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हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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04 ऑगस्ट 2023
Book
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III

     यदि हिंदू समाज व्यवस्था समानता तथा भाई-चारे पर आधारित नहीं है, तो वह कौन से सिद्धांतों पर टिकी हुई है ? इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर है। कुछ ही लोग यह समझने में समर्थ होंगे कि वे क्या हैं, लेकिन उनकी प्रकृति और हिंदू समाज पर उनके प्रभाव के बारे में कोई संशय नहीं है। हिंदू समाज व्यवस्था का पोषण तीन सिद्धांतों द्वारा होता है इनमें सबसे पहला सिद्धांत है, सीढ़ी भेदभाव का व्यवहार। इस चरणबद्ध असमानता का यह सिद्धांत मूल सिद्धांत और विचार से परे है। चारों वर्ण सपाट धारातल पर नहीं रचे गए हैं, जो भिन्न होते हुए भी समान हों। ये सीढ़ीनुम्मा धारातल वाले हैं। ये न केवल भिन्न-भिन्न हैं, वरन् स्थिति में भी असमान हैं और एक दूसरे के ऊपर टिके हुए हैं मनु की योजनानुसार ब्राह्मण को पहले वर्ण में रखा जाता है उसके नीचे का क्षत्रिय वर्ण होता है। क्षत्रिय से निचले वर्ण का वैश्य होता है वैश्य से निचला वर्ण शूद्र होता है तथा शूद्र से अगला वर्ण जाति शूद्र या अस्पृश्य का होता है। इन वर्गों के बीच अग्रता का यह क्रम मात्र परंपरागत नहीं है। यह आध्यात्मिक, नैतिक तथा वैधानिक हैं। जीवन का कोई भी हिस्सा नहीं है, जो वर्गीकृत असमानता के इस सिद्धांत से अछूता हो ।

Bharat tatha samyavad ki Purvapeksha Hindutva Ka Darshan pustak Dr Babasaheb Ambedkar      इसके पक्ष में मनुस्मृति के अनेक दृष्टांत दिए जा सकते हैं। मैं इस बात को सिद्ध करने के लिए चार उदाहरण दूंगा ।  ये है ।  दासता का नियम, विवाह का नियम, दंड  का नियम और संस्कार का नियम  तथा संन्यास का नियम ।  हिंदू 'नियम दासता को एक कानूनी प्रथा मानते हैं मनुस्मृति में तो सात प्रकार की दासता की उल्लेख है । नारदस्मृति में दासता की पंद्रह श्रेणियां मिलती हैं। दासों की संख्या का यह अंतर तथा वे वर्ग जिनके अंतर्गत ये आते हैं, महत्वपूर्ण नहीं हैं महत्वपूर्ण तो यह जानना है कि कौन किसको दास बना सकता है। इस संबंध में नारदस्मृति तथा याज्ञवल्कक्यस्मृति से निम्नांकित उद्धरण दिए जा सकते हैं :

     नारदस्मृति : 5.39 चारों वर्णों के उल्टे क्रम में दासता की कोई व्यवस्था नहीं है, सिवाय इसके जब कोई आदमी अपनी जाति के लिए निर्धारित कर्तव्यों की अवहेलना करता है दासता ( इस मामले में ) एक पत्नी की स्थिति जैसी होती है।

     याज्ञवल्क्यस्मृति : 16.183 (2) दासता वर्णों के अवरोही क्रम में होती है, आरोही क्रम में नहीं।

     दासता के मान्यता प्रदान किया जाना बहुत बुरी बात थी लेकिन यदि दासता के नियम को अपने ही हाल पर छोड़ दिया गया होता, तो इसका कम से कम एक परिणाम तो अच्छा होता। इससे समानता को बल मिलता। जाति परंपरा नष्ट हो गई होती, क्योंकि इसके अंतर्गत एक ब्राह्मण अस्पृश्यों का दास बन सकता था तथा अस्पृश्य ब्राह्मणों के मालिक बन सकते थे। लेकिन यह देखा गया कि बेरोक-टोक दासता का एक समतावादी सिद्धांत था और इसे निरस्त करने का प्रयास किया गया। अतः मनु तथा उनके उत्तरवर्तियों ने इस प्रकार की दासता को मान्यता प्रदान की कि यह वर्ण-प्रथा के विपरीत दिशा में नहीं होगी इसका तात्पर्य यह है कि एक ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण का दास बन सकता है लेकिन वह किसी दूसरे वर्ण के आदमी का दास नहीं बन सकता अर्थात् वह किसी क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या अतिशूद्र का दास नहीं बन सकता। दूसरी ओर, ब्राह्मण या क्षत्रिय को नहीं। एक शूद्र किसी दूसरे शूद्र तथा अतिशूद्र को अपना दास बना सकता है, लेकिन किसी ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य को नहीं। एक अतिशूद्र किसी दूसरे अतिशूद्र को ही अपना दास बना सकता है, लेकिन किसी ब्राह्मण, वैश्य या शूद्र को नहीं ।

     वर्गीकृत असमानता के इस सिद्धांत का एक और उदाहरण शादी-विवाह के नियमों में देखा जा सकता है। मनु कहता है :

     3.12 द्विजों की पहली शादी के लिए उसी जाति की स्त्री की संस्तुति की जाती है, परंतु ऐसे लोगों के लिए, जिन्हें किसी कारण से पुनर्निवाह करना हो, उसमें वर्णों के सीधे नीचे वर्ण की स्त्रियों को वरीयता दी जाती है।

     3.13 एक शूद्र स्त्री केवल शूद्र की पत्नी बन सकती है, वैश्य स्त्री एक वैश्य की पत्नी बन सकती है। वह दोनों तथा क्षत्रिय स्त्री किसी क्षत्रिय की पत्नियां बन सकती हैं। वह तीनों तथा ब्राह्मणी ब्राह्मण की पत्नियां बन सकती हैं।

     वस्तुतः मनु अंतर्जातीय विवाह के खिलाफ हैं उनकी व्यवस्था हरेक वर्ग के लिए अपने ही वर्ग में शादी विवाह करने की है लेकिन वह परिभाषित वर्ग के बाहर भी शादी करने को मान्यता देता है। यहां फिर वह वर्गों के बीच असमानता के अपने सिद्धांत को कोई हानि न होने देने के लिए अंतर्जातीय विवाह के प्रति विशेष रूप से सजग हैं। दासता की तरह वह अंतर्जातीय विवाह की अनुमति तो देता है, पर उल्टे क्रम में नहीं। दासता की तरह वह अंतर्जातीय विवाह की अनुमति तो देता है, पर उल्टे क्रम में नहीं। यदि कोई ब्राह्मण अपनी बिरादरी से बाहर विवाह कर सकता है तो वह अपने से निचले वर्ण की किसी भी स्त्री से विवाह करने के लिए स्वतंत्र है, अर्थात् वह वैश्य तथा शूद्र स्त्री के साथ विवाह कर सकता है, लेकिन अपने से ऊपर के ब्राह्मण वर्ण की स्त्री के साथ विवाह नहीं कर सकता है, लेकिन वह अपने से उच्च वर्णों, ब्राह्मण स्त्री तथा क्षत्रिय स्त्री से विवाह नहीं कर सकता ।

     तीसरा उदाहरण विधान के नियम में पाया जा सकता है, जिसकी स्थापना मनु ने की है। पहला उदाहरण गवाहों के साथ किए जाने वाले बर्ताव से संबंधित है, गवाहों को निम्नांकित ढंग से शपथ लेनी होती है

     8.87 शुद्ध हृदय न्यायकर्ता शुद्ध तथा सत्य वक्ता द्विज को कई बार पुकारेगा कि वह किसी देवता की प्रतिमा या ब्राह्मण की प्रतीक प्रतिमा के समक्ष पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके पूर्वाह्न समय में अपनी गवाही दे ।

     8.88 न्यायधीश ब्राह्मण से "कहो" क्षत्रिय से 'सत्य कहो' वैश्य से गो बीज और स्वर्ण की चोरी के पाप की झूठी गवाही से तुलना करते हुए तथा शूद्र से उन सभी पापों जो मनुष्य कर सकता है, के दोषों की झूटी गवाही से तुलना करते हुए गवाही देने को कहेगा ।

     मनु द्वारा निर्धारित अपराधों के दंड का उदाहरण लें। सबसे पहले मानहानि के लिए दंड की चर्चा करते हैं :

     8.267 यदि कोई क्षत्रिय किसी पुरोहित की मानहानि करता है तो उस पर सौ पण का जुर्माना किया जाएगा, यदि कोई वैश्य पुरोहित की मानहानि करता है तो उस पर एक सौ पचास या दो सौ पण का जुर्माना किया जाएगा; लेकिन ऐसे किसी अपराध के लिए किसी शिल्पी या दास व्यक्ति को कोड़े लगाए जाएंगे।

     8.268 यदि कोई पुरोहित किसी क्षत्रिय की मानहानि करे तो उस पर पचास पण का जुर्माना किया जाएगा यदि वह किसी वैश्य की मानहानि करता है। तो उस पर पच्चीस पण का जुर्माना किया जाएगा तथा दास वर्ग के किसी व्यक्ति की भर्त्सना करने पर उस पर बारह पण का जुर्माना किया जाएगा। अपमान का अपराध लें। मनु द्वारा निर्धारित दंड इस प्रकार है :

     8.270 यदि कोई शूद्र व्यक्ति किसी द्विज की घोर भर्त्सना करता है तो उसकी जीभ काट दी जाए। क्योंकि उसने ब्रह्मा के निम्नतम भाग से जन्म लिया है।

     8.2.71 यदि शूद्र उनके नामों तथा वर्णों का अपमानपूर्ण तरीके से उल्लेख करता है, मानो वह कहता है, अरे देवदत्त, तू ब्राह्मण नहीं है तो दस अंगुली लंबी लोहे की गर्म शलाका उसके मुंह में डाली जाएगी ।

     8.272 यदि शूद्र घमंडपूर्वक पुरोहितों को उनके कर्तव्यों के लिए निर्देश देता है, तो राजा उसके मुंह तथा कान में गर्म तेल डालने का आदेश देगा। गाली देने के अपराध का दंड। मनु कहता है :

     8.276 यदि कोई पुरोहित तथा क्षत्रिय आपस में गाली-गलौज करते हैं तो इस संबंध में जुर्माना विद्वान राजा द्वारा किया जाएगा और वह दंड या जुर्माना पुरोहित पर सबसे कम तथा क्षत्रिय पर उससे अधिक किया जाएगा।

     8.277 उपरोक्त अपराध यदि कोई वैश्य शूद्र करते हैं तब उन्हें जबान काटने की सजा छोड़कर शेष सभी प्रकार का दंड उनकी जाति के अनुसार दिए जाएं, दंड का यह निर्धारित नियम है।

     प्रहार या मारपीट के अपराध के दंड के रूप में मनु का सिद्धांत इस प्रकार है:

     8.279 जिस अंग द्वारा नीच जाति में जन्मा व्यक्ति ऊंची जाति के व्यक्ति पर हमला करेगा या उसे चोट पहुंचाएगा, उसका वह अंग काट लिया जाएगा, यह मनु का अध्यादेश है।

     मनु के अनुसार अहंकार के अपराध का दंड इस प्रकार होगा :

     8.281 नीच जाति का कोई व्यक्ति यदि उच्च जाति के व्यक्ति के साथ उसी स्थान पर अभद्रता के साथ बैठेगा, तो उसके कूल्हे को दाग दिया जाएगा तथा उसे देश निकाला दे दिया जाएगा या राजा उसके नितंब पर गहरा घाव करवा देगा।

     8.282 यदि वह घमंड के साथ उस पर थूकता है, तो राजा उसके दोनों होठों को यदि वह उस पर पेशाब करता है तो उसके लिंग को यदि वह अपाल वायु छोड़े तो उसकी गुदा को कटवा देगा।

     8.283 यदि वह ब्राह्मण को बालों से पकड़ता है, या इसी तरह यदि वह उसका पैर या गला या अंडकोष पकड़कर खींचता है, तो राजा बिना किसी हिचक या संकोच के उसके हाथों को कटवा दे |

     व्यभिचार के अपराध के लिए दंड के बारे में मनु कहता है। :

     8.3.59 यदि कोई शूद्र किसी पुरोहित की पत्नी के साथ वास्तव में व्यभिचार करता है, तो उसे मृत्यु दंड मिलना चाहिए, पत्नियों के मामले में सभी चारों वर्णों की स्त्रियों की विशेष रूप से रक्षा की जानी चाहिए।

     8.366 यदि कोई शूद्र किसी उच्च जाति की युवती से प्यार करता है, तो उसे मृत्यु का दंड मिलना चाहिए परंतु यदि वह कोई समान वर्ग की किसी कन्या से प्यार करता है, तो उसे उस कन्या से शादी करनी होगी, बशर्ते कि उस कन्या का पिता इसके लिए इच्छुक हो ।

     8.374 यदि कोई शूद्र किसी द्विज स्त्री के साथ सम्भोग करता है, चाहे वह स्त्री घर पर सुरक्षित है अथवा असुरक्षित, उसे उसी प्रकार दंड दिया जाएगा यदि स्त्री असुरक्षित है तो अपराधी के लिंग को कटवा कर तथा उसकी संपत्ति को जब्त कर दंडित किया जाए। यदि वह रक्षित है तो अपराधी की संपत्ति को जब्त कर उसे प्राण दंड दिया जाए।

     8.3.75 रक्षित ब्राह्मण के साथ व्यभिचार करने पर वैश्य एक वर्ष की सजा  के बाद अपनी समस्त धन संपत्ति खो देगा। क्षत्रिय पर एक हजार पण जुर्माना किया जाएगा और गधे के मूत्र से उसका मुंडन किया जाएगा ।

     8.3.76 लेकिन यदि कोई वैश्य या क्षत्रिय किसी अरक्षित ब्राह्मणी के साथ व्यभिचार करता है, तो राजा वैश्य पर पंच सौ पण तथा क्षत्रिय पर एक हजार पण का केवल जुर्माना करेगा।

     8.3.77 लेकिन यदि ये दोनों किसी न केवल रक्षित पुरोहितानी वरन् किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की पत्नी के साथ व्यभिचार करते हैं, तो वे शूद्रों के समान दंडनीय है और तृणाग्नि में जलाने योग्य है।

     8.382 यदि कोई वैश्य किसी रक्षित क्षत्रिय स्त्री के साथ या कोई क्षत्रिय किसी रक्षित वैश्य स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो उन दोनों को वही दंड दिया जाएगा जो अरक्षित ब्राह्मण के मामले में दिया जाता है।

     8.383 लेकिन यदि कोई ब्राह्मण इन दोनों वर्णों की किसी रक्षित स्त्री के साथ व्यभिचार करता है, तो उस पर एक हजार पण का जुर्माना किया जाना चाहिए, और शूद्र स्त्री के साथ व्यभिचार करने पर क्षत्रिय या वैश्य पर भी एक हजार पण का जुर्माना किया जाना चाहिए।

     8.384 यदि कोई वैश्य किसी रक्षित क्षत्रिय स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो जुर्माना पांच सौ पण होगा, लेकिन यदि कोई क्षत्रिय किसी वैश्य स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो उसका सिर मूत्र में मुंडवा देना चाहिए या उससे उल्लिखित जुर्माना लेना चाहिए।