हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
हिंदू तथा गैर हिंदू अपराध न्याय - शास्त्र में कितना विचित्र अंतर है। हिंदूत्व में कितनी असमानता है, यह उसके अपराध न्याय - शास्त्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। न्याय की भावना से युक्त दंड संहिता में हमें दो चीजें देखने को मिलती हैं- एक वह वर्ग जो अपराध को परिभाषित करने का कार्य करता है तथा दूसरा वह वर्ग जो अपराध करने के लिए दंड के न्यायोचित स्वरूप का निर्धारण और नियमों का निर्धारण करता है। कि अपराध करने वाले सभी लोग समान दंड के अधिकारी हैं। लेकिन मनु में हम क्या पाते है? पहले तो दंड की प्रणाली न्यायोचित नहीं है। किसी अपराध का दंड संबंधित उद्गम अंग को दिया जाता है, जैसे पेट, जीभ, नाक, आंख, कान, जनद्रिय आदि, मानों कि अपराध करने वाले अंग की कोई अलग इच्छा हो और जो मानव की अतिजीवी सत्ता नहीं हैं। मनु की दंड संहिता की दूसरी विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत दंड की प्रकृति अमानवीय है, जो अपराध की गंभीरता से मेल नहीं खाती है। लेकिन उसकी सबसे अधिक विस्मयकारी विशेषता उस समय अपने विकराल रूप में दिखाई देती है, जब एक ही अपराध के लिए असमान दंड दिया जाता है। यह असमानता न केवल अपराधकर्ता को दंडित करने के लिए बनाई गई है, बल्कि मर्यादा की रक्षा करने और न्याय पाने के लिए न्यायालय में आने वाले पक्षों की अधीनता को बनाए रखने के लिए बनाई गई है, दूसरे शब्दों में, यह सामाजिक असमानता को बनाए रखने के लिए बनाई गई है। जिस पर उनकी पूरी योजना आधारित है।
क्रमिक असमानता का यह सिद्धांत आर्थिक क्षेत्र में भी घुसा बैठा है। हिंदू समाज-व्यवस्था का सिद्धांत यह नहीं है कि 'किसी की हैसियत के अनुसार लो और आवश्यकतानुसार दो'। हिंदू समाज व्यवस्था का सिद्धांत है, आवश्यकतानुसार लो और श्रेष्ठता के अनुसार दो। मानो कि कोई अधिकारी अकाल से पीड़ित लोगों को अनुदान बांट रहा हो, तो वह निम्न वर्ग के कामों की तुलना में उच्च वर्ग के लोगों को अधिक अनुदान देने के लिए बाधय होगा।¹ इसी तरह मानो कोई अधिकारी कर लगा रहा हो तो वह उच्च वर्ग के व्यक्ति पर कम कर लगाएगा और निम्न वर्ग के व्यक्ति पर अधिक कर लगाएगा। हिंदू समाज व्यवस्था समान आवश्यकता, समान कार्य, या समान योग्यता पर समान पारिश्रमिकता को मान्यता प्रदान नहीं करती। जीवन में अच्छी चीजों के वितरण के संबंध में इसका एकमात्र लक्ष्य यह है कि जिन लोगों को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, उन्हें सबसे अधिक और सबसे अधिक मिलना चाहिए और जो लोग निम्न वर्ग के अंतर्गत आते हैं उन्हें निम्नतम तथा निकृष्टतम पर ही संतोष कर लेना चाहिए।
1. उक्त उदाहरण मात्र कल्पना पर आधारित नहीं है, इतिहास पर आधारित तथ्य है। ऊंच तथा नीच के अंतर के पेशवा के समय में कानून द्वारा मान्यता प्रदान की गई। अनुदान के बाद में जो अंतर है, वह आज भी बंबई प्रेसिडेंसी में देखने को मिलता है और एक कांग्रेसी मंत्री द्वारा इसका पक्ष लिया गया। यह सब आज प्रयोग में नहीं है संपादक
यह सिद्ध करने के लिए और कुछ आवश्यक प्रतीत नहीं होता हो कि हिंदू समाज व्यवस्था वर्गीकृत असमानता के सिद्धांत पर आधारित है। यह सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों में व्यापक है। सामाजिक जीवन का प्रत्येक पक्ष समानता के खतरे के प्रति सचेत है।
हिंदू समाज व्यवस्था का दूसरा सिद्धांत जिस पर हिंदू समाज व्यवसायी आधारित है, वह प्रत्येक वर्ग के लिए व्यवसाय का निर्धारण और वंशानुक्रम के आधार पर उसके जारी रहने का सिद्धांत हैं मनु चारों वर्णों के व्यवसायों के बारे में ऐसा कहता है रु
1.87 इस ब्रह्मांड की रक्षा करने हेतु, ईश्वर ने अपने मुंह, अपनी भुजा, अपनी जंघा तथा अपने पैरों से पैदा हुए लोगों के लिए अलग-अलग व्यवसाय (कर्म) निर्धारित किए।
1.88 ब्राह्मणों के लिए उसने पढ़ना और पढ़ाना (वेद), अपने तथा दूसरों के लाभ के लिए यज्ञ कराना और करना, दान देना और लेना, कर्म निर्धारित किए हैं।
1.89 लोगों की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, अध्ययन (वेद) करना, विषय में अशक्ति नहीं रखना, कर्मों का आदेश उसने क्षत्रिय के लिए दिया है।
1.90 वैश्यों के लिए पशुओं को पालना, दान देना, यज्ञ करना, धार्मिक ग्रंथों को पढ़ना, व्यापार करना, ब्याज पर पैसा उधार देना, खेती करना जैसे कार्य निर्धारित किए गए हैं या उन्हें करने की अनुमति दी गई है।
1.91 ब्रह्मा ने शूद के लिए जो एक सबसे प्रमुख कार्य सौंपा है, वह है बिना किसी उपेक्षाभाव के उक्त तीनों वर्गों की सेवा करना ।
10.74 ऐसे ब्राह्मण जो उत्कृष्ट देवत्व प्राप्त करने के इच्छुक हैं और अपने कर्तव्य के प्रति दृढ़ है, वे छह कार्यों को क्रमानुसार पूर्णरूपेण निष्पादित करें।
10.75 वेदों का अध्ययन करना, दूसरों को वेदों का अध्ययन कराना, दूसरों को यज्ञ करने में सहायता करना, अपने पास प्रचुर संपत्ति होने पर गरीबों को दान देना, स्वयं के गरीब होने पर सदाचारी लोगों से दान स्वीकार करना ये अग्रज वर्ग के छह निधारित कार्य हैं।
120.76 ब्राह्मण के इन छह कार्यों में से ये तीन कार्य उसकी जीविका से संबधित हैं, यज्ञ करने में सहायता कराना, वेदों का अध्यापन तथा सदाचारी व्यक्ति से दान प्राप्त करना ।
10.77 ये तीन कार्य ब्राह्मण के लिए सुरक्षित हैं, और उन्हें क्षत्रिय नहीं कर सकता, वेदों का अध्यापन, यज्ञ कराना तथा तीसरा, दान स्वीकार करना ।
10.78 ये उपरोक्त तीनों कार्य (निर्धारित कानून के अनुसार ) वैश्य के लिए निषिद्ध हैं, क्योंकि लोकाधिपति मनु ने क्षत्रिय और वैश्य, दोनों वर्गों के लिए इन कार्यों को निर्धारित नहीं किया है।
10.79 क्षत्रिय की जीविका के साधन हैं, जैसे शस्त्र धारण करना, या तो हमला करने के लिए या हाथ से चलाने वाले शस्त्र वैश्य के लिए व्यापार, पशु पालन तथा कृषि; लेकिन अपने अग्रिम जीवन को सफल बनाने के लिए भिक्षा देना, अध्ययन करना तथा यज्ञ कराना दोनों के कर्म हैं।
प्रत्येक सदस्य उस वर्ण-विशेष के लिए निर्धारित व्यापार को ही करेगा, जिस वर्ण का वह है। इसमें व्यक्तिगत चयन, व्यक्तिगत रूझान का कोई स्थान नहीं है। हिंदू समाज-व्यवस्था से बंधा हुआ है। यह एक ऐसा कठोर नियम है कि इससे बचा नहीं जा सकता।
यह सिद्धांत व्यवसाय के निर्धारण तक ही सीमित नहीं रह जाता। यह कई व्यवसायों को उनके सम्मान की दृष्टि से श्रेणीद्ध भी करता है। मनु कहता है :
10.80 जीविकोपार्जन के लिए अनेक व्यवसायों में से ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों के लिए सबसे अधिक प्रशंसनीय व्यवसाय क्रमशः वेदों को पढ़ना व पढ़ाना लोगों की रक्षा करना तथा व्यापार करना है।
हिंदू समाज-व्यवस्था का तीसरा सिद्धांत जिस पर हिंदू समाज - व्यवस्था आधारित है, वह लोगों को उनके संबंधित वर्णों के खूंटे से बांधना है। यह कोई विचित्र बात नहीं है, कि हिंदू समाज-व्यवस्था वर्णों को स्वीकारती है। हर जगह वर्ग हैं और कोई भी समाज वर्गहीन समाज नहीं है। परिवार, दल क्लब, राजनीतिक दल, आपराधिक षड्यंत्रों में संलग्न अवैध गिरोह, लोगों को लूटने वाले व्यावसायिक निगम संसार के सभी भागों में तथा सभी समाजों में पाए जाते हैं। स्वतंत्र व्यवस्था भी वर्गों से छुटकारा नहीं पा सकती। स्वतंत्र समाज व्यवस्था का उद्देश्य व लक्ष्य पृथक्करण व अलगाव को रोकना होता है। जो वर्गों द्वारा अनुकरण करने के लिए एक आदर्श स्थिति मानी जाती है। चूंकि जो वर्ग पृथक्करण और अलगाव नहीं अपनाते हैं, वे एक दूसरे के प्रति अपने अपने संबंधों में असामाजिक माने जाते हैं। पृथक्करण और अलगाव उन्हें एक दूसरे के प्रति असामाजिक तथा विरोधी बना देते हैं। पृथक्करण से वर्ग-चेतना के संबंध में कठोरता आ जाती है, सामाजिक जीवन लाभबंद हो जाता है और स्वार्थी तत्व आदर्शवादी तत्वों पर छा जाते हैं। पृथक्करण से जीवन गतिहीन हो जाता है, विशेषाधिकार- युक्त और गैर- विशेषाधिकार युक्त मालिक तथा नौकर के बीच अलगाव बना रहता है।
किसी समाज में वर्गों का होना स्वतंत्र समाज व्यवस्था के लिए उतना प्रतिकूल नहीं है, जितना कि पृथक्करण और अलगाव की भावना । स्वतंत्र समाज-व्यवस्था के अंतर्गत समाज में समरसता की धारा प्रवाहित रहती है। यह केवल तभी संभव है, जब वर्गों को सामान्य हितों, उत्तरदायित्वों में भागीदारी करने का अवसर मिले और सामान्य रूप से जीवन मूल्यों का अधिकार मिले, यदि चारों ओर स्वतंत्र व्यवस्था हो जाए जिसके अंतर्गत लेन-देन के समान अवसर उपलब्ध हों, तो ऐसे समाज संबंधों से रीति रिवाज, मानसिक दृष्टिकोण सजग तथा व्यापक होता है और इसके लिए काल ही नहीं, विचारों की गतिशीलता की आवश्यकता है। हिंदू समाज व्यवस्था के बारे में जो चीज ध्यान आकर्षित करती है, वह हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों के बीच आंतरिक विवाद पर प्रतिबंध रोक है इसके अंतर्गत दूसरी जाति के साथ भोजन करने और अंतर्जातीय विवाह पर प्रतिबंध है। लेकिन मनु तो सामान्य सामाजिक संसर्ग तक का निषेध करता है। मनु के अनुसार :
4.244 वंश को उन्नत करने की इच्छा करने वाला सर्वदा बड़ों के साथ संबंध करे और अपने से नीचों को छोड़ दे।
4.245 बड़ों के साथ संबंध करता हुआ और नीचों का त्याग करता हुआ ब्राह्मण श्रेष्ठता को पाता है। इसके विरुद्ध आचरण करता हुआ शूद्रता को पाता है।
4.79 उसे बड़े अपराधों के लिए जाति से निष्कासित पतित व्यक्ति, चांडाल, पुल्कस, मूर्ख धन के कारण अभिमानी, अंतयज और अन्त्यावसायी के साथ एक ही वृक्ष की छांव में नहीं बैठना चाहिए।
हिंदू समाज-व्यवस्था भाईचारे के खिलाफ है इसमें समानता के सिद्धांत को कोई स्थान नहीं है। समानता को मान्यता प्रदान करने के बजाय यह असमानता को अपना अधिकारिक सिद्धांत बनाती है। स्वतंत्रता के बारे में स्थिति यह है कि व्यवसाय के चयन के बारे में कोई स्वतंत्रता नहीं है। प्रत्येक का उसके लिए निर्धारित अपना व्यवसाय है। उसे तो बस वही करते रहना है। जहां तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है, यह स्वतंत्रता है, लेकिन यह केवल उन्हीं लोगों के लिए है, जो समाज - व्यवस्था के पक्षधर हैं। ऐसी स्वतंत्रता नहीं है जिसके बारे में वाल्टेयर ने कहा था, आप जो कुछ भी कहते हैं मैं उसे पूरी तरह से अस्वीकृत करता हूं और मैं मरते दम तक ऐसा कहने के इस अधिकार की रक्षा करूंगा। यह उस समय स्पष्ट हो जाता है, जब मनु तर्क - शास्त्र तथा न्याय के बारे में कहता है :
4.29-30 जिस गृहस्थ के घर में शक्ति के अनुसार, आसन, भोजन, शैया जल और कंद मूल से अतिथि का सम्मान नहीं होता, उसमें कोई अतिथि निवास न करे।
उसे विधर्मी, वे व्यक्ति जो निषिद्ध व्यवसाय करते हैं, वे लोग जो बिल्लियों, दुष्टों, तर्क - शस्त्रियों (वेदों के खिलाफ बहस करने वाले) और वक की तरह रहते हैं, ऐसे लोगों द्वारा किए जाने वाले सम्मान को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
2.10 वेद को श्रुति और धर्म शास्त्र को स्मृति जानना चाहिए, वे सभी विषयों में तर्क के योग्य नहीं हैं, क्योंकि उन दोनों में ही धर्म का प्रादुर्भाव होता है। 2.11 प्रत्येक द्विज, जो न्यायविदों पर निर्भर करता है, और तर्क - शास्त्र तथा उपचार इन दोनों श्रोतो ( कानून के) को घृणा की दृष्टि से देखता है, वेद-निदंक वह मनुष्य सज्जनों द्वारा बहिष्कृत करने योग्य है।
2.12 वेद, पवित्र स्मृति, आचार और मन की प्रसन्नता - ये चार धर्म के साक्षात लक्षण हैं।
इसका कारण उस समय स्पष्ट हो जाता है, जब मनु कहता है :
2.6 सब वेद, उनको जाननने वालों की स्मृति और ब्राह्मणत्व, महात्माओं का आचरण और अपने मन की प्रसन्न्ता - ये सब धर्म के मूल हैं।
2.7 मनु ने जिस किसी का जो धर्म कहा है, वह धर्म वेदों में कहा गया है । मनु सब वेदों के अर्थों के ज्ञाता हैं।
इस स्वतंत्रता में न्यायविदों के लिए कोई स्वतंत्रता नहीं है, तर्कशास्त्रियों के लिए समाज-व्यवस्था की समालोचन की भी स्वतंत्रता नहीं है, जिसका तात्पर्य यह है कि कहीं भी कोई स्वतंत्रता नहीं है।
कार्य करने की स्वतंत्रता की स्थिति कैसी है? कार्य चयन के मामले में हिंदू समाज-व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है। हिंदू समाज - व्यवस्था व्यक्ति को कोई अधिकार नहीं देती है उसके व्यवसाय को स्वयं निर्धारित करती है यह उसकी हैसियत भी निर्धारित करती है। व्यक्ति विशेष को तो विधान का पालन ही करना होता है।
ठीक यही बात राजनीतिक स्वतंत्रता के बारे में कहीं जा सकती है। हिंदू समाज-व्यवस्था में लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से बनी प्रतिनिधि सरकार की आवश्यकता को कोई मान्यता नहीं दी जाती। प्रतिनिधिा सरकार इस सिद्धांत पर आधारित होती है कि लोगों पर कानून का राज्य हो और कानून लोगों के प्रतिनिधियों द्वारा ही बनाया जा सकता है। समाज व्यवस्था में इस प्रतिपाद्य विषय के प्रथम भाग को ही मान्यता प्रदान की है, जिसके अनुसार लोगों के ऊपर कानून का राज्य होगा। लेकिन यह इस प्रतिपाद्य विषय के दूसरे भाग की उपेक्षा करती है, जिसके अनुसार नियम (कानून) लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा ही बनाए जा सकते हैं। हिंदू समाज-व्यवस्था का सिद्धांत यह है कि जिस कानून के द्वारा लोग शासित होते हैं, वह कानून पहले से ही बना हुआ है और वह वेदों में उपलब्ध है। किसी को भी इस कानून में संशोधन का अधिकार नहीं है। ऐसा होने के कारण लोगों द्वारा चुनी गई प्रतिनिधि सभा अनावश्यक हो जाती है। राजनीतिक स्वतंत्रता वह स्वतंत्रता होती है, जिसमें कानून बनाने की स्वतंत्रता होती है और सरकार को बनाने या बदलने का कोई तात्पर्य नहीं है जिसके लिए हिंदू समाज - व्यवस्था में स्थान ही नहीं है।
संक्षेप में, हिंदू समाज-व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है, जो वर्णों पर आधारित है, न कि व्यक्तियों पर। यह वह व्यवस्था है, जिसमें वर्णों को एक-दूसरे के ऊपर श्रेणीबद्ध किया गया है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें वर्णों की प्रतिष्ठा तथा कार्यनिर्धारण निश्चित है। हिंदू समाज व्यवस्था एक कठोर सामाजिक प्रणाली है। इस बात से उसे कोई लेना-देना नहीं कि किसी व्यक्ति के पद और प्रतिष्ठा में अपेक्षाकृत परिवर्तन हो, लेकिन वह जिस वर्ण में पैदा हुआ है, उस वर्ण के सदस्य के रूप में उसकी सामाजिक स्थिति दूसरे वर्ण के दूसरे व्यक्ति के संदर्भ में किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होगी। उच्च वर्ण में जन्में और निम्न वर्ण में जन्में व्यक्ति की नियति उसका जन्मजात वर्ण ही है।