हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
यदि किसी जाति का कोई समूह पूजा का कोई नया या असामान्य माध्यम अपनाता है, जिसे उसकी बिरादरी के अन्य सदस्य मान्यता नहीं देते, तो वह गुट टूट जाएगा और एक संगोत्र उपजाति बन जाएगी। यदि कुछ उपजातियां देखने में नहीं आती हैं तो इसका कारण उनकी सहिष्णुता है कि वह किसके साथ रोटी-बेटी का व्यवहार करते है तथापि हम पाएंगे कि तेली तथा कोरी जातियों में महाभीर व पंचप्रिय और बढ़ई, भंगी तथा खडेरा जातियों में नमकशाली उपजातियां पाई जाती हैं। "
"एक हिंदू या तो अकेला खाना खाता है, या फिर अपनी बिरादरी के लोगों के साथ खाता हैं। स्त्रियां पुरुषों के साथ खाना नहीं खा सकतीं। वे तब तक इंतजार करती हैं, जब तक कि उनके पति खाना समाप्त नहीं कर लेते। जहां तक खाने या खाने के किसी भाग में कच्चा खाना ( यह हमेशा होता है क्योंकि हर खाने में चपाती होती है) शामिल होता है, तो ऐसे में आदमी को बड़े मंत्रोपचार जैसे एतिहायती कदमों के साथ भोजन करना पड़ता है। वह जमीन पर अपने चारों तरफ चौकोर लकीर खींचकर (चौका) बैठता है, जिसके अंदर चूल्हा या खाना बनाने का स्थान होता है। यदि किसी अजनबी की छाया भी ऐसे स्थान पर पड़ जाती है, तो सारा पका पकाया खाना झूठा हो जाता है और उसे फेंक दिया जाता है। एक ही समूह में हिंदू सेवकों को एक-दूसरे से अलग-अलग अपने-अपने चौके में मिट्टी के चूल्हों पर अपना खाना बनाते हुए और अकेले बैठकर खाते हुए देखा जा सकता है।
"कुल मिलाकर पानी पीने के नियम भी ठीक उसी प्रकार हैं, जिस प्रकार पक्का खाना स्वीकार करने के। लेकिन इसमें प्रवृत्ति कुछ हद तक लचीली है। यह बात उस पात्र पर लागू होती है, जिसमें पानी रखा जाता है। एक उच्च जाति का आदमी निम्न जाति के आदमी से अपना लोटा तो भरवा लेगा, पर उसके लोटे से पानी नहीं पिएगा। फिर, ऊंची जाति वाला किसी भी व्यक्ति को (अस्पृश्यों को छोड़कर) पानी पिलाएगा, और ऐसा वह अपने लोटे से उस पीने वाले के लोटे में पानी डालकर करेगा। स्टेशनों पर रेल यात्रियों को पानी की आपूर्ति किए जाने के लिए रखे हुए सभी आदमी बढ़ई, बारी, भड़भूजे, हलवाई, कुम्हार तथा नाई हैं। निस्संदेह कुछ उच्च जातियों के भी हैं।
धूम्रपान के नियम तो और भी सख्त हैं । बहुधा देखा गया है कि कोई आदमी अपनी बिरादरी के लोगों के अलावा किसी और के साथ धूम्रपान नहीं करता । इसका कारण बहुत ही स्पष्ट है कि धूम्रपान में सामान्यतः हुक्के का प्रयोग किया जाता है और इसमें ज्यादा नजदीकी संबंध निहित होते हैं, यहां तक कि खाने से भी ज्यादा । यह नियम वास्तव में इतना कठोर है कि इस तथ्य के आधार पर से भी ज्यादा । यह नियम वास्तव में इतना कठोर है कि इस तथ्य के आधार पर जाट, अहीर और गुजर एक-दूसरे के ज्यादा सगे-संबंधी माने जाते हैं, अतः वे एक-दूसरे के साथ धूम्रपान कर सकते हैं। कुछ जातियां, उदाहरण के लिए कायस्थ नारियल तथा सामान्य तरीके से धूम्रपान करने के बीच अंतर रखते हैं। नारियल द्वारा धूम्रपान करने में नलकी के चारों ओर हाथ गोल करके बंद कर दिया जाता है और नली को मुंह में डाले बिना धूम्रपान किया जाता है। पात्रों के बारे में कहने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके भी नियम निर्धारित हैं कि किस प्रकार के बर्तन बनाए जाने चाहिएं। लेकिन ये नियम सामाजिक होने के बजाए धार्मिक ज्यादा हैं। हिंदुओं को मिश्र धातु या पीतल के बर्तनों का उपयोग करना चाहिए हालांकि मिश्र धातु का उपयोग अनेक तथा छोटी-छोटी निषेधज्ञाओं से सीमित है और यदि यह पात्र अशुद्ध हो जाते हैं, तो उनको शुद्ध करने का तरीका केवल यह होता है कि उन्हें पुनः ढाला जाए। बर्तन झूठे हो जाने के डर के कारण हर आदमी के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह अपने उपयोग के लिए कुछ निजी बर्तन रखे। इनमें कम से कम एक लोटा (पीने का पात्र), बटलाई तथा थाली होनी चाहिए । उच्च जाति के ग्रामीण लोग एक कटोरा तथा गागर इसमें और जोड़ देते हैं। दावत के लिए एक ही जाति के लोग सामान्यतः सभी प्रकार के बर्तन बड़ी मात्रा में रखते है, जिन्हें वे मेजबान को बरतने के लिए देते हैं। इन बर्तनों को दंड स्वरूप प्राप्त हुए धन से खरीदा जाता है, और यह सभी की साझा संपत्ति होती है।"
ऐसे मनोविकारों पर आधारित समाज व्यवस्था में भाई-चारा कैसे हो सकता है? भाई-चारे की भावना तो दूर की बात है, जातियों के आपसी संबंध भी भ्रात- हत्या जैसे हैं। वर्ग-चेतना, वर्ग-संघर्ष तथा वर्ग- युद्ध जैसी विचारधारा के बारे में माना जाता है कि यह कार्लमार्क्स के लेखन से अस्तित्व में आई। यह एक भारी गलती है। भारत वह देश है, जिसने वर्ग- संघर्ष का वास्तविक अनुभव किया है। भारत वह भूमि है, जहां ब्राह्मणों व क्षत्रियों² के बीच वर्ग-युद्ध हुआ है, जो कई पीढ़ियों तक चला है और इतनी कटुता के साथ लड़ा गया कि इससे समूलनाश - युद्ध का वातावरण ही बन गया था।
यह नहीं माना जाना चाहिए कि भाई द्वारा भाई की हत्या करने की भावना ने भाईचारे की भावना को जन्म दिया है। हिंदू समाज व्यवस्था में पृथक्करण की ठीक वही भावना आज भी देखी जा सकती है, जो कि निम्न विवरण से स्पष्ट है :
प्रत्येक वर्ग अपनी अलग-अलग व पृथक उत्पत्ति का दावा करता है। कुछ यह दावा करते हैं कि वे अमुक ऋषि या अमुक योद्धा की संतान हैं लेकिन हरेक मामले में ऋषि या नायक भिन्न होता है, जिसका दूसरी जातियों के जनक कहे जाने वाले अन्य ऋषियों या नायकों से कोई संबंध नहीं होता । प्रत्येक जाति इस बात का ध्यान रखती है कि वह अपने को दूसरी जाति से श्रेष्ठ सिद्ध करे। इसका सही चित्रण अतिसहभोजता के नियमों तथा अतिसंगम के नियमों द्वारा किया गया है। जैसा कि श्री ब्लंट ने कहा है :
"यह जानना आवश्यक है कि खान-पान के संबंध में रसोइए की जाति पक्का मापदंड है। मेजबान कोई भी हो सकता है। अतः यह स्वाभाविक है कि उच्च जाति का हिंदू किसी भी जाति के व्यक्ति का खाना खा सकता है, बशर्ते मेजबान का रसोइया उपयुक्त जाति का हो और यही कारण है कि अनेक रसोइए ब्राह्मण हैं। हिंदू कच्चा खाना, जो कि पानी से बनाया जाता है तथा पक्का खाना जो कि घी में बनाया जाता है, के बीच अंतर करता है । यह अंतर इस सिद्धांत पर आधारित है कि गाय का घी शुद्ध पदार्थ है, इसलिए अशुद्ध की आशंका नहीं रहती। इसीलिए इस सुविधाजनक मान्यता के कारण हिंदू कच्चे खाने की अपेक्षा पक्के खाने के मामले में कम रूढ़िवादी होता है और तदनुसार अपने प्रतिबंधों को सीमित करता है । "
1. उत्तरी भारत में साथ-साथ खाने पर केवल तभी निषेध है, जब भोजन कच्चा होता है। लेकिन दक्षिण भारत में यह निषेध पूरी तरह है, चाहे भोजन पक्का भी क्यों न हो। कच्चा भोजन पानी से, पक्का घी में बनाया जाता है।
2. देखिए, मेरी पुस्तक हू वर दि शुद्राज
3. दि कास्ट सिस्टम आफ नर्दन इंडिया, पृ. 89-90
निकट संबंधों के बारे में श्री ब्लंट कहते हैं¹ :
"निकट संबंधों की परंपरा के कारण कई जातियों के शादी व्यवहार में महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है। जहां यह लागू होता है, वहां विजातीय विवाह संबंधी समूहों को उनके सामाजिक स्तर के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है, लेकिन देता नहीं है। यह नियम राजदूतों के बीच बहुत ज्यादा प्रचलित है। लेकिन कई अन्य जातियों द्वारा भी इनका पालन किया जाता है ..... । वास्तव में लगभग सभी हिंदुओं के बीच अति-संकीर्णता की प्रवृत्ति पाई जाती है।"
संकीर्णता के आधार पर खान-पान और संबंधों में इन नियमों के पीछे क्या चीज रही है? इसके पीछे छोटे-बड़े की भावना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। सभी जातियां इस भावना से ग्रस्त हैं और कोई भी जाति ऐसी नहीं है जो इससे मुक्त हो । हिंदू समाज-व्यवस्था जातियों की एक सीढ़ी है, जिसमें एक के ऊपर एक को रखा गया है यह ऐसी तराजू है, जिसमें घृणा का पलड़ा भारी से भारी होता जाएगा।
यह भावना एक जाति द्वारा दूसरी जाति पर कटाक्ष करने के उद्देश्य से बनाई गई कहावतों में परिलक्षित होता है। इसने निम्न जाति के लेखकों को अपने साहित्य में यह सुझाव देने को भी प्रेरित किया है कि तथाकथित उच्च जाति का उद्भव घटिया व शर्मनाक हैं, सहयाद्रि खड़ इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है। यह एक पुराण है जो कि अपनी शैली में अन्य परपंरागत पुराणों से भिन्न हैं इसमें भिन्न-भिन्न जातियों के बारे में वर्णन मिलता है। ऐसा करते समय इसमें अन्य जातियों की उत्पत्ति को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। किन्तु ब्राह्मण जाति की उत्पत्ति को घृणित बताया है इसका उत्तर नकारात्मक है। यह सिद्धांत कि आदमी स्वतंत्र पैदा होता है, हिंदू समाज-व्यवस्था के खिलाफ हैं। यह समाज आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस सिद्धांत को गलत मानता है हिंदू समाज व्यवस्था के अनुसार हालांकि यह सही है कि सभी मनुष्य इस ब्राह्मांड के सृजक प्रजापति की संतान है, पर वे समान नहीं हैं, क्योंकि वे प्रजापति के शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों से पैदा हुए हैं। ब्राह्मण उनके मुंह से, क्षत्रिय उनकी भुजाओं से, वैश्य उनकी जंघा से तथा शूद्र उनके पैरों से पैदा हुए हैं। जिन अंगों से वे पैदा हुए हैं, वे अंग असमान महत्व रखते हैं, इसलिए आंखों के द्वारा पैदा किए गए मनुष्य भी असमान हैं। जीव-विज्ञान के दृष्टिकोण से हिंदू समाज-व्यवस्था यह परवाह नहीं करती कि वह इस सिद्धांत की जांच कराए कि क्या वह तथ्य पर आधारित हैं उन्होंने यह जानने की चेष्टा नहीं की कि प्रत्येक
1. दि कास्ट सिस्टम आफ नर्दन इंडिया,
व्यक्ति गुण, स्वभाव और प्राकृतिक रूप से समान है या नहीं। यदि प्राकृतिक और स्वभावगत असमानता रहती है, तो चलो ठीक है फिर तो यह सिद्धांत ही कचरा है कि जन्म से ही सभी भौतिक और प्रवृत्ति के आधार पर समान होते हैं। वास्तव में हिंदू समाज-व्यवस्था इस मत के प्रति उदासीन है। यह इसके नैतिक सिद्धांत के प्रति उतनी ही उदासीन है। यह इस बात को मानने से इंकार करती है कि मनुष्य अलग-अलग हैसियत में क्षमता तथा स्वभाव के दृष्टिकोण से भिन्न होते हुए भी मानव कहलाने के अधिकारी हैं और उन्हें सम्मान मिलना चाहिए तथा समाज की भलाई इसी में हो सकती है कि यदि वह अपने संगठन को इस तरह से योजनाबद्ध करे, भले ही उनकी शक्तियां छोटी या बड़ी हों, इसके सभी सदस्यों के सामन रूप से मौका मिलना चाहिए कि वे अपनी-अपनी शक्तियों का सर्वोत्तम उपयोग व प्रदर्शन करें। परिस्थितियों, संस्थाओं तथा जीवन के तौर-तरीकों को यह समाज व्यवस्था अनुमति नहीं देगी। यह समतावादी परंपरा के विरुद्ध है।