हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
मनु कहता है :
8.379 पुरोहित वर्ग के व्याभिचारी को प्राण दंड देने के बजाय उसका अपकीर्ति कर मुंडन करा देना चाहिए तथा इसी अपराध के लिए अन्य वर्गों को मृत्यु दंड तक दिया जाए।
11.127 बिना द्वेष-भाव के यदि ब्राह्मण किसी सदाचारी क्षत्रिय की हत्या कर देता है, तो उसे उसके सभी धार्मिक संस्कारों को रोकने के बाद पुरोहित को एक बैल और एक हजार गाय देनी चाहिए ।
11.128 अर्थात् संयमी और जटाधारी होकर ग्राम से अधिक दूर पेड़ के नीचे निवास करता हुआ तीन वर्ष तक ब्रह्मा की हत्या के प्रायश्चित को करे । 11.129 सदाचारी वैश्य का बिना कारण वध करने वाला ब्राह्मण इसी प्रायश्चित को एक साल तक करे अथवा एक बैल के साथ सौ गायों को पुरोहित को दे ।
11.130 बिना इरादे के शूद्र का वध करने वाला ब्राह्मण छह मास तक इसी व्रत को करे अथवा एक बैल और दस सफेद गाय पुरोहित को दे।
8.381 ब्राह्मण वध के समान पृथ्वी पर दूसरा कोई बड़ा पाप नहीं है, अतएव राजा मन से भी ब्राह्मण के वध करने का विचार न करे।
8. 126 एक ही प्रकार के बार-बार होने वाले अपराधों पर विचार करते हुए और उसका स्थान तथा समय निश्चित करते हुए अपराधी को दंड देने की अथवा सजा भुगतने की पात्रता को देखते हुए राजा को केवल उन लोगों को ही सजा देनी चाहिए जो उसके लिए पात्र हैं।
8. 124 ब्रह्मा के पुत्र मन ने तीन कनिष्ठ वर्णों के विषय दंड के दस स्थानों को कहा है और ब्राह्मण को पीड़ारहित अर्थात् बिना किसी प्रकार दंडित किए केवल राज्य से निकाल दिया जाता है।
मनुस्मृति ब्राह्मण को अन्य विशेषाधिकार भी देती है। जहां तक शादी का प्रश्न है, वह अपने ही वर्ग की महिला के साथ शादी करने के अतिरिक्त अपने से भिन्न किसी भी वर्ग की महिला के साथ विवाह संबंध स्थापित कर सकता है¹ लेकिन वह उसके साथ शादी करने या उसके बच्चों को अपना पद या अपनी संपत्ति का कोई अधिकार देने के लिए बाध्य नहीं होगा । उसे अपने साथ ज्यादती करने वाले को दंड देने का अधिकार होगा और दंडित व्यक्ति न्यायालय की शरण नहीं ले सकेगा।² यदि उसके धार्मिक कर्तव्यों के निष्पादन के लिए आवश्यक हुआ तो वह किसी सामान्य जन (जैसे शूद्र) की संपत्ति पर अधिकार जमा सकता है और उसके लिए न तो वह उसे क्षतिपूर्ति करेगा और न ही उससे पीड़ित न्यायालय की शरण ले सकेगा।³ यदि वह छिपे हुए खजाने को ढूंढ लेता है तो वह उसे पूरा ही अपने अधिकार में ले लेगा⁴ और राजा को उसका सामान्य हिस्सा भी नहीं देगा, क्योंकि वह सबका मालिक है तथा दूसरे के द्वारा खोजे जाने पर वह उसका आधा भाग ले लेगा। वह किसी असाध्य रोग से मृत्यु को प्राप्त हुए राजा द्वारा वैधानिक जुर्माने से एकत्रित की गई संपूर्ण राशि का हकदार है। वह कराधान से परे है वह राजा को इस बात के लिए बाध्य कर सकता है कि वह उसे रोजाना भोजन उपलब्ध कराए और राजा यह देखे कि वह भूखा न मरे। उसकी संपत्ति राज्याधिकार में लिए जाने वाले कानून से मुक्त है।
हिंदू समाज-व्यवस्था का महामानव संकट के दौर में व्यवसाय के मामले में किसी भी नियम में आबद्ध नहीं है, मनु कहता है :
10.81 ब्राह्मण यदि अपने कर्म से जीवन निर्वाह नहीं कर सके, तो क्षत्रिय का कर्म करता हुआ जीवन निर्वाह करे, क्योंकि क्षत्रिय कर्म उसका समीपवर्ती है।
10.82 दोनों (ब्राह्मण कर्म तथा क्षत्रिय कर्म) से जीवन निर्वाह नहीं कर सकता हुआ ब्राह्मण किस प्रकार रहे? ऐसा संदेह उपस्थित हो जाए तो वैश्य के कर्म, खेती, गो-पालन और व्यापार से जीविका करे ।
10.83 वैश्यावृत्ति से जीविका करता हुआ भी ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय हिंसा प्रधान पराधीन कृषि कर्म प्रत्यनपूर्वक छोड़ दे।
10.84 कुछ लोक कृषि को उत्तम कर्म मानते हैं किन्तु वह जीविका सज्जनों से निंदित है, क्योंकि लोहे के मुख वाला काष्ठ अर्थात् हल भूमि तथा भूमि में स्थित जीवों को मार डालता है।
1. मनुस्मृति 3.12.13 यह विशेषाधिकार भारत में न्यायालयों द्वारा मान्यता प्राप्त है।
2. मनुस्मृति 11.31 यह विशेषाधिकार को समाप्त कर दिया गया है।
3. मनुस्मृति 11.32 यह विशेषाधिकार को समाप्त कर दिया गया है।
4. मनुस्मृति 11.37 यह विशेषाधिकार अब नहीं है।
5. मनुस्मृति 8.38.
6. मनुस्मृति 9.323.
7. मनुस्मृति 7.133.
8. मनुस्मृति 7.134.
9. मनुस्मृति 9.189
10.85 जीविका के अभाव से धर्म की निष्ठा को छोड़ते हुए ब्राह्मण तथा क्षत्रिय को कुछ त्याज्य वस्तुओं को छोड़कर वैश्यों द्वारा बेची जाने वाली धनवर्द्धक शेष वस्तुओं को बेचना चाहिए।
10.102 आपत्ति में पड़ा हुआ ब्राह्मण सबसे दान ग्रहण करे, क्योंकि आपत्ति में पड़ा हुआ पवित्र दूषित होता है, यह शास्त्र संगत नहीं होता है।
10.103 निंदितों को अध्यापन कराने से यज्ञ कराने से और उनका दिया हुआ दान लेने से ब्राह्मणों को दोष नहीं होता, क्योंकि वे अग्नि तथा पानी के समान पवित्र है।
महामानव के विशेषाधिकारों के बावजूद उनकी सामान्यजन के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है। वास्तव में महामानव की सामान्यजन के प्रति कोई जवाबदेही नहीं ।
वह सामान्य जन के उत्थान के लिए दान करने हेतु बाध्य नहीं है। दूसरी ओर दान स्वीकार करना महामानव का एकाधिकार है। किसी और व्यक्ति द्वारा दान लिया जाना पाप है। सामान्य जन (शूद्र) जो महामानव की सेवा के लिए ही पैदा होता है, सेवक के प्रति उसमें सद्भाव होना आवश्यक नहीं। वह उसे अच्छा भोजन, अच्छे कपड़े तथा अच्छा निवास स्थान देने के लिए बाध्य नहीं है, इस संबंध में मनु द्वारा निर्धारित उसके कर्तव्य निम्नांकित है :
10.124 शूद्र की क्षमता, उसका कार्य तथा उसके परिवार में उस पर निर्भर लोगों की संख्या को ध्यान में रखते हुए वे लोग उसे अपनी पारिवारिक संपत्ति से उचित वेतन दें।
10.125 शूद्र को जूठा भोजन, पुराने वस्त्र, अन्न का पुआल तथा पुराने बर्तन आदि देने चाहिए।
सामान्य जन की उन्नति महामानव की श्रेष्ठता के विरुद्ध है। महामानव को प्रसन्न, संतुष्ट तथा सुरक्षित व निर्भय रखने की दृष्टि से हिंदू समाज व्यवस्था व्यक्ति को निरंतर पतन की स्थिति में रखने के लिए विशेष ध्यान देती है।
मनु इस बात पर जोर देता है कि शूद्र को सेवा के सिवाय और कुछ नहीं करना चाहिएः 10.122 यह ब्राह्मण की सेवा करे।
10.122 ब्राह्मण की सेवा द्वारा जीवन निर्वाह नहीं होने से जीविका को चाहने वाला शूद्र क्षत्रिय अथवा धनिक वैश्य की सेवा करता हुआ जीवन - निर्वाह करे |
1.91 ब्रह्मा ने शूद्र के लिए जो एक सबसे प्रमुख कार्य सौंपा है, वह है बिना किसी उपेक्षा भाव के उक्त तीनों वर्णों की सेवा करना ।
10.129 शूद्र धन संचय करने की स्थिति में हो, फिर भी ऐसा न करे क्योंकि जो शूद्र धन संचय करता है, वह ब्राह्मण को देख पहुंचाता है।
सामान्य जन को विद्यार्जन की अनुमति नहीं है इस संबंध में मनु के निम्नांकित निर्देश हैं :
1.88 वेदों का अध्ययन करने तथा वेदों की शिक्षा देने का कार्य सृष्टिा ने ब्राह्मणों को सौंपा है।
1.89 क्षत्रियों को उसने (सृष्टा) ने आदेश दिया है कि वे वेदों का अध्ययन करें।
2.116 जो गुरु की आज्ञा के बिना ही वेदों का ज्ञान ग्रहण करता है वह ब्रह्म की चोरी करने का दोषी होकर नकरगामी होता है।
4.99 द्विज शूद्र की उपस्थिति में वेद का अध्ययन न करे।
9.18 स्त्रियों का वेदों के श्लोकों से कोई सरोकार नहीं है।
11.198 यदि किसी द्विज ने (अनुचित रूप से) वेदों का रहस्योद्घाटन किया है (अर्थात् शूद्रों तथा स्त्रियों को ) तो वह (पाप करता है) एक वर्ष जौ का आहार करके अपने पाप का प्रायश्चित करता है।
इन उदाहरणों में तीन विशेष प्रस्ताव दिए गए है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भी वेदाध्ययन कर सकते हैं। इनमें से भी केवल ब्राह्मण को ही वेदों के अध्यापन अधिकार है लेकिन शूद्र को तो न केवल वेदों का अध्ययन करने की मनाही हे वरन् उसे तो उन्हें किसी के द्वारा पढ़े जाने पर सुनने की भी अनुमति नहीं दी गई ।
मनु के उत्तराधिकारियों ने शूद्र द्वारा वेदाध्ययन करने के लिए उसे कठोर दंड वाले अपराध की श्रेणी में रखा। उदाहरण के लिए ऋषि गौतम कहता है :
3.4 यदि शूद्र इरादतन याद करने के उद्देश्य से वेद सुनता है तो उसके कानों में पिछला हुआ लाख और जस्ता भर देना चाहिए, यदि वह वेद का उच्चारण करता है तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए और यदि वह वेद पर अधिकार प्राप्त कर लेता है तो उसके शरीर के टुकड़े कर देना चाहिएं। कात्यायन के भी यही विचार हैं:
सामान्य जन (शूद्र) को दीक्षा संस्कार की भी अनुमति नहीं है दूसरे जन्म में ही व्यक्ति विशेष का नैतिक तथा भौतिक उन्नयन संभव हो पाता है। सामान्य जन को तो गरिमापूर्ण नाम रखने का भी अधिकार नहीं है।
मनु के अनुसार :
2.30 पिता को बच्चे के जन्म के बाद दसवें अथवा बारहवें दिन अथवा शुभ ग्रह के अवसर पर अथवा शुभ मुहुर्त पर अथवा शुभ तिथि पर नामध्येय ( बच्चे का नामकरण संस्कार) करना चाहिए।
1.31 ब्राह्मण के नाम का पहला भाग शुभ सूचक होना चाहिए, क्षत्रिय के नाम का शक्ति के साथ संबंध हो और वैश्य का संपत्ति के साथ, परंतु शूद्र के नाम का पहला भाग कोई ऐसा हो जो घृणा व्यक्त करे ।
2.32 ब्राह्मण के नाम का दूसरा भाग ऐसा शब्द हो जो प्रसन्नता व्यक्त करे, क्षत्रिय का नाम रक्षा व्यक्त करे, वैश्य का समृद्धि और शूद्र का सेवा व्यक्त करे।
महामानव शूद्र के श्रेष्ठ नाम को सहन नहीं कर सकेगा। वह वास्तविकता तथा नाम दोनों दृष्टियों से निंदनीय होगा ।