संघ के 'चरित्र निर्माण' की राजनीति कठघरे में है?
आलेख : सुभाष गाताडे
अपने आप को चरित्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध कहने वाले हिंदुत्ववादी संगठन और उनका कुनबा राम मंदिर में चली डकैती के प्रसंग को लेकर जबरदस्त दुविधा का शिकार दिख रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सुप्रीमो मोहन भागवत ने जहां 'राम राम' कहकर पत्रकारों के सवालों का जवाब देने से इंकार कर दिया, वहीं दत्तात्रय होसबले को — जो आरएसएस के नंबर दो के नेता हैं — घटना के सार्वजनिक होने के एक माह बाद पहली दफा मुंह खोलते हुए इस संगठित लूट का उजागर होना ही 'हिंदू विरोधी' और 'राष्ट्र विरोधी' ताकतों की साजिश लग रहा है।

दरअसल हकीकत यही है कि अपनी स्थापना के सौ साल पूरे होने के बाद उसके सामने इतना बड़ा संकट शायद ही कभी खड़ा हुआ हो, क्योंकि जैसे-जैसे जांच का दायरा आगे बढ़ने की संभावना दिख रही है, राम मंदिर के संचालन में उजागर होती अपारदर्शिता के पहलू सामने आ रहे हैं। और जाहिर है कि फिर यह कहते बचना संभव नहीं हो रहा कि इस लूट और डकैती के लिए डोनेशन की गिनती में लगे कारिंदे ही जिम्मेदार हैं। यह सवाल आम लोग भी पूछ रहे हैं कि —
कारिंदे वहां कैसे पहुंचे?
किसने उन्हें वहां बिठाया?
ट्रस्ट के चंद मेंबरों से उनकी नजदीकी के क्या मायने हैं?
और सबसे बढ़कर — लूट के असली मास्टरमाइंड कौन हैं?
🔴 संघ : सदी का सबसे बड़ा संकट?
'मौन एक सच्चा मित्र है, जो कभी विश्वासघात नहीं करता।'
यह नहीं पता कि प्रधानमंत्री ने चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस (ईसा पूर्व 551 – ईसा पूर्व 471) की यह सलाह पढ़ी है या नहीं, लेकिन उनके आलोचकों का कहना है कि यह उनकी शासन-कला का एक प्रमुख हिस्सा है।
राम मंदिर में हुई कथित लूट — जहां करोड़ों रुपये का गबन हुआ और आरोप है कि इसमें मंदिर ट्रस्ट के प्रबंधन से जुड़े लोगों की भूमिका रही — एक और ऐसा अवसर बन गई है जब उनके मौन की चर्चा हो रही है। यह इसलिए भी अधिक खटकता है क्योंकि राम मंदिर तीर्थ ट्रस्ट के प्रबंधन में शामिल प्रमुख व्यक्तियों का चयन उनके कार्यालय द्वारा इस आधार पर किया गया था कि वे लंबे समय से हिंदुत्व परिवार का हिस्सा रहे हैं।
विपक्ष की लगातार आवाज़ उठाने की भूमिका के कारण इस कथित लूट का खुलासा हुआ और अब तक ट्रस्ट की तीन प्रमुख हस्तियों ने इस्तीफा दे दिया है। यह भी जगजाहिर है कि मुद्दे को उठाने के लिए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव को किस तरह बदनाम करने की कोशिशें चलाई गईं।
ताजा रिपोर्टों के अनुसार, इस संस्थान से जुड़े लगभग 50 से 60 लोग जांच के दायरे में हैं और उनमें से आठ लोगों को कथित भूमिका के लिए गिरफ्तार भी किया जा चुका है। जो बात अब अधिक स्पष्ट होती जा रही है, वह यह है कि गिरफ्तार किए गए अधिकांश लोग इस खेल के छोटे खिलाड़ी हैं और असली मास्टरमाइंडों को छुआ भी नहीं जा रहा।
व्यापक हिंदुत्व परिवार में शायद ही कोई इसे स्वीकार करने को तैयार हो, लेकिन राष्ट्रीयकृत बैंकों के अधिकारियों की निगरानी और सीसीटीवी कैमरों की पूरी मौजूदगी में राम मंदिर में हुई यह डकैती एक ऐसा अवसर बन गई है जिसने 'परिवार' की भीतर गहरी सड़ांध को उजागर कर दिया है। जो लोग स्वयं को राष्ट्र का चरित्र-निर्माता बताते रहे, वे जनता के सामने बेनकाब हो गए हैं।
प्रमुख विश्लेषकों ने सही ही तर्क दिया है कि जैसे महात्मा गांधी की हत्या का मामला व्यापक हिंदुत्व 'परिवार' के लिए एक निर्णायक क्षण था, उसी प्रकार यह घटना भी समान महत्व रखती है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ही उदाहरण लें। रिपोर्टों के अनुसार, वे स्वयं को इस बात से उपेक्षित महसूस कर रहे थे कि ट्रस्ट के संचालन से उन्हें बाहर रखा गया और ट्रस्ट की संरचना एवं गठन का पूरा अधिकार केंद्र के पास रहा। उनके लिए दान और निधियों के इस कथित गबन का मामला 2027 के चुनावों से ठीक पहले अपनी 'स्वच्छ छवि' को और चमकाने का अवसर बन गया है।
जहां केंद्र सरकार ने इस घटनाक्रम पर अजीब तरह की चुप्पी बनाए रखी, मानो उम्मीद हो कि समय के साथ मामला शांत हो जाएगा, वहीं उसने इस मामले में सीबीआई जांच कराने की जरूरत भी नहीं समझी। इस लूट कांड में हुई गिरफ्तारियां राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने की हैं।
🔴 हिंदुत्व के दोहरे मानदंड!
सच्चाई यह है कि राम मंदिर में हुई कथित लूट का खुलासा भाजपा के लिए बेहद असुविधाजनक समय पर हुआ है और इससे उसके दोहरे मापदंड और उजागर हुए हैं।
यह मुद्दा सबरीमाला मामले के तुरंत बाद सुर्खियों में आया, जहां केरल में भाजपा मंदिर के स्वर्ण-लूट मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रही है, जबकि अयोध्या में दान के कथित गबन पर चुप्पी साधे हुए है।
दूसरी ओर, इसने फिलहाल विश्व हिंदू परिषद की उस मांग को भी झटका दिया है जिसमें वह 'मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त' करने की बात कर रही थी।
📋 राम मंदिर लूट की क्रोनोलॉजी
| वर्ष/घटना | विवरण |
|---|---|
| 2019 | सर्वोच्च न्यायालय का फैसला; ट्रस्ट बनाने का निर्देश |
| ट्रस्ट गठन | प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन |
| भूमि सौदे | अयोध्या से जुड़े भूमि सौदों पर आरोपों की बाढ़ |
| जनवरी 2024 | आम चुनावों से पहले राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा |
| पारदर्शिता | सीसीटीवी, बैंक अधिकारी और स्वयंसेवकों की नियुक्ति |
| लूट का खुलासा | दान और फंड के गबन के आरोप; मामले को दबाने की कोशिश |
| एफआईआर में देरी | छोटे कर्मचारी गिरफ्तार; ट्रस्ट के प्रमुखों को नहीं छुआ गया |
🔴 ट्रस्ट की तीन प्रमुख हस्तियों ने इस्तीफा दिया
इस पूरे मामले में कई अन्य बड़े सवाल भी हैं।
मंदिर उच्च सुरक्षा क्षेत्र में होने के बावजूद, और केंद्र व राज्य सरकार द्वारा उच्च स्तरीय सुरक्षा उपलब्ध कराए जाने के बावजूद, यह भी रिपोर्ट किया गया है कि लगभग 400 सुरक्षा कर्मियों वाली एक निजी सुरक्षा एजेंसी भी तैनात थी जिसे हिंदुत्व 'परिवार' के किसी करीबी व्यक्ति द्वारा संचालित किया जाता था और जिसकी सेवाओं के लिए प्रति माह एक करोड़ रुपये दिए जाते थे।
सवाल उठता है —
इतने उच्च सुरक्षा क्षेत्र में इस निजी सुरक्षा एजेंसी को क्यों नियुक्त किया गया?
इसकी अनुमति किसने दी?
जब तक नीचे से व्यापक जन-दबाव नहीं बनेगा, लूट और डकैती के ये सभी महत्वपूर्ण पहलू दबे रहेंगे। इस मामले के शुरुआती व्हिसलब्लोअर अब अपनी जान के डर से अचानक चुप हो गए हैं। उदाहरण के लिए, बैंक अधिकारी महिपाल, जिन्होंने इस मुद्दे को उठाया था, अब मीडिया से बात करने को तैयार नहीं हैं।
🔴 'ना ताला टूटा, ना तिजोरी, फिर भी ढाई करोड़ चोरी!'
क्या किसी को आज भी दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में हुई उस कथित 'चोरी' की याद है, जिसमें कहा गया था कि लगभग ढाई करोड़ रुपये चोरी हो गए थे?
पत्रकार समुदाय में व्यापक रूप से प्रसारित एक एसएमएस ने इस 'चोरी' का मजाक उड़ाते हुए कहा था —
'ना ताला टूटा, ना तिजोरी, फिर भी भाजपा मुख्यालय से ढाई करोड़ चोरी!'
रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी के खजाने से केवल 1000 रुपये के नोट गायब पाए गए थे, जबकि 500 रुपये के नोटों को हाथ भी नहीं लगाया गया था।
बताया गया कि यह चोरी 26 दिसंबर 2008 को उप लेखा अधिकारी नलिन टंडन ने तब पकड़ी जब क्रिसमस के बाद कार्यालय खुला। रहस्य तब और गहरा गया जब यह सामने आया कि न तो लेखा कार्यालय के ताले टूटे थे और न ही तिजोरी। कहीं भी जबरन प्रवेश के कोई निशान नहीं थे, जिससे अंदरूनी मिलीभगत की आशंका प्रबल हुई।
पार्टी मुख्यालय की इस घटना ने लोगों को उस पुराने प्रकरण की याद भी दिलाई जब तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण कैमरे पर एक कथित हथियार व्यापारी से नोटों की गड्डियां लेते हुए पकड़े गए थे।
🔴 नैतिकता का गड़बड़झाला
अगर कोई वित्तीय अनियमितता किसी प्रतिष्ठान में या महकमे में सामने आती है और उसका खुलासा होता है, तो जांच शुरू होने के पहले ही यह सुनिश्चित किया जाता है कि संबंधित अधिकारी तथा उसके मातहत सभी लोग कम से कम पदमुक्त कर छुट्टी पर भेज दिए जाएं या निलंबित किए जाएं, ताकि निष्पक्ष तरीके से जांच संभव हो।
जैसा कि दुनिया के सामने है, राम मंदिर में संगठित लूट और डकैती का खुलासा हुआ। यह भी सामने आया कि जिन-जिन लोगों ने मंदिर के लिए पैसे, चांदी की ईंटें या गहने दिए थे, उनका हिसाब तक नहीं मिल रहा है। इसके बावजूद ऐसी न्यूनतम कार्रवाई भी नहीं हुई है।
अग्रणी पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह ने इस पहलू की विस्तार से चर्चा की है —
"संघ परिवार न हिंदू नैतिकता को मानने को तैयार हैं, न संवैधानिक नैतिकता को और अगर कोई भारतीय नैतिकता है, तो उसे वह सर्वाधिक दरकिनार करता है। इसीलिए खुद को समस्त हिंदुओं का रहनुमा और संरक्षक बताने के बावजूद वह 'उसके' भव्य और दिव्य राम मंदिर की दानराशि की ईमानदारी से रखवाली नहीं कर पाया।"
भारतीय जनसंघ के वरिष्ठ नेता बलराज मधोक ने अपनी आत्मकथा 'जिंदगी का सफर' में संघ नेता गोलवलकर के बारे में लिखा है —
"मेरी बात सुनने के बाद वे कुछ देर चुप रहे और फिर बोले — 'मैं इन लोगों के चरित्र की कमज़ोरियों को जानता हूँ। लेकिन मुझे एक संगठन चलाना है। मुझे सबको साथ लेकर चलना है, इसलिए शिव की तरह मैं रोज़ ज़हर पीता हूँ।'"
(बलराज मधोक, जिंदगी का सफर – 3, दिल्ली : दिनमान प्रकाशन, 2003, पृष्ठ 62)
🔴 अंत में — क्या सच सामने आएगा?
सवाल उठता है —
क्या प्रधानमंत्री मोदी राम मंदिर में हुई इस कथित लूट पर अपनी चुप्पी तोड़ेंगे?
या मुख्यमंत्री योगी को इस मामले में पूरी स्वतंत्रता दी जाएगी?
यह अकारण नहीं कि विपक्ष की तरफ से यह मांग की जा रही है कि आला अदालत की निगरानी में जांच हो।
अब समय आ गया है कि विपक्ष सरकार पर दबाव बनाए कि वह निधियों के कथित गबन पर एक श्वेतपत्र जारी करे और जांच दल की रिपोर्ट सार्वजनिक करे ताकि वास्तविक तस्वीर सामने आ सके।
यदि नागरिक सतर्क नहीं रहे, यदि विपक्ष का दबाव अचानक कम हो गया, तो सत्ता में बैठे लोगों के लिए इस जनाक्रोश को नियंत्रित करना आसान हो जाएगा।
📚 संदर्भ-स्रोत :
द वायर | टेलीग्राफ इंडिया | इंडियन एक्सप्रेस | मिंट | बीबीसी | इंडिया टुडे | इकोनॉमिक टाइम्स
✍️ लेखक परिचय :
सुभाष गाताडे स्वतंत्र पत्रकार, वामपंथी चिंतक तथा दलित और मानवाधिकार आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता हैं।