हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
II
हिंदू-समाज व्यवस्था इन सिद्धांतों को कहां तक मान्यता प्रदान करती है ? यह जानकारी होना बहुत आवश्यक है, क्योंकि यह केवल इस बात पर निर्भर करता है कि समाज किस सीमा तक इन सिद्धांतों को मान्यता देता है; इस कसौटी पर कसकर ही इसे एक स्वतंत्र समाज व्यवस्था कहा जा सकता है।
"देखो! सभी आत्माओं पर मेरा अधिकार है, जैसे की पिता की आत्मा मेरी है वैसे ही पुत्र की आत्मा भी मेरी है, जो आत्मा पाप-कर्म करती है, वह नष्ट हो जाएगी। ..पुत्र, पिता के दुराचार का भागीदार न होगा, और न पिता ही पुत्र के दुराचार का भागी होगा । पुण्यात्मा की पवित्रता का लाभ उसी पुण्यात्मा को मिलेगा, तथा पापी के पाप कर्म का परिणाम उसी पापात्मा को भुगतना पड़ेगा । "
यहां व्यक्ति विशेष की विशिष्टता तथा उसके नैतिक दायित्व पर बल दिया गया है। हिंदू समाज-व्यवस्था व्यक्ति को सामाजिक उद्देश्य का केंद्र नहीं मानती, क्योंकि हिंदू समाज-व्यवस्था मुख्य रूप से श्रेणी या वर्ण पर आधारित है, न कि व्यक्ति पर। मूल तथा औपचारिक रूप से हिंदू समाज व्यवस्था ने चार वर्णों को मान्यता दी है : (1) ब्राह्मण, (2) क्षत्रिय, (3) वैश्य तथा (4) शूद्र। आज इसमें पांच वर्ग शामिल हैं। पांचवें को पंचम या अस्पृश्य कहा जाता है। हिंदू समाज की इकाई न कोई ब्राह्मण व्यक्ति है और न क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा पंचम वर्ग का व्यक्ति ही उसकी इकाई है। यहां तक कि परिवार को भी हिंदू समाज व्यवस्था द्वारा समाज की इकाई नहीं माना जाता। हां, केवल शादी-विवाह तथा उत्तराधिकार के मामलों में ऐसा माना जाता है। हिंदू समाज व्यवस्था में व्यक्ति विशेष की योग्यता का कोई स्थान नहीं है तथा वैयक्तिक न्याय का भी ध्यान नहीं रखा जाता है। यदि किसी व्यक्ति को कोई विशेषाधिकार प्राप्त है तो ऐसा इसलिए नहीं है कि वह व्यक्तिगत रूप से उसका अधिकारी है। यह विशेषाधिकार उसे उसके वर्ण के कारण मिलता है, और यदि वह उसका उपभोग करता है तो सिर्फ इसलिए कि वह एक वर्ण विशेष का है। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति को कष्ट भोगना पड़ रहा है तो उसका कारण भी उसका वर्ण ही हैं, यह दुरावस्था वर्ण के आधार पर थोपी जाती है और यदि वह इसके कारण पिस रहा है तो इसका उत्तरदायी उसका वर्ण है।
क्या हिंदू समाज-व्यवस्था भाई चारे को मानती है? ईसाई तथा मुसलमानों की तरह हिंदू भी यही मानते हैं कि इंसान को ईश्वर ने पैदा किया है। लेकिन जहां ईसाई और मुसलमान इसे पूर्ण सच्चाई मानते हैं, हिंदू इसे अर्द्ध-सत्य मानते हैं। उनके अनुसार इस पूर्ण सत्य के दो भाग हैं पहला भाग तो यह है कि मनुष्य को ईश्वर ने पैदा किया है। दूसरा भाग यह है कि ईश्वर ने अपने दैवी शरीर के भिन्न-भिन्न भागों से भिन्न-भिन्न वर्ण के लोगों को पैदा किया है। हिंदू पहले भाग की तुलना में दूसरे भाग को अधिक महत्वपूर्ण तथा अधिक मौलिक मानते हैं।
हिंदू समाज व्यवस्था इस सिद्धांत पर आधारित है कि ईश्वर ने मानव को अपने शरीर के भिन्न-भिन्न हिस्सों से पैदा किया है, अतः पाल या पवित्र स्थानों की यात्रा करने वाले पादरियों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों का इसमें कोई स्थान नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्रिय ईश्वर की भुजाओं से पैदा हुआ है। क्षत्रिय, वैश्य का भाई नहीं है क्योंकि क्षत्रिय ईश्वर की भुजाओं तथा वैश्य उसकी जंघा से पैदा हुआ है। चूंकि कोई किसी का भाई नहीं है, अतः कोई किसी का रक्षक नहीं है।
इस सिद्धांत ने, कि भिन्न-भिन्न वर्ण ईश्वर के भिन्न-भिन्न अंगों से पैदा हुए हैं, इस विश्वास को पैदा किया है कि यह ईश्वरीय इच्छा है कि वे सभी वर्ण अलग-अलग रहें तथा अपनी अलग-अलग पहचान बनाए रखें। इसी विश्वास ने हिंदुओं में अलग-अलग रहने तथा अपने शेष साथी हिंदुओं से भिन्न, विशिष्ट पहचान बनाए रखने की भावना को बल दिया है। मनुस्मृति के उपनयन या यज्ञोपवीत पहनने के निमंकित निमयों की तुलना कीजिए :
2.36 ब्राह्मण - बालाक का गर्भ से आठवें वर्ष में क्षत्रिय- बालक का गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य बालक का गर्भ से बारहवें वर्ष उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार कराएं।
2.41 ब्रह्मचारी अपनी जाति के अनुसार शरीर के ऊपरी भाग पर कृष्णमृग चित करते मृत तथा बकरे की खाल शरीर के निचले भाग पर सन, क्षौम या ऊन के बने वस्त्र पहने।
2.42 ब्राह्मण की मेखला में तीन गाठें मूंगा घास के तीन धागों से और चिकनी व मुलायम, क्षत्रिय की मेखला मुर्वा धागे की तथा वैश्य की मेखला सन के धागों की बनी होनी चाहिए ।
2.43 यदि मूंगा घास आदि प्राप्त न हो, तो (मेखला) कुश अश्मंतक तथा बल्वज ( रेशों) की बनाई जा सकती है जिसमें (परिवार की रीति-रिवाज के अनुसार) एकल तिहरी गांठ या तीन या पांच गांठें लगाई जा सकती हैं। 2.44 ब्राह्मण का यज्ञोपवीत रूई का क्षत्रिय का यज्ञोपवीत सन के धागों का तथा वैश्य का यज्ञोपवीत ऊनी धागों का ऊपर की ओर से बंटा हुआ तीन लड़ी का होना चाहिए।
2.45 पवित्र विधान के अनुसार ब्राह्मण को बेल या पलाश का, क्षत्रिय को बट या खैर का तथा वैश्य को पीलु या गूलर का दंड धारण करना चाहिए।
2.46 ब्राह्मण का दंड केश तक, क्षत्रिय का दंड ललाट तक तथा वैश्य का दंड नाक तक लंबा होना चाहिए ।
2.48 सूर्योपसना के बाद अपनी पसंद का दंड लेकर अग्नि की प्रदक्षिणा कर विद्यार्थी ब्रह्मचारी को विधिपूर्वक भिक्षा मांगनी चाहिए ।
2.49 उपवीत ब्राह्मण को 'भवति' शब्द का वाक्य के पहले उच्चारण कर क्षत्रिय को भवति शब्द का वाक्य के मध्य में उच्चारण कर तथा वैश्य को भवति शब्द का वाक्य के अंत में उच्चारण कर भिक्षा याचना करनी चाहिए।
इसको पढ़कर कोई भी इन भिन्नाओं के कारणों के बारे में पूछ सकता है उपर्युक्त नियम विद्यार्थियों या तथाकथित ब्रह्मचारियों से संबंधित हैं जो वेदों का अध्ययन करने को तत्पर हैं, यह भिन्नताएं क्यों होनी चाहिएं ? ब्राह्मण बालक के उपनयन की उम्र और क्षत्रिय या वैश्व बालक के उपनयन की उम्र में भिन्ता क्यों होनी चाहिए ? उनके वस्त्र भिन्न-भिन्न प्रकार के क्यों होने चाहिए, उनके दंड अलग-अलग पेड़ों की लकड़ी से क्यों बनाए जाने चाहिएं? उनके दंड की लंबाई अलग-अलग क्यों होनी चाहिए? भिक्षा याचना करने के समय ' भवति' शब्द को वाक्य का उच्चारण करते समय अलग-अलग स्थानों पर क्यों रखना चाहिए? ये भेद न तो आवश्यक है और न ही लाभदायक है। इसका एकमात्र उत्तर यह है कि यह भदे सहज हिंदू प्रवृत्ति का परिणाम है कि वे अपने ही साथी मानवों से अलग-अलग रहते हैं, जो लोगों के इस विश्वास के कारण है कि वे सभी ईश्वरीय शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों से पैदा हुए हैं।
इसी विश्वास के कारण हिंदूओं की यह भी मूल प्रवृत्ति है कि भेद को नजरअंदाज न किया जाए, बल्कि उस पर बल दिया जाए, उसे पहचाना जाए तथ उसे उजागर किया जाए। जाति के अस्तित्व की ओर उसके विशिष्ट वस्त्रों और नाम से ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए। संप्रदाय के लिए उसकी पहचान होना आवश्यक है। भारत में 92 मत-मतांतर हैं। उनमें से प्रत्येक का अलग चिह्न है। एक दूसरे से पृथक 92 संकेतों की खोज करना जटिल कार्य है। इसी कारण अति मेधावी व्यक्ति को भी इसमें सिर खपाने की हिम्मत नहीं होगी तथापि, हिंदुओं ने इसे पूरा किया है, जिसे मूर द्वारा अपनी हिंदू पेंथियोन पुस्तक में दिए गए इन तिलकों के सचित्र निरूपण में देखा जा सकता है।
निस्संदेह पृथक्करण तथा अलगाववाद की भावना की बहुत व्यापक और अनियंत्रित अभिव्यक्ति जातिप्रथा है। यह समझ लेना चाहिए कि जाति एक नहीं, अनेक हैं। जातियां हो सकती है। लेकिन एक जाति जैसी कोई चीज नहीं हो सकती। लेकिन सिद्धांत रूप में यह मान लिया जाए कि जातियां होनी चाहिएं, तो कितनी जातियां होनी चाहिएं? मूल रूप से शुरू में केवल चार जातियां थीं। आज कितनी हैं ? अनुमान है कि कुल मिलाकर ये दो हजार से कम नहीं हैं। यह तीन हजार भी हो सकती हैं। इस संदर्भ में चौंकाने वाला यह केवल एक पहलू नहीं है, और भी हैं। जातियों को भी उपजातियों में बांटा गया है। उनकी संख्या अनगणित हैं। ब्राह्मण जातियों की कुल आबादी लगभग डेढ़ करोड़ है। लेकिन ब्राह्मण जाति में भी 1,886 उपजातियां हैं। केवल पंजाब में ही सारस्वत ब्राह्मण 469 उपजातियों में बंटे हैं। पंजाब के कायस्थों की 890 उपजातियां हैं। इसी प्रकार समाज को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटने वाली इस अंतहीन प्रक्रिया के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। टुकड़ों में बांटने वाली इस प्रक्रिया से सामाजिक जीवन बिल्कुल असंभव सा हो गया हैं। इससे जातियां इतने छोटे समूहों में बंट गई हैं कि उससे बाह्य जातियों के साथ विवाह संबंध करना बिल्कुल असंभव सा हो गया है। बनियों की कुछ उपजातियों के तो सौ परिवारों से ज्यादा घर नहीं हैं। वे आपस में इतने मिले-जुले हैं कि सगोत्रता के नियमों का उल्लंघन किए बिना उनकी जातियों में शादी-विवाह करना कठिन हो गया है।
यह उल्लेखनीय है कि छोटे-मोटे बहाने ही इन जातियों के उपजातियों में विभाजित होने के कारण हैं। जातियों-उपजातियों के स्थान परिवर्तन, व्यवसाय परिवर्तन, सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन, प्रदूषण के कारण परिवर्तन, मालिकाना हक के कारण, परिवर्तन झगड़े के कारण परिवर्तन, धर्म परिवर्तन के कारण से बिखराव आता जाता है। श्री ब्लंट ने हिंदुओं में विद्यमान इस प्रवृत्ति का जीवंत वर्णन करने के लिए कई उदाहरण दिए हैं यहां सभी को प्रस्तुत करना संभव नहीं है। अतः यहां केवल एक उदाहरण ही प्रस्तुत किया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि छोटे-मोटे झगड़े एक जाति को उपजातियों में कैसे बांट देते हैं। जैसा कि श्री ब्लंट ने कहा है :
“लखनऊ में खटीक नाम की एक उपजाति है, जिसमें तीन गोल अथवा समूह थे। इन्हें मानिकपुर, जायसवाल तथा दलमान के नाम से जाना जाता था। उनमें रोटी-बेटी का व्यवहार था ओर वे अपने चौधरी अथवा प्रधान के नेतृत्व में पंचायत में एक साथ बैठते थे। बीस वर्ष पहले प्रत्येक समूह का एक ही चौधरी होता था। लेकिन आज जैसवाल समूह के ही तीन चौधरी हैं तथा मानिकपुर समूह के दो । झगड़े का पहला कारण यह था कि एक औरत (जिसका गोल नहीं दिया गया है) गली में फल बेचा करती थी। उसके भाई-बंधुओं ने उसे ऐसा न करने का आदेश दिया क्योंकि ऐसा करना उनकी बिरादरी की शान के खिलाफ था । औरतों को केवल दुकानों पर बैठकर बिक्री करना चाहिए। वह और उसका पति हठी थे, और अंत में उसके ही अपने गोल ने उन्हें बिरादरी से बाहर कर दिया। वैसे दलमान गोल, जो इस कार्यवाही से सहमत नहीं था, उसने औरत के पति को जाति से बाहर रखने के बजाए 80 रुपए दंड लेकर अपने वर्ग में ले लिया। झगड़े का दूसरा कारण यह था कि एक आदमी (जिसका
1. दि कास्ट सिस्टम आफ नदर्न इंडिया, पृ. 51-56
गोल नहीं दिया गया है) को अपने को गोल द्वारा बिरादरी से बाहर कर दिया था और जब कि यह मामला न्यायालय में विचारधीन था, जैसवाल चौधरी ने गलती से उसे रात के भोजन पर बुला लिया। इस पर तीनों गोलों ने एक साथ मिलकर चौधरी पर 30 रुपए का दंड लगा दिया। अंत में दंड की राशि एकत्रित की गई और यह निर्णय लिया गया कि कथा कराई जाए। दलमु चौधरी ने कहा कि वह तो अपना हिस्सा नकद लेगा। लेकिन मानिकपुर चौधरी (जसके पास संयुक्त राशि जमा थी) ने इससे असहमति व्यक्त करते हुए वह रवैया अपनाया कि जो कथा होने जा रही है, उसमें दलमु लोग यदि चाहें तो आ सकते हैं, और न चाहें तो न आएं। इस स्तर पर इस मामले को न्यायालय में ले जाया गया, इसी बीच तीनों गोलों ने एक दूसरे के साथ - शादी विवाह करना बंद कर दिया। इन झगड़ों के कारण सगोत्र शादी-विवाह होने वाली उपजाति तीन समूहों में बंट गई और एक गोल दूसरे गोल के खिलाफ हो गया।