत्रता, संपत्ति या प्रसन्नता की आशा का कोई अधिकार नहीं है उसे महामानव के जीवन निर्वाह तथा मान मर्यादा के लिए हर चीज का परित्याग करने को तैयार रहना चाहिए। हिंदू समाज व्यवस्था के अनुसार ऐसा परित्याग सामान्य जन को स्वेच्छा से करना चाहिए। वास्तव में यह इस बात को मस्तिष्क में बैठा देती है। कि आम आदमी को अपना सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य समझकर महामानव के हित में परित्याग करने के लिए सदैव तैयार करना चाहिए।

     क्या इसमें कोई संदेह के कि जरथूस्त मनु के लिए नया नाम है और दस स्पेक जरथूस्त मनुस्मृति का नया संस्करण है ?

     यदि मनु तथा नीत्शे के बीच कोई अंतर है तो वह इस बात में निहित है कि तीत्शे मानव का नया वर्ग सृजित करने में वास्तविक अभिरुचि रखता था, जो मानव जाति की तुलना में महामानव की जाति हो। दूसरी ओर मनु की अभिरुचि उस वर्ग के विशेषाधिकार को बनाए रखने में थी जो वर्ग महामानव होने के अपने दावे को पुष्ट करने के लिए ही आया था। नीत्शे का महामानव अपनी योग्यता के कारण महामानव था। नीत्शे निष्पक्ष दार्शनिक था। दूसरी ओर मनु एक कर्मचारी था जिसे ऐसे दर्शन की स्थापना के लिए रखा गया था जो ऐसे वर्ग के हितों का पोषण करे जिस समूह में वह पैदा हुआ था और जिसका महामानव होने का हक उसके गुणहीन होने के बावजूद भी न छीना जाए। मनु की निम्नांकित उक्ति की तुलना करें।¹ :

     10.81 यदि कोई ब्राह्मण अपने कर्तव्यों के निर्वहन से निर्वाह करने में असमर्थ है तो क्षत्रिय का कर्म करते हुए जीवन निर्वाह करे क्योंकि वह उससे अगले वर्ण का है।

     10.82 दोनों (ब्राह्मण कर्म तथा क्षत्रिय कर्म) से जीवन निर्वाह नहीं कर सकता हुआ ब्राह्मण किस प्रकार रहे? ऐसा संदेह उपस्थित हो जाए, तो वैश्य के कर्म, खेती, गोपालन और व्यापार से जीविका करे ।

     9.317 ब्राह्मण चाहे मूर्ख हो या बुद्धिमान, वह महान पूज्य व्यक्ति होता है, ठीक वैसे ही जैसे अग्नि, चाहे वह शास्त्र विधि से स्थापित है अथवा सामान्य अग्नि है, पूज्य होती है।

     9.319 इस प्रकार ब्राह्मण सभी प्रकार के कोई (तुच्छ) कार्य भी करे, उन्हें हर हालत में सम्मान दिया जाना चाहिए, क्योंकि वह उत्तम देवता है।

     नीत्शे द्वारा मनुस्मृति की प्रशंसा ठीक नहीं है, क्योंकि जब वह कहता है कि उनकी योजनानुसार कुलीन वर्ग, दार्शनिक तथा योद्धा जनता-जनार्दन की रक्षा करते हैं तथा मार्गदर्शन प्रदान करते हैं तो उसने इसे ठीक नहीं पढ़ा या वह गलतबयानी कर रहा है। मनुस्मृति के अनुसार महामानव का सामान्य जन पर आधिपत्य होता है, पर उसका सामान्य जन के प्रति कोई कर्तव्य नहीं होता।

     नीत्शे के महामानव के दर्शन की तुलना में मनु के महामानव का पतित दर्शन कहीं अधिक घृणित और कुत्सित है ऐसी है उसकी समाज-व्यवस्था, जिसे हिंदू अमूल्य मानते हैं, और जिस पर श्री गांधी को गर्व है तथा जिसे वह हिंदुओं की ओर से विश्व को उपहार स्वरूप देना चाहते हैं।

     हिंदू समाज व्यवस्था की दूसरी विशिष्टता उसके संरक्षण की तरकीब से संबंधित है। इसके दो रूप हैं।


1. ब्राह्मण का सही विवरण सर्वोत्तम महामानव होग, क्योंकि उससे नीचे सामान्य जन से ऊपर क्षत्रिय तथा वैश्य होते हैं, न कि महामानव, अतः नाम परिवर्तन करना आवश्यक नहीं होगा।


     पहली तरकीब तो यह है कि समाज व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी राजा की है। मनु का इस संबंध में स्पष्ट मत है :

     8.410 राजा प्रत्येक वैश्व को व्यापार अथवा पैसा उधार देने की अथवा खेती करने की अथवा पशु-पालन की और शूद्र व्यक्ति को द्विज की सेवा करने की आज्ञा दे।

     8.418 पूर्ण रूप से जाग्रत तथा सचेत होकर राजा आदेश दे कि वैश्यों तथा शूद्र अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करें, क्योंकि जब ये लोग अपने कर्तव्यों का पालन करना छोड़ देते हैं, तब सारा संसार भ्रम में पड़ जाता है।

     मनु इस संबंध में राजा के मात्र कर्तव्य निरूपण तक ही सीमित नहीं रहता। वह यह सुनिश्चित करना चाहता है कि स्थापित व्यवस्था को राजा हर समय सुरक्षित बनाए रखने के अपने कर्तव्य का निर्वहन करे । अतः आगे मनु दो उपबंधों की व्यवस्था कर देता है, पहला उपबंध तो यह है कि राजा द्वारा स्थापित व्यवस्था को बनाए रखने में विफल रहने पर इसे अपराध माना जाए जिसके लिए राजा पर अभियोग चलाया जाए तथा सामान्य घोर अपराधी की तरह उसे दंड दिया जाए। मनुस्मृति से लिए गए निम्नलिखित उद्धरण से यह स्पष्ट है

     8.335 यदि पिता, शिक्षक, मित्र, माता, पत्नी, पुत्र, घरेलू पुरोहित अपने-अपने कर्तव्य का दृढ़ता व सच्चाई के साथ निष्पादित नहीं करते हैं तो इनमें से किसी को भी राजा द्वारा बिना दंड के नहीं छोड़ा जाना चाहिए ।

     8.336 जिस अपराध में साधारण व्यक्ति एक पण से दंडनीय है, उसी अपराध से लिए राजा सहस्र पण से दंडनीय है, ऐसा शास्त्र का निर्णय है। उसे यह दंड - राशि पुरोहित को या नदी को भेंट करनी चाहिए ।

     स्थापित व्यवस्था के प्रति लापरवाह या उसका विरोध करने वाले राजा के लिए मनु द्वारा किया गया दूसरा प्रावधान यह है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य राजा के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह कर सकते हैं।

     8.348 यदि किसी द्विजातियों के कर्तव्य को बलपूर्वक बाधित किया जाता है या उन पर विपत्ति आती है या उनके दुर्दिन आते हैं तो वे शस्त्र उठा सकते हैं।

     स्वाभाविक है, क्योंकि ऊपर वाले ये तीन उच्च वर्णों ही है; जिन्हें इस पद्धति को बनाए रखने में लाभ है। लेमिन मान लिया जाए? इस संदर्भ में मनु ब्राह्मणों को यह अधिकार देता है कि वे सभी को, विशेषकर क्षत्रियों को दंड दें।

     11.31 नियमों को अच्छी तरह जानने वाले ब्राह्मण को किसी दुखदायी आघात की स्थिति में राजा से शिकायत करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह अपनी शक्ति द्वारा ही उस व्यक्ति को दंड दे सकता है, जो उसे आघात पहुंचाता है।

     11.32 उसकी निजी शक्ति जो केवल उसी पर निर्भर करती है, राजकीय शक्ति से प्रबल होती है जो कि दूसरे व्यक्तियों पर निर्भर हैं। अतः ब्राह्मण अपनी शक्ति के द्वारा ही अपने शत्रुओं का दमन कर सकता है।

     11.33 ब्राह्मण अपने वेद के आंगिरस श्रुति को बिना विचारे ही प्रयोग कर सकता है क्योंकि ब्राह्मण का वचन ही शास्त्र है, अतएव उससे ब्राह्मण शत्रुनाश करें।

     9.320 यदि कोई क्षत्रिय ब्राह्मण के विरुद्ध सभी अवसरों पर हिंसक ढंग से शस्त्र उठाता है, तो उसे स्वयं वह ब्राह्मण ही दंड देगा, क्योंकि क्षत्रिय मूल रूप से ब्राह्मण से ही पैदा हुआ है।