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हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 32 of 48
04 ऑगस्ट 2023
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अध्याय 2

हिंदू समाज-व्यवस्था : इसके मूलभूत सिद्धांत

I

     हिंदू समाज-व्यवस्था की क्या विशिष्टता है? क्या यह एक स्वतंत्र समाज है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह समझना आवश्यक है कि स्वतंत्र समाज - व्यवस्था कैसी होती है। सौभाग्य से इस मामले पर बहुत अधिक विवाद नहीं है । फ्रांस की क्रांति से लेकर आज जब स्वतंत्र सामाजिक व्यवस्था के आवश्यक लक्षणों के बारे में कोई मतभेद नहीं है। ये आवश्यक तत्व कई हो सकते हैं, लेकिन इसमें दो तत्व तो अनिवार्य है। पहली अनिवार्यता यह है कि समष्टि में व्यष्टि का समावेश होता है और समाज का लक्ष्य उस व्यष्टि को बढ़ाना तथा उसके व्यक्तित्व का विकास करना बन जाता है । समाज व्यक्ति से ऊपर नहीं होता और यदि व्यक्ति स्वयं को समाज के अधीन मानता है, तो उसका कारण यह है कि उसे समाज की अधीनता में अपनी बेहतरी का आभास होता है। यह अधीनता केवल उस समय तक रहती है, जब तक उसकी आवश्यकता महसूस की जाए।

Hindu Samaj vyavastha Iske Mulabhut Siddhant Hindutva Ka Darshan Dr Babasaheb Ambedkar      दूसरी अनिवार्यता यह है कि किस समाज के सदस्यों के बीच सामाजिक धरातल पर स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारे को महत्व दिया जाना चाहिए।

     किसी समाज की स्वतंत्र व्यवस्था के लिए ये दो तत्व अनिवार्य क्यों हैं? समस्त सामाजिक उद्देश्यों के संदर्भ में व्यष्टि को साध्य क्यों माना जाना चाहिए, यह साधन क्यों नहीं हो सकता? इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए इस बात को समझना आवश्यक है कि जब हम मानव के विषय में बात करते हैं तो इसका तात्पर्य क्या है? हमें मानव अधिकारों की रक्षा के लिए अपने अमूल्य संसाधनों तथा अनेक जिंदगियों का बलिदान क्यों करना चाहिए? इस प्रश्न का सबसे बेहतर जवाब प्रोफेसर जैक्स मैरिटेन देते हैं। प्रोफेसर मैरिटेन 'दि कांक्वेस्ट ऑफ फ्रीडम¹' नामक अपने निबंध में लिखते हैं :


1. फ्रीडम इट्स मीनिंग, रूथ नंदा किशन, पृ. 214


     " जब हम मानव के विषय में बात करते हैं, तो हमारा तात्पर्य मात्र यही नहीं होता है कि कोई व्यक्ति एक व्यष्टि अर्थात् समाज की इकाई है। ठीक वैसे ही, जैसे एक अणु घास का तिनका एक मक्खी या एक हाथी  अलग-अलग इकाईयां हैं, व्यक्ति भी एक इकाई होता है जो अभी बृद्धि और इच्छा-शक्ति से स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखता हैं। केवल उसका शारीरिक अस्तित्व ही नहीं होता, बल्कि उसके पास ज्ञान और प्रेम जैसे उच्च आध्यात्मिक भाव भी होते हैं जिससे वह कुछ मायनों में स्वयं में एक ब्रह्मांड है। वह एक ऐसा प्राणी है, जिसमें ज्ञान के माध्यम से उसकी संपूर्णता के साथ एक विशाल ब्रह्मांड को समेटा जा सकता है। प्रेम-भाव द्वारा वह अन्य प्राणियों से अपने को जोड़ सकता है। ऐसे संबंधों का साक्ष्य भौतिक संसार में अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकता। यह विशिष्टताएं मानव में होती हैं, क्योंकि मानव हाड़-मांस का पुतला होते हुए भी एक दैवी अग्नि से संपन्न है जो उसे क्रियाशील रखती है, जो उसमें जीवंत रहती है और यह अग्नि उसमें गर्भधारण से लेकर अर्थी चढ़ने तक मौजूद रहती है। आत्मा अजर और अमर है अर्थात् समय और मृत्यु से परे है। आत्मा व्यक्तित्व का मूल है। इस प्रकार व्यक्तित्व के अंतर्बोध में संपूर्णता तथा स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण स्थान है। भले ही कोई व्यक्ति कितना ही दीन-हीन क्यों न हो, तो वह समाज की एक इकाई ही । और एक व्यक्ति के रूप में उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यदि व्यक्ति एक प्राणी है और एक संपूर्ण तत्व की समग्रता से अधिक उसकी स्वतंत्र सत्ता अधिक महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि वह संपूर्ण तत्व का एक सूक्ष्म कण है, जो एक ब्रह्मांड है। संपूर्ण मानव जाति में भिखारी भी एक इकाई है। वह हाड़-मांस का पुतला होता है, जिसका कि साक्षात एक मूल्य तथा महत्व होता है किन्तु वह असहाय होता है। वैसे वह स्वर्ग का प्रहरी है। यह एक आध्यात्मिक रहस्य है, जिसका धार्मिक सिद्धांतों में स्वस्थ उल्लेख है, और इसीलिए कहा जाता है कि मानव ईश्वर की प्रतिमूर्ति है। मनुष्य का मूल्य, उसकी गरिमा तथा अधिकार उन नैसर्गिक पवित्र वस्तुओं से संबंध रखते हैं, जिससे परमपिता परमेश्वर की छाप होती है और जो उसके भीतर उनके लक्ष्यों को निर्धारित करती है। "

     समानता क्यों परवमावश्यक है? इस विषय का सबसे अच्छा वर्णन प्रो. बियर्ड ने अपने निबंध 'फ्रीडम इन पालिटिकल थाट' में किया है और उनको उद्धत करने के अलावा मैं और कुछ नहीं करूंगा। प्रो. बियर्ड¹ के अनुसार :

     "समानता एक निरर्थक शब्द है, किन्तु इसका कोई विकल्प भी नहीं है। समानता का अर्थ है, 'ठीक वैसा ही अर्थात् माप, तोल, गुण, धर्म और कर्म में समान'। यह एक ऐसा शब्द है जो भौतिक शास्त्र तथा गणित में तो चल सकता है, लेकिन मानव के साथ उपयोग में लाने पर सटीक अर्थ नहीं देता ।


1. फ्रीडम इट्स मीनिंग, पृ. 11-13


जिन विद्वानों ने इस विषय का सूक्ष्मता से अध्ययन किया है, उनका विचार है कि मानव समाज में मोटे तौर से तो मूल प्रवृत्तियां एक जैसी होती हैं, किन्तु जब इन प्रवृत्तियों का विस्तार होता है, जब उनमें पूरी तरह भिन्नता दृष्टिगोचर होने लगती है। उस समय उनकी सार्वभौमिकता विलीन हो जाती है। क्या इन लक्षणों को मौलिक गुण, जैविक आवश्यकताएं अथवा अवशिष्ट कहा जाए या कोई अन्य छोटा-मोटा नाम दिया जाए। कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि उनका अस्तित्व होता है। शारीरिक शक्ति, कला कौशल, भौतिक संपत्ति या मानसिक क्षमता में असमानताएं स्वभाविक हैं। लेकिन इस विषय पर बल देने की आवश्यकता है। अंत में यह तथ्य सामने आता है कि मूलभूत लक्षण सभी मानवों में विद्यमान होते हैं। उनकी प्रकृति तथा अभिव्यक्तियों को 'नैतिक समानता' कहा जा सकता है।"

     'आचार' शब्द पर जोर दिया जाना चाहिए। सृष्टि के आरंभ से ही आलोचकों में यह परंपरा रही है कि वे शारीरिक शक्ति, प्रतिभा तथा संपत्ति के मामले में यह तत्व उजागर करते रहे हैं कि इस मामलों में मानव एक समान नहीं होते। यह आलोचना अनावश्यक भी है तथा अप्रांसगिक भी। नैतिक समानता के किसी पक्षधर ने मानव - मात्र के बीच विद्यमान स्पष्ट असमानाताओं को उजागर किया हो, जिनके कारण अत्याचार या संस्थागत भोगाधिकार प्रकट होते हैं। स्वतंत्रता की घोषणा यह सुनिश्चित नहीं करती कि सभी मनुष्य समान हैं, बल्कि यह उद्घटित करती है कि वे समान पैदा होते हैं।

     संक्षेप में, जब ‘नैतिक समानता' कहते हैं तो इसका अर्थ है आचार-विचार की समानता। यह एक विश्वास है, अधिकारों की ऐसी मान्यता है, जिसका आदर किया जाना चाहिए। इसको वैसे तो प्रमाणित नहीं किया जा सकता, जैसे गणित के प्रश्न हल कर दिए जाते हैं। इसे शारीरिक शक्ति, प्रतिभा, उद्योग तथा संपत्ति संबंधी असमानताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह इस बात का निषेध करती है कि मात्र शारीरिक रूप से बलिष्ठता के आधार पर कोई निर्बलों को मारे, खाए या सताए । इसी प्रकार नैतिक समानता के अनुसार प्रतिभा तथा संपत्ति के मामले में भी कोई छूट नहीं दी जा सकती। ऐसी स्थिति में तो कोई भी बल, बुद्धि तथा संपदा में अपने को श्रेष्ठता के पलड़े में भारी मान सकता है। ऐसी परिस्थितियों में सरकार तथा संपत्ति बलवानों के पास चली जाएगी, जब कि गुण तथा प्रतिभा अत्याचारियों के आगे हाथ बांधे खड़े रहेंगे, ठीक वैसे ही जैसे यूनान के दास रोम के विजेताओं की सनकों तथा इच्छाओं को पूरा किया करते थे। अब जब कि नैतिक समानता के सिद्धांत की कटु आलोचना की जा चुकी है, इसमें ऐसा कुछ है जिसे स्वीकार किया जाना चाहिए और उसका अनुकरण किया जाना चाहिए भले ही इसके प्रति विरोध क्यों न हो । मानव व्यक्तित्वों के प्रति बिना किसी अंदर वाला समाज डाकुओं का समूह होता है ।